भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४५८ आनन्दरामायणे [ सर्ग १०

ममापि येन कीर्तिः स्यात्तं वरं दातुमर्हसि । इति शूद्रवचः श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीद्वचः ॥१०८॥ मम रामेति यन्नाम तच्छूद्रैः सर्वदैव हि जपनीयं कीर्तनीयं चिंतनीयं मुहुर्मुहुः ॥१०९॥ भविष्यति मतिस्तेषामनेन मम्परे भव तवानेनोपकारेण कीर्तिः शूद्रेषु वै भवेत् ॥११०॥ इति रामवरं श्रुत्वा पुनः शूद्रोऽब्रवीद्वचः । शूद्राः कलौ मंदधियो भविष्यन्ति रघूत्तम ॥१११॥ व्यग्रचित्ता भविष्यन्ति कृषिकर्मादिभिः प्रभो । तदा तेषां कुतो बुद्धिर्जपादिषु भविष्यति ॥११२॥ अतस्तदनुरूपोऽद्य वरो देयो विचार्य च । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा रामस्तुष्टोऽब्रवीत् पुनः ॥११३॥ परवन्दनकालेषु रामरामेति सर्वदा । शूद्रा वदंतु सर्वत्र तेन तेषां गतिर्भवेत् ॥११४॥ तवापीय कथाकीर्तिः स्मारयिष्यति मद्द्विजाः । त्वं मया निहतस्त्वद्य वैकुंठं प्रति यास्यसि ॥११५॥ पुनर्ययाचे श्रीराम वरमन्यं स्वकांक्षया । अस्मिन् क्षेत्रे सदा तिष्ठ सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥११६॥ अंशतन्ते पूर्वमेव दर्शनं मम ये नराः । करिष्यन्ति ततः पश्चाद्ये नरास्तव दर्शनम् ॥११७॥ कुर्वन्ति सहितं भक्त्या मोक्षमेव व्रजंति ते । मदंशनं विना मन्याँस्त्वा पश्यन्त्यविचारतः ॥११८॥ तेषामुद्धरणं राम कुरु मद्द्वचनात् प्रभो । तथोवाच तदा रामो भक्ति तस्मै ददौ हरिः ॥११९॥ इति कृत्वा सुसंतुष्टं हत्वा शूद्रं रघूत्तमः । जीवयामास विप्रादीन्मम साकेतमर्थिनान् ॥१२०॥ तदारभ्यात्र शूद्रेस्तु विष्णुदासावनीतले । परवन्दनकालेषु रामरामेति कीर्त्यते ॥१२१॥ तं हत्वा रघुवीरः स परिनृत्य मुदान्वितः । सीतां नानाकौतुकानि दर्शयन्स्वपुरीं ययौ ॥१२२॥ एतस्मिन्नंतरे मार्गे गृध्रोलूकौ विरोधिनी । विवदमानौ समेत्य रामपादं द्रष्टुमागतौ ॥१२३॥ तानुवाच रघुश्रेष्ठः किमर्थे हि युवामुभौ । विवदमानौ संप्राप्तौ मां ब्रून्तन्त्वद्य विस्तरात् ॥१२४॥

और नीचा मस्तक किये हुए बार-बार प्रणाम करके उस शूद्रने कहा—हे रावणके अभिमानको दूर करनेवाले राम ! यदि वास्तवमें आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह वरदान दीजिये कि जिससे शूद्रजातिकी भी सद्गति प्राप्त हो, साथ ही मेरा भी उद्धार हो जाय। इस तरह शूद्रकी दीनतापूर्ण बात सुनकर रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे—। १०५-१०८ ।। 'राम' इस पवित्र नामको वे शूद्र सदा जप, कीर्तन तथा चिन्तन करते रहेंगे, उन लोगोंको सद्गति प्राप्त होगी और तुम भी इस तपस्याको छोड़कर मेरा चिन्तन करो। तुम्हारे इस उपकारसे शूद्रोंमें तुम्हारी कीर्ति होगी। इस प्रकार रामचन्द्रजीके द्वारा वर पाकर शूद्रने कहा—हे रघूत्तम ! आगे महाभ्रष्ट कलिकाल आनेवाला है। उसमें शूद्रजातिके लोग बड़े मूर्ख होंगे। वे सर्वदा अपनी खेतीबारीके काममें ही व्यस्त रहेंगे। ऐसी अवस्थामें उन्हें जप तथा कीर्तन करनेका अवसर ही कहाँ मिलेगा इन शुभ कर्मोंपर और उनकी बुद्धि कैसे जायगी। अतएव उनके अनुरूप कोई वरदान दीजिए। शूद्रकी यह बात सुनकर तो प्रसन्न होकर रामने कहा कि वे लोग एक-दूसरेको प्रणाम-वार्ता करनेके समय 'राम-राम' ऐसा कहेंगे इससे उनका उद्धार हो जाया करेगा ।। १०९-११४ ।। उस शूद्रसमाजमें तुम्हारी बड़ी कीर्ति होगी। आज तुम हमारे हाथसे मरकर वैकुण्ठधामको प्राप्त होओगे। इसके अनन्तर उसने रामसे यह वर माँगा कि आप सीता तथा लक्ष्मणके साथ सर्वदा इस दर्भनगर निवास करें ॥ ११५ ॥ ११६ ॥ जो लोग यहाँ आकर पहले मेरा दर्शन करनेके पश्चात् आपका दर्शन करें, उनको मोक्षपद प्राप्त हुआ करे। इसके सिवाय जो लोग क्रमवर्ण बिना मेरा दर्शन किये ही आपका दर्शन कर लें उनका भी उद्धार हो जाय। रामने 'तथास्तु' कहकर भक्तिका वर दिया और उसे मारकर उन अकाल मृत्युसे मरे हुए लोग को जीवित किया, जो ब्राह्मण-क्षत्रियादि सात वर्षकी अवस्थामे मर पड़े थे ॥ ११७-१२० । हे विष्णुदास ! तभीसे इस पृथ्वीतलमे शूद्रलोग आपसमें प्रणाम-आशीषके अवसरपर 'राम-राम' कहा करते हैं। शूद्रको मारकर हर्षपूर्वक रामचन्द्रजी सीताको रास्तेके अनेक मनोहर दृश्योंको दिखाते हुए अयोध्याके लिए लौट पड़े। उसी बीच एक गृध्र और उलूक परस्पर विवाद करते हुए रामके दर्शनोंके लिए उनके सम्मुख आये। रामने उन्हें देखकर