श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १०] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) १४७
तया वह्नौ ज्वालनीयं शृण्वीयं प्रयत्नतः। मर्त्तानपि नृपा भूम्यां श्राव्य दुंदुभिनिःस्वनैः॥९०॥
न कस्यापिशवं दग्धं क्वापि कार्यं जनैरिति। तथेति राघवं चोक्त्वा दूतैः संश्राव्य उद्भवः ॥९१॥
सुमंत्रः सकलान् भूस्थान् साकेते न्यवसन्सुखम्। रामोऽपि पुष्पकेनैव पश्चिमां चोत्तरां दिशम् ॥९२॥
पूर्वामपि शनैः पश्यन् दक्षिणाभिमुखो ययौ। एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां पञ्च शवानि हि ॥९३॥
समानीतानि तैलस्य द्रोण्यां तान्यपि पूर्ववत्। सुमंत्रः स्थापयामास श्रीरामस्याज्ञयाऽऽदरात् ॥९४॥
तेषु पञ्चसु चैकैकं चैकं मधुपुरि स्थितम्। क्षत्रियस्य च तज्ज्ञेयं समानीतं सुहृज्जनैः ॥९५॥
प्रयागस्य द्वितीयं च शवं वैश्यस्य तत्स्मृतम्। पूर्वं वयसि पञ्चत्वान्ममर्त्ताने हि तज्जनैः ॥९६॥
हस्तिनापुरगस्थं तत्तृतीयं शवमीरितम्। तैलकारस्य तज्ज्ञेयं समानीतं हि तज्जनैः ॥९७॥
शवं चतुर्थं तज्ज्ञेयं हरिद्राग्रस्थितं द्विज। लोहकारस्तुपायाथ समानीतं हि तज्जनैः ॥९८॥
उज्जयिन्याश्च पञ्चमं च शवं ज्ञेयं महामते। चर्मकारदुहितायाः समानीतं हि तज्जनैः ॥९९॥
एवं पञ्च शवान्यानन् पूर्वे द्वे ब्राह्मणस्य च। सप्तायोध्यापुरीमध्ये शवान्येवं स्थितानि हि ॥१००॥
रामोऽपि दण्डकं पश्यन् स बभ्राम समंततः। अथो विन्ध्याचल धीमान् रेवायाश्चापिप्लुतः। १०१।
तत्र वृक्षे लंबमानं धूमं पातुमधोमुखम्। शूद्रं निरीक्ष्य स्वर्गोच्छे न इनुं समुपस्थितः। १०२।
तदा तं राघवः प्राह भो शूद्र शृणु मद्वचः। ब्राह्मणादितिभिर्विप्रैस्तपः कार्यं न चेतरैः ॥१०३।
शूद्रेण द्विशुश्रूषा सदा कार्याऽतिभक्तितः। द्विजकृत्यं त्वया चात्र कृत पापमना अह ॥१०४॥
इदानीं त्वां हनिष्यामि जीवायिष्यामि तान्मृतान्। तुष्टोऽहं त्वां न्वनपमा वरं वरय वाञ्छितम् ॥१०५।
इति रामवचः श्रुत्वाऽधोमुखो रामपादजः। उवाच भयभीतः सन्नन्या गर्प सुदुर्मदः ॥१०६॥
राम रावणदर्पघ्न यदि तुष्टोऽसि मां प्रभो। तर्हि ते वध्यामद्य येन शुद्धगतिर्भवेत् ॥१०७॥
जबलक मैं लौट न आऊं तबतक तुम किसी भी शवका अग्निसंस्कार न करने देना ॥८२-८९। साथ ही मेरे राज्यमें यह दुंभी पिटवा दो कि जबतक मैं लौट न आऊं तबतक कोई भी शव न जलाया जाय। सुमन्त्रने रामकी आज्ञा स्वीकार करके दूतों द्वारा डिंडिम पिटवाकर रामकी यह आज्ञा सब लोगोंको सुनवा दी और आनन्दपूर्वक राज-काज देखते हुए रहने लगे। उधर रामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठकर पश्चिम तथा उत्तरकी दिशाओंको धीरे-धीरे अच्छी तरह देखते हुए दक्षिण दिशाकी ओर बढे। इसी बीच अयोध्यामें पाँच शव और आकर एकत्र हो गये। उन्हें भी सुमन्त्रने पूर्ववत् तेलकी नौकाके रखवा दिया ॥९०-९४॥ उन पांचोंमेंसे एक शव मधुपर गन्धर्व रहनेवाले एक क्षत्रियका था। जिसे उसके सुहृज्जन रामके दरबारमें ले आये थे। दूसरा शव प्रयागनिवासी एक वैश्यका था थोड़ी ही अवस्था में उसकी मृत्यु हो गयी थी। इसी लिए उसके घरवाले रामके पास ले आये। तीसरा शव हस्तिनापुरनिवासी एक तेलीका था। उसे भी उसके घरवाले रामके पास ले आये थे। चौथा शव श्रृंगवेरपुरनिवासी एक लोहारका पुत्र/मृतक था। पाँचवां शव उज्जयिनीनिवासी एक चमारकी लड़कीका था और इसके घरवाले उसे अयोध्या ले आये थे। इस प्रकार ये पांच शव तथा पूर्वके दो ब्राह्मणके शव मिलाकर अब कुल सात शव एकत्र हो गये ॥९५-१००॥ राम-चन्द्रजी भी दण्डकारण्यमें अच्छी तरह घूमकर रेवानदीमें पवित्रयुक्त विन्ध्यपर्वतकी ओर बढ़े वहाँ उन्होंने देखा कि एक शूद्र उलटा टंगा है और नीचे आगकी धूनी धधक रही है। वह शूद्र धुआँ पीता हुआ मुँह बाये लटका हुआ है। इस प्रकारकी उग्र तपस्या करके स्वर्ग चाहनेवाले उस शूद्रको राम मारनेके लिए तैयार ही गये और उसके पास आकर कहने लगे-हे शूद्र ! ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य इन तीनों वर्णोंके लिए ही तपस्या करनेका विधान है, शूद्रके लिए नहीं। तुम्हें तो सर्वदा इन तीनों वर्णोंकी सेवा करनी चाहिए। अरे नह! तुझ पापीने अपने धर्मका उल्लङ्घन करके द्विजोंके समान कर्म किया है ॥१०१-१०४॥ इस समय मैं तुझे मारकर उन लोगोंको जीवित करूँगा जो तेरे धर्मविरुद्ध आचरणसे अकालमृत्युके ग्रास बने हैं। मैं तेरी इस तपस्यासे प्रसन्न हूँ। बोल, तेरी क्या कामना है ? इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर भयभीत हो