श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें४९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
सकलाकाशावस्थानहेतवः ॥ ७६ ॥ तस्मिन्नेव गिरिवरे भगवान् परममहापुरुषो महाविभूतिपतिः सकललोकहिताय आस्ते । ७७ । ततः परस्ताद्योगेश्वराणां विशुद्धामुदाहरन्ति ॥ ७८ ॥ एव पञ्चा- शत्कोटिगुणिता भूगोलोऽयं ज्ञेयः । ७९ ।। एवं पञ्चविंशतिकोटिमितां भूमिं लोकालोकमध्यवर्तिनीं स रघुनन्दनः स्ववशां कृत्वाऽऽकाशपथा परिक्रम्य सर्वान् द्वीपान् पूर्ववत्पश्यन् जंबुद्वीपं भारत- वर्षमध्यगतां स्वां राजधानीमोध्यां सप्तद्वीपेश्वरैः परिवेष्टितोऽनुययौ । ८० । ततो रामोऽयोध्या- निकटं गत्वा दूतैः स्वागमनं सुमंत्रं सूचयामास । ८१ । समायातं रामचंद्रं श्रुत्वा स मंत्रिसत्तमः । अयोध्यां भूषयामास पताकाध्वजतोरणैः । ८२ । वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य पौरैर्जानपदैः सह । प्रत्युद्गम्य रामचन्द्रं नत्वाऽयोध्यां निनाय सः । ८३ । तदा निनेंदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मार्गधाद्याश्च नटा गानं प्रचक्रिरे । ८४॥ रामागमनमाकर्ण्य पौरनार्यः सुलंकृताः । प्रासादाजिरमारूढा ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ८५॥ राजद्वारं विमानेन शनैः स रघुनन्दनः । गृह्णन् पौरौपायनानि स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ॥ ८६॥ ययौ यानादवरुह्य सभायां निज आयतः । तस्थौ समन्ततः सर्वैर्नृपैश्च परिवेष्टितः । ८७॥ दत्त्वा स्थलानि सर्वेषां वस्तुमाज्ञाप्य लक्ष्मणम् । दक्षिणाद्यादि सम्पाद्य कृतकार्यममन्यत ॥८८॥ आत्मानं सकलान्पृथ्वीस्थितान् जित्वा समुद्धतान् । ततस्तैः सप्तद्वीपस्थैः पार्थिवैः परिपूजितः ॥८९॥ रामः स्वभ्रातरं विप्रेर्मंत्रं भारताधिपम् । चकार पार्थिवैर्युक्तं लक्षणानुमतेन सः ॥ ९०॥ आदावेव वसिष्ठेन ह्युक्तं भरतनाम तत् । विचिंत्येदं भावि वृत्तं जातकर्मणि निश्चितम् । ९१॥ पूर्वमाज्ञापितं स्वाप्तसेवकं भरतस्य च । रक्षणे तं रामचन्द्रः कार्यान्तरमकल्पयत् । ९२॥
चारों दिशाओंमें ऋषभ, पुण्डरीक, पुष्करचूड, कुमुद, वामन, मुखदन्त, अपराजित और सुप्रतीक ये सभी लोकोंको अपने सिरपर धारण करनेवाले आठ दिग्गज विद्यमान हैं । ७६ । उसी पर्वतके ऊपर परममहा- पुरुष और महाविभूतिपति भगवान् समस्त संसारके हितकी कामनामे वास करते हैं ॥ ७७ । इसके आगे विशुद्ध योगेश्वरोकी ही गति है, ऐसा लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥ इस प्रकार सब मिलाकर पचास करोडगुना विस्तृत भूगोल है उनमेंसे पचीसको अपने वशमे करके राम आकाशमार्गसे लौटकर सम्विक विविध द्वीपो- को देखते हुए जम्बूद्वीपके भारतवर्षमध्य अयोध्या नामकी अपनी राजधानीमे सातो द्वीपोके राजाओोके साथ वापस आये ।७९-८१। अयोध्याके समीप पहुँचकर रामने एक दूत द्वारा सुमन्त्रको अपने आगमनकी सूचना दी । सुमंत्रने रामका आगमन सुना तो पताका, ध्वजा तथा तोरणादिकसे अयोध्याको सज्जित करवाया । ८२ ॥ फिर एक बडे भारी हाथीको आगे करके पुरवासी लोगोंके साथ रामके समक्ष पहुंच और उन्हें प्रणाम करके अयोध्या लाये ॥ ८३ । उस समय अनेक प्रकारके बजे बाजे अप्सराएं नाचीं गायकोने गाने गाये और बन्दीजनोंने स्तुति की । ८४ । रामका आगमन सुनकर अयोध्याकी स्त्रियां भांति-भांतिके वस्त्राभरण पहनकर अपने कोठोंपर चढ गयीं और वहाँसे फूलोंका वर्षा करने लगीं । ८५ । रामचन्द्रजी धीरे-धीरे पुरवासियोंकी भेटें स्वीकार करते हुए पुष्पक विमान द्वारा अपने राजद्वारपर पहुंचे। रास्तेम स्त्रियोने रामकी आरती उतारी ॥ ८६ ॥ राजद्वारपर पहुंच ता पुष्पक विमानसे उतरकर सभाभवनमें गये और अपने सिंहासनपर बैठे । उनके साथ जो राजा आये थे, वे भी सिंहासनके चारो ओर बैठ गये ॥ ८७ ॥ इसके अनन्तर सब मेहमानोंको ठहरनेके लिए स्थान बतलानेके निमित्त लक्ष्मणसे कहकर राम दक्षिणाद्यादि कार्योंमें लग गये, इस प्रकार पृथ्वीपर रहनेवाले उद्दण्ड राजाओका परास्त करके रामने अपनेको कृतकृत्य समझा। इसके अनन्तर उन सातो द्वीपके राजाओने फिरसे रामकी पूजा की ॥ ८८ ॥ ८९ ॥ तदनन्तर लक्ष्मणसे सलाह लेकर रामने भरतको भारतवर्षका अधिपति बना दिया ॥ ९० ॥ इस भावी बातको सोचकर ही वसिष्ठने भरतका नाम भरत रक्खा था ॥ ९१॥ पहले जिस सेवकको रामचन्द्रजीने भरत देशकी रक्षाके