श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
तद्रामवचनं श्रुत्वा यतिः प्राह रघूत्तमम् । भिक्षार्थं भ्रमतो मार्गे भिक्षात्रं स्पृशितं मम ॥२५॥
शुनाऽनेन राघवेंद्र मध्याह्ने क्षुधितस्य च । मयाऽतः क्रोधचित्तेन शुनेऽस्मै अपराधिने ॥२६॥
अर्पितं लोष्टकं क्षिप्तेन भिन्नं पदं शुनः । तद्यतेर्वचनं श्रुत्वा पुनस्तं प्राह राघवः ॥२७॥
ज्ञानहीनः पशुश्चायं भक्ष्यं दृष्ट्वायं निर्दोष च । स्वाभाविकी तस्य दोषो नैवार्य वेद्मयहं यते ॥२८॥
स्वमेवास्यैवापराधी तद्दण्डं प्राप्तुमर्हसि । इत्युक्त्वा मारगेयं तु राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥२९॥
यदिश्रायं तैऽपराधी तत्र हस्तेऽर्पितो मया । यं त्वमिच्छसि वै कर्तुं तस्मै दण्डं सुखं कुरु ॥३०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा सारमेयोऽब्रवीत् प्रभुम् । शिवालयस्याधिपत्ये च स्थापनीयो यति प्रभो ॥३१॥
तथेति रामचन्द्रोऽपि शिविकायां निवेश्य तम् । स्रग्वस्त्रचन्दनाद्यैश्च सम्पूज्याथ यतिं मुदा ॥३२॥
वाद्यघोषैर्नर्तनाद्यैर्ब्राह्मणैश्च शिवालयाम् । नीत्वा शिवालयस्याधिपत्ये संस्थापयत्प्रभुः ॥३३॥
तदाऽज्ञानाद्यतिर्देवं फलितं वेत्यमन्यत । ततो रामो जनैर्युक्तः स्वां सभां संविवेश ह ॥३४॥
तत्सर्वे कौतुकं दृष्ट्वा पौराः प्रोचु रघूत्तमम् । कथं शुनाऽद्य यतये शिक्षेत्प्रसाधिता प्रभो ॥३५॥
अन्नार्थं भ्रमतस्तस्य यनेदेशं पदं सदन् । नैतादृशारूपं सञ्जातं यतये शिक्षितं न तत् ॥३६॥
तत्पौराणां वचः श्रुत्वा राघवस्तान् वचोऽब्रवीत् । प्रष्टव्यः श्वा तु युष्माभिः सन्देहं हरिष्यति ॥३७॥
तथेति मारगेयं तं पप्रच्छुर्नागराश्च तत् । तन्त्रोवाच सारमेयः शृणुध्वं यन्मयोच्यते ॥३८॥
कुपिप्रज्ञानभार्यापत्यबलसम्मानकारिणः । शिवालयमठारामतटाकग्रामाधिकारिणः ॥३९॥
अनाथस्त्रीबालवित्तहारिणः क्रूरमानसाः । गौविप्रशिववित्तेम्ब हारिणोऽन्यासकारिणः ॥४०॥
रामके आज्ञानुसार वह संन्यासी भी सिर झुकाये रामके पास आया ॥ २३ ॥ रामने उनको प्रणाम किया और कहने लगे-कहो स्वामिंवा ! आपने किस अपराधमें इस कुत्तेका पैर तोड़ डाला ? ॥ २४ ॥ उसने उत्तर दिया कि मैं भिक्षा लिये रास्तेसे जा रहा था। तभी इसने मेरा भिक्षान्न छू दिया। वह मध्याह्नका समय था। मैं भूखा था । इसके उस अपराधपर मुझे क्रोध आ गया और इसको चमकानेकी इच्छासे मैंने एक पत्थर फेंककर मारा। वह इसके पैरमें लगा, जिससे इसका पैर टूट गया ।। यतिकी बात सुनकर राम उससे कहने लगे—॥ २५, २७ ॥ यह एक ज्ञानविहीन पशु है। यदि इसने अपना भक्ष्य पदार्थ देखकर आपको छू दिया तो मैं इसमें इसका कोई दोष नहीं समझता। यह तो इसकी स्वाभाविक प्रकृति है। इसलिए आप ही इसके अपराधी हैं। यतिके प्रति इतना कहकर कुत्तेसे कहने लगे-यह संन्यासी तुम्हारा अपराधी है। मैं इसे तुम्हे सौंपता हूँ। तुम जो दण्ड चाहो, इसे दे सकते हो ॥ २८-३० । रामकी बात सुनकर कुत्तेने कहा-इसे किसी शिवालय का महन्त बना दिया जाय। ३१॥ रामने उसकी बात स्वीकार कर ली और सुन्दर वस्त्र, चन्दन तथा माला आदिसे यतिको सुशोभित करके एक पालकीमें बिठाया और विविध प्रकारके बाजे यगान हुए उत्सवके साथ एक शिवालयमें ले गये और उसे वहाँका महन्त बना दिया ॥ ३२ ।। ३३ । उस समय अज्ञानतावश यतिने अपना भाग्योदय समझा । कुछ देर बाद रामचन्द्रजी अपने सचिवों समेत राजसभामें लौट आये ॥ ३४ ॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर कितने ही उत्सुक नागरिकोंने रामसे कहा-हे प्रभो ! इस कुत्तेने यति- को इस प्रकारका दण्ड क्यों दिया ? यतिका तो कर्तव्य उसकी टांग तोड़ दी और जब आपने कुत्तेको उसके कियेका दण्ड देनेके लिए कहा तो उसने इतरुक स्थानपर दनिकी महन्थ बनवा दिया । ३५ ॥ ३६ ॥ इस प्रकार नागरिकोंकी बात सुनकर रामने कहा कि आप लोग इस कुत्तेसे ही पूछ लें कि उसने ऐसा क्यों किया। यह आप लोगोंकी शङ्काका भली भाँति समाधान कर देगा । ३७॥ रामके आज्ञानुसार उन लोगोंने कुत्तेसे पूछा तो उसने कहा-मै जो कुछ कहता हूँ, उसे सावधान होकर आप लोग सुनें ॥ ३८॥ मनमें उत्पन्न अन्न रखनेवाले, शिवालय, मठ, बगीचा तालाब राजग्राम इन स्थानोंके अधिपति, अनाथ स्त्री तथा बालकोंके धनका अपहरण करनेवाले, गाली-गलौज करनेवाले, गौ-विप्र तथा शिवके लिए अर्पित धनका अपहरण करनेवाले, अन्याय करनेवाले, राजाके घरपर पहुँचे हुए याचकका अपमानवान् दूसरेका धन हड़पनेवाले, प्राणभित्रके