श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १० ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४१
जम्बुद्वीपपतिं रामश्चकार स्वसुतं लवम् । लवोऽपि विजयं स्वीयसचिवं चाकरोन्मुदा ॥९३॥ नवस्वपि च वर्षेषु यातायातं पुनः पुनः। चकार विजयेनैव पुनः कार्यार्थमादरात् ॥९४॥ शत्रुघ्नो यौवराज्ये स्वे भरतेनाभिषेचितः । यौवराज्यपदे स्वेऽपि कृत्वा रामः कुशं सुतम् ॥९५। चकार लक्ष्मणं मुख्यं सचिवेषु सुमन्त्रणम्। सप्तद्वीपपतिः श्रीमान्स्वयमासीद्रघूत्तमः ॥९६॥ स्वस्वकार्येषु सर्वे ते रामन् तत्परमानसाः । ततः सर्वांन्नृपान्पूज्य ददावाज्ञां रघूद्वहः ॥९७॥ ततस्ते राघवं न्त्वा ययुः स्वं स्व स्थलं मुदा । ततो भारतवर्षस्य परामर्शं सदा मुदा ॥९८॥ चकार भरतः श्रीमान् भरताधिपतिः प्रभुः । जम्बुद्वीपपरामर्शं च पकार लवस्तथा ॥९९॥ सप्तद्वीपपरामर्शं रामचन्द्रः कुशेन च । लक्ष्मणेन सहैवासि स्वयमेवाकरोत्प्रभुः ॥१००॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे कुशादिषड्द्वीपविजयदर्शन नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ।
दशमः सर्गः
( रामका संन्यासी, शूद्र तथा गृध्रको दण्डदान )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः सारमेयदीर्घारवं मुहुः । राजद्वाराद्बहि श्रुत्वा सभास्थो दूतमब्रवीत् ॥१॥ कथं दीर्घस्वरेणैव श्वाऽद्य क्रोशति पश्यताम् । तथेति रामदूतोऽपि गत्वा राजसभाद्बहिः ॥२॥ न्यवारयत्सारमेयं राजद्वारात्स्वधर्षणैः । रामं नत्वाऽब्रवीद्वाक्यं तूष्णीं श्वा क्रोशति प्रभो ॥३॥ मया निवारितो दूरं गतः स राक्षसान्तक । ततो द्वितीयदिवसे तच्छब्दान् राघवोऽशृणोत् ॥४॥ दूतेन पूर्ववच्चापि सारमेयो निवारितः । ततस्तृतीये दिवसे तद्रावानशृणोत्प्रभुः ॥५॥ तदाविस्मितः प्राह लक्ष्मणं पुरतः स्थितम् । श्वाऽयं दिनत्रयं बन्धो कथं क्रोशति संततम् ॥६॥
लिए नियुक्त किया था, उसे दूसरे काममें लगा दिया ॥ ९२ । इसके अनन्तर अपने लव नामक वंटको जंबूद्वीपका अधिपति बनाया लवने विजय नामके उस सेवकको मंत्री बना दिया, जिसे कि रामचन्द्रजीने कुछ दिन तक भरतखण्डको देखभाल करनेके लिए नियुक्त किया था । ९३॥ उस विजयके साथ कार्यवश नवों द्वीपोंमें बराबर आवा-जाया करते थे । ९४ । भरतने अपनी जगह शत्रुघ्नका युवराजपदपर अभिषेक कर दिया । रामने कुशको युवराजके पदपर अभिषिक्त करके लक्ष्मणको अपना सर्वश्रेष्ठ मन्त्री बनाया । किन्तु सातो द्वीपोंके अधिपति राम स्वयं थे ॥ ९५ ॥ ९६ ॥ ये सब लोग अपने कार्योंको बड़ी तत्परताके साथ निभाते थे। इसके अनन्तर रामने साथ आये हुए राजाओंको अपने देश जानेका आज्ञा दी ओर वे रामचन्द्रजीको प्रणाम करके अपने-अपने देशको चल गये । ९७ ॥ भारतवर्षका शासन भरतजी प्रसन्नतापूर्वक करते थे। जंबूद्वीपका शासन लव करते थे और भरत, कुश तथा लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामचन्द्रजी सातों द्वीपोंका शासन कर रहे थे ॥ ९८-१०० ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ।
श्रीरामदास कहने लगे—एक समय रामचन्द्रजी सभामें बैठे थे । सहसा कई वार एक कुत्तेके रोनेकी आवाज सुनी तो दूतसे बोले- १ ॥ देखो तो इतने ऊंचे स्वरमें कुत्ता क्यों चिल्ला रहा है। रामके आज्ञानुसार दूत कुत्तेके पास गया । उसे धमकाकर वहाँसे हटा दिया और रामसे जाकर कहा—हे राक्षसान्तक ! उसे मैने दूर भगा दिया है, अब वह नहीं चिल्लायेगा । दूसरे दिन फिर रामने उसी प्रकार उस कुत्तेका रोदन सुना तो दूतसे भगवाया ॥२-५॥ तीसरे दिन फिर उसका रुदन सुनकर रामने लक्ष्मणसे कहा-आज तीन दिनसे