श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४४२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १०
किं दुःखं सारमेयस्य प्रष्टव्यं मत्पुरस्त्वया । तथेति लक्ष्मणो दूतानब्रवीत्सम्भ्रमान्वितः ॥७॥
समामाकारणीयः श्वा युष्माभिस्त्वथ सादरम् । तथेति रामदूतास्ते सारमेयं वचोऽब्रुवन् ॥८॥
आकारितोऽसि रामेण त्वमेहि राघवांतिकम् । त्वद्यैवं फलितं चाद्य पूर्वपुण्योदयेन हि ॥९॥
रामदूतवचः श्रुत्वा तुष्टः श्वा तान्यचोऽब्रवीत् । देवगृहे यज्ञवाटहोमशालासु वै तथा ॥१०॥
वृन्दावने सभायां च मठे पार्थिवसद्गृहे । गोष्ठे पुण्यस्थले पुण्ये तीर्थे देवालयोऽपि च ॥११॥
पाकस्थाने रतिस्थाने स्नानसंध्यास्थलादिषु । गन्तु नार्हा वयं पापयोनित्वाद् बाह्यनां प्रभुः ॥१२॥
तत्रस्ते विस्मयाविष्टास्तद्वाक्यं राममब्रवन् । राघवस्तद्वचः श्रुत्वा विहस्य सम्भ्रमेण च । १३॥
आनीयतां पादुके मे त्विति दूतान वचोऽब्रवीत् । ततस्तैरर्पिते दिव्ये पादुके कृत्य पादयोः ॥१४॥
रत्नदण्डं करे धृत्वा शनैः सर्वैः समन्वितः । मुद्रिकाग्लन्द्धारेव मणिनूपुरशिञ्जितः । १५॥
मुकुटेनावतंसेन केयूराभ्यां समन्वितः । नूपुराभ्यां कंकणाभ्यां कुण्डलाभ्यां सुशोभितः । १६॥
पदकैः शृखलाभिश्च वरवस्त्रैर्विराजितः । गजद्वाराद्वहिर्देशे श्वाभ्येवांतिकं ययौ ॥१७॥
कृत्वा दंडं त्वरुक्षेऽथ किंचिद्वक्रः स्थितः प्रभुः । कृत्वा वामं जान्वधो स्वां जंघां रामः स दक्षिणाम् ॥१८॥
अब्रवीत्सारमेयं तं किंचित्कृत्वा स्मिताननम् । मदग्रे वद किं दुःखं सारमेय तवास्ति यत् ॥१९॥
भद्रान्ये सहसा माऽस्तु दुःखं केषां कदापि च । इति रामगिरं श्रुत्वा सारमेयः पुनः पुनः ॥२०॥
नमस्कृत्या राघवेंद्रं छिन्नपादोऽब्रवीन्मुदा । मदर्थं श्रमितोऽत्र त्वं चिरं जीव दयानिधे ॥२१॥
निरपराधो यतिना प्राप्याऽत्राहं प्रताडितः । छिन्नपादोऽस्मि राजेंद्र त्वामद्य शरणं गतः । २२।
तद्वाक्यं राघवः श्रुत्वाऽऽकारयामास दण्डिनम् । राजाज्ञया यतिश्चापि विह्वलो राघव ययौ ॥२३॥
दृष्ट्वा यतिं तं श्रीरामस्तदा वचनमब्रवीत् । स्वामिन् किमर्थं युष्माभिश्छिन्नः पादोऽस्य वै शुनः॥२४॥
यह कुत्ता क्यों राजदरबारके समक्ष आकर रोता है। मेरे सामने बुलाकर पूछो कि उसे किस बातका कष्ट है। लक्ष्मणने भी घबड़ाकर दूतोंको आज्ञा दी कि जाओ और आदरपूर्वक उस कुत्तेको सामने ले आओ। "बहुत अच्छा" कहकर दूत कुत्तेके पास पहुंचे और उससे कहने लगे- ॥६-८॥ आज पूर्वसंचित पुण्योंसे तुम्हारा भाग्योदय हुआ है। चलो, श्रीरामचन्द्रजी तुम्हें बुला रहे हैं। ९॥ दूतोंकी बात सुनी तो प्रसन्न होकर कुत्ता कहने लगा- देवालय, यज्ञशाला, हवनगृह, तुलसीका बगीचा, सभा, मठ, राज-भवन, गोशाला, पवित्र तीर्थ, रसोईघर, रतिस्थान तथा स्नान-सन्ध्यादि करनेके स्थानोंपर मै जानेके अयोग्य हूँ। क्योंकि मेरा जन्म पापयोनिमें हुआ है। तुम जाकर रामसे कह दो ॥१०॥ ११॥ इतनी सुनकर वे दूत बड़े विस्मित हुए और जैसा उसने कहा था, जाकर रामको सुना दिया। राम उसकी बात सुनकर हँस पड़े और दूतोंसे कहा कि हमारी खड़ाऊँ ले आओ! दूतोंने आज्ञाका पालन किया। रामने खड़ाऊँ पहिना, एक रत्नजटित छड़ी हाथमें ली और सब लोगोंके साथ उस कुत्तेकी ओर चले। उस समय रामचन्द्रके हाथोंमे अंगुलियाँ थीं, रत्नजटित हार गलेमें था, मस्तकपर मुकुट तथा कानोमे कुण्डल झूल रहे थे, भुजाओमे बिजयठ और कङ्कण था। गलेमें हार तथा सिकडियाँ शोभित हो रही थी। इनके सिवाय और भी कई प्रकारके आभूषण और सुन्दर वस्त्र सुशोभित हो रहे थे। इस तरह सज-धजकर राम कुत्तेके पास जा पहुँचे ॥१२-१७॥ वहाँ पहुँच तो छड़ी बगलमे दबा ली और बायें घुटनेको तनिक मोड़कर कुछ तिरछे खड़े हो गये ॥१८॥ पुचकारकर राम कुत्तेसे बोले- हे सारमेय! तुम्हें जो कुछ कष्ट हो वह मुझे बताओ ॥१९॥ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरे राज्यमें किसीको किसी प्रकारका कष्ट न हो। इस तरह प्रभुकी बात सुनकर कुत्तेने रामको अनेकशः प्रणाम किया और हर्षित होकर कहने लगा- हे दयानिधे ! आपने मेरे लिए बड़ा कष्ट किया, जो यहाँ पधारे। हे महाराज ! मैने कोई अपराध नहीं किया था। फिर भी एक संन्यासीने पत्थरसे मुझे ऐसा मारा कि जिससे मेरा पैर टूट गया। इसीसे दुःखी होकर मै आप की शरणमे आया हूँ। २०॥ २१॥ २२॥ उसकी बात सुनकर रामने उस संन्यासीको बुलवाया।