भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 811 में से

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पृष्ठ 454

[४३८ आनन्दरामायणे [सर्गः ९

एतानि सप्त रूपाणि कृतवानुरुशक्तिभिः । वर्धमानो भोजनश्च तथोद्बर्हणो महान् ॥४१॥ नन्दश्च नन्दनश्चैव सर्वतोभद्र एव च । शुक्लाभ्रभाश्चलाः प्रोक्ता मण्डलायुः परन्तः शुभाः ॥४२॥ अमृता अमृतौघा च तथा वैरम्भिरामथा । ज्योतिष्मती रम्या वृष्टिरूपवती तथा ॥४३॥ पवित्रवन्ता सुपुण्या द्वे शुकोक्तं मत्र कीर्तिताः । सप्तद्वैपेषु नद्यश्च स्नानात्पातकनाशनाः ॥४४॥ एतेषु सप्तवर्षेषु पार्थिवेभ्यो निजं प्रभु । कन्यारत्नं मुदाऽऽच्छाद्य तैः सर्वैः परिपूजितः ॥४५॥ क्रौञ्चद्वीपपतिं युद्धे जित्वा तु शङ्खलोचनम् । हयकुञ्जररथतुरगं कोषाद्यैस्तेन पूजितः ॥४६॥ स्तुतो मागधवृन्दैश्च नितरां मुदमाप सः । ततस्तीर्त्वा तु क्षीरोदं क्रौञ्चद्वीपसमं मुदा ॥४७॥ शाकद्वीपं ययौ रामो द्वात्रिंशल्लक्षममितम् । द्वीपरूप्याक्रुञ्चयत्रास्ति शाकवृक्षोऽतिरङ्गनः॥४८॥ यत्रोपास्यो वायुरूपी हरिनिरुद्धापनाभिमान् । तत्रापि सप्त वर्षाणि कथ्यंते पूर्वजन्मना ॥४९॥ पुरोजवं नाम वर्षं तथा तच्च मनोजवम् । पवमानं महच्छुद्धं धूम्रानीकं मनो मयम् ॥५०॥ बहुरूपं चित्ररूपं विद्याधारं तथा स्मृतम् । एवं सप्तसु वर्षेषु नद्यश्चापि ब्रवीम्यहम् ॥५१॥ अनघा च तथाऽऽयुर्दा चोभयसृष्टिश्च वै तथाऽपराजिता पुण्या शुभा पञ्चपदी स्मृता ॥५२॥ सहस्रश्रुतिरन्या सा प्रोक्ता निजवृत्तित्तथा । एव सप्तसु वर्षेषु सप्त नद्यः शुभानहाः ॥५३॥ उरुशृङ्गो बलभद्रस्तथाऽन्यः शतकेसरः । सहस्रस्रोतोऽन्य प्रोक्तो देवपालो महानमः ॥५४॥ ईशानाः पर्वताः सप्त सीमाम्ध्येते प्रकीर्तिताः । एवं सप्तसु वर्षेषु तत्र तत्र नृपोत्तमैः ॥५५॥ पूजितो रघुनाथः स शाकद्वीपपतिं रणे । सुन्दरारव्यं नृपं युद्धे सप्ताहोभिर्महाबलम् ॥५६॥ जित्वा स्पृ जनस्तेन वादयाम स दुन्दुभीम् । तीर्त्वा तं दधिमण्डोदं द्वात्रिंशल्लक्षसस्मितम् ॥५७॥ चतुःषष्टिलक्षमितं पुष्करद्वीपमाययौ । मेखलावत्तस्य मध्ये पर्वत चक्रपोपमम् ॥५८॥ मानसोत्तराचलाख्यं तं ददर्श रघूद्वहः । द्वे वर्षे तत्र वै प्रोक्ते पूर्वं रमणकं शुभम् ॥५९॥

व‌ह्निके देवता हैं । उस द्वीपमें भी बड़े-बड़े सात देश हैं । उन बनतांन है—॥३९॥ आम्र, मधुष्ट, मेघपृष्ठ, सुधामा, भ्राजिष्ठ, व्यतिहाय और वनस्पति । ४०॥ ये सा कौंचद्वीपके सात देश हैं वर्धमान, भोजन, उपवर्हण, नन्द नन्दन, सर्वतोभद्र और शुक्ल ये सात स्थिर रहने वाले शोभन इस द्वीपको घेरे हुए हैं । ४१ ॥ ४२ ॥ अमृता, अमृतौघा, आरंभा, सुवर्णा, वृष्टिरूपवती, पवित्रवती और पुण्या ये पवित्र नदियां उन सातो देशामें बहती हैं। जिनम स्नान करनस समस्त पातक नष्ट हो जाते हैं ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ इन सातों देशोंके राजाओंसे रामनं कन्या-रत्नोंको प्राप्त किया और उन राजाओंने रामकी पूजा की ॥ ४५ । तत्पश्चात् रामने क्रौञ्चद्वीपके अधीशमको संग्रामभूमिमें परास्त किया और उनपर प्रसन्न होकर, घोड़े, रथ, ऊंट आदिका उपहार पाकर पूजित हुए ॥ ४६ ॥ स्तुतिपाठकजनोंके द्वारा कीर्तिगायन सुनकर रामचन्द्रजी परम प्रसन्न हुए इसके बाद क्षीरोदनामक समुद्रको पार करके क्रौञ्चद्वीपके समान ही बत्तीस लाख योजनक लगभग विस्तृत शाकद्वीपमें गये। जहाँपर द्वीपके नामकी भाँति वटवृक्षके समान बहुत बड़ा ही सुन्दर शाकवृक्ष है । ४७-४८ ॥ वहाँपर वायुरूप धारण करनवाले विष्णुभगवान्‌के उपासक रहते हैं । उस द्वीपके जो सात देश हैं, उनको कह रहा हूँ ॥ ४९ ॥ पुरोजव, मनोजव, पवमान, धूम्रानीक, चित्ररूप, बहुरूप और विद्याधार ये ही सात देश हैं। अनघा, आयुर्दा, उभयसृष्टि, अपराजिता, पञ्चपदी, सहस्रश्रुति तथा निजवृत्ति ये नदियाँ उन सातो देशामें बहती हैं। उरुशृङ्ग, बलभद्र, शतकेसर, सहस्रस्रोत, देवपाल, महानस और ईशान ये सात पर्वत इन देशोंकी सीमापर स्थित हैं। उन सातों देशोंके राजाओंने रामका पूजाकी और सुन्दर नामक महाबली अर्द्धस्वरयसे उन्होंने सात दिन पर्यन्त युद्ध करके हरा दिया ॥ ५०-५६ ॥ इसके बाद उसन भी रामकी पूजा की । रामके इस मनुष्यसे प्रसन्न होकर देवताओंने दुन्दुभी बजायी । तत्पश्चात् बत्तीस लाख योजन विस्तृत दधिमण्डोद नामक समुद्रको पार करके चौसठ लाख योजन विस्तृत पुष्करद्वीपमें पहुंचे, जिसके मध्यमे मेखलाके समान मानसोत्तर

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