श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) २३९
अपरं तद्गतञ्चैतत्स्वरूपान्नं ते कङ्कणोपमम् तद्वर्षपौ नृपौ जित्वा ततो द्वीपेश्वरं नृपम् ॥ ६०॥
उत्तराङ्गाह्वयं रामः परां मुदमवाप सः । ददर्श पुष्करं तत्र द्वीपसंज्ञाकारकं वरम् ॥६१॥
कमलासनम्य यज्ज्ञेयं ब्रह्मणः परमासनम् तत्र कूर्म्ममयं लिंगं ब्रह्मलिंगं जनोऽर्चयत् ॥६२।
वर्षयोर्बहुला नद्यः पापहन्त्रीरुनत्तमाः दशलक्षप्रमानेन प्रागुत्तंगः स पर्वतः ॥६३॥
तस्मिन् गिरी पूर्वभागे पुरी मद्यवतः शुभा । देवभाविति नाम्ना सा मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६४॥
गिरीतस्मिन् दक्षिणस्यां दिशि संयमनी पुरी। यमराज्ञस्य सा ज्ञेया मनोज्ञा ज्वलनप्रभा ॥६५॥
पश्चिमे वरुणस्याथ पुरी निम्लोचनी स्मृता । उत्तरस्यां तु कौबेरी पुरी ख्याता विभावरी ॥६६।
भिन्नाः पुर्य्यस्तिस्रो ज्ञेया मेरुश्याभ्यः शुभावहाः यथा नृपस्य स्थानानि ह्यनेकानि महीनिभाः ॥
सर्व्वे सीमापर्वतास्ते विस्तीर्णाश्च पृथक स्मृताः । द्विसहस्रैर्योजनैश्च प्राञ्चस्तां ते वदाम्यहम् ॥६८॥
सर्व्वेषां दशलक्षैश्चयोजनैः प्रोच्यते, नृप । उत्सर्गा वां तु शुद्धोदं पुष्करद्वीपममितम् ॥६९॥
सीतायाः कौतुकार्थं हि स जगाम ०धुजमः । उद्गगं व्याहलोकान्तस्त्यानां नृणामपि ॥७०॥
ततोऽग्रे भूमिं सार्द्धमसलक्षोत्तरमर्ककोटि ( १५७५०००० ) परिमितां कंचिन्न प्राप्तिसहितां रघुनन्दनो ददर्श । ७१। तैः सर्वभूमिभिनिवासिभिः सुपूजितो रघुनन्दनो मैथिलीरंजनार्थमग्रे जगाम ॥ ७२ ॥ मेरुमन्दारोन्त्यसमपञ्चशताधिकं सार्द्धकोटि ( १५७५००० ) योजनपरिमितं मेरुमान-मान्गवलयान्तरंगले भन्न ज्ञात्वेयम् ॥७३ । ततोऽग्रे आदर्ष तापनां काञ्चनीं भूमं देवैर्यधिष्ठितां चैकोनचत्वारिंशल्लक्षोत्तरकोट्यष्ट ( ८३९००००० परिमिमां दृष्ट्वा देवैः संपूजितः श्रीरामचन्द्रो मुदमवाप ॥ ७४ ॥ ततोऽग्रे लोकालोकपर्वतं सार्द्धद्वादशकाट ( १२५०००००० ) परिमितं विस्ती-र्णावत्तया भूमिप्राकारोपमं केनाप्यनलङ्घयं स रघुनन्दनो ददर्श ॥ ७५ ॥ यस्मिंश्चतसृदिषु द्विरदप-तयः ऋषभः पुंडरीकः पुष्पदन्तः कुमुदो वामनः पृषदन्तःउपराजितः सुप्रतीक इत्यष्टौ दिग्गजाः
पर्वत विद्यमान है, उसे रामने देखा । उस द्वीपका प्रथम देश — पहला मण्डल देश और दूसरा घातकी ये दोनों देश उस द्वीपके कङ्कणके समान । रामने उन देशोके राजाओ तथा पुष्करद्वीपके स्वामी उत्तराङ्गको जीत लिया, जिससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । इसके अनन्तर उस द्वीपके नामको सार्थक करनेवाले पुष्कर सरोवरको देखा ॥ ५७-६१ ॥ कमलका एक मात्र आसन है। यहाँपर कूर्ममय ब्रह्माकी मूर्त्तिका लोग पूजते हैं ॥ ६२ ॥ उन दोनों देशों में बहुत-सी पाप हरनेसमर्थ बहुत-सी नदियाँ बहती हैं। यह पर्वत दस हजार योजनके लगभग ऊंचा है। इसके पूर्व भागपर इन्द्रकी देववतीपुरी है। पश्चिम ओर वरुणकी निम्लोचनी नामकी पुरी । ... ... उत्तरमें कुबेरकी कुबेरीपुरी है ॥ ६३-६६ ॥ मेरु पर्वतपर इन्द्रादिकोंका जो पुरी ... ... ... स्थान वह है। जैसे राजाके एक देशमें अनेक स्थान होते हैं, उसी तरह इनके विषयमें भी जानना चाहिये ॥ ६७-६८ ॥ सबवे सब आपसमें जितने सीमापर्वत हैं। वे सब अलग-अलग दो हजार योजन ऊंचे हैं। इस तरह सब मिलाकर दस हजार योजन उनकी उंचाई है। इसके बाद रामचन्द्रजी शुद्धोद समुद्रको पार करके सीताके कौतुक या यह कहिये कि उस द्वीपके निवासियांको अपने दर्शन देनेके लिये आगे बढे ॥ ६९-७० ॥ डेढ करोड अडतालीस लाख योजन विस्तृत भूभाग ऐसा है कि जिसको रघुनन्दन श्रीरामजीने देखा ॥ ७१ ॥ वहाँके निवासिगण सीतारामकी पूजा की और ये लोग आगे बढ गये ॥ ७२ ॥ मेरु और मानसलोचनाके बीचमें डेढ करोड साढे सात लाख एकचालीस हजार योजन परिमित अन्तरकाल है इसके अनन्तर दर्पणके शीशेके समान चमकती कांचनमयी भूमि देखी जहाँ कि देवता लोग रहते हैं। जिसका विस्तार आठ करोड़ उनतालीस लाख योजन है। वहाँके भी निवासियोने रामकी पूजा की और वे प्रसन्न हुए । इसके अनन्तर साढ़े बारह करोड़ योजन परिमित विस्तीर्ण तथा ऊंचे लोकालोक नामक पर्वतको देखा, जिसे कि आजतक कोई नहीं लांघ सका है ॥ ७३-७५ ॥ जहाँकी