श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १० ] रामाश्वमेधम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४४९
तद्वाक्यवचनं श्रुत्वा तदोलूकोऽब्रवीत् प्रभुम् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥ १२५॥ तत्कालेन मया त्यक्तं तत्र गृध्रोऽस्ति संस्थितः । नानेन दीयते मद्य मम गेहं रघूत्तम ॥१२६॥ तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रमाह रघूद्वहः । किमर्थं दीयते नास्य त्वया गृध्र गृहं वद ॥१२७॥ तदा गृध्रोऽब्रवीद्वाक्यं राघवं दीर्घनिःश्वसन् । मया पूर्वं कृतं राम नगोपरि गृहं वने ॥१२८॥ तत्कालेन मया त्यक्तं तदोलूकः कियद्दिनम् । स्थितस्तेनापि त्यक्तन्तं तत्राहं संस्थितः पुनः ॥१२९॥ वृथायं स्पर्द्धते राम मन्वा गेहं ममेति च । मध्यमं कुरु राजेन्द्र त्वद्वंशेऽभून्न पातकी ॥१३०॥ तावुवाच रघुश्रेष्ठो युष्मभ्यो हि यदा गृहम् । कृतं नद्याश्च कः साक्षी तदा तौ नेति वोचतुः ॥१३१॥ विमानस्थांस्तदा सर्वान्प्रापवः प्राह सस्मितः । इदमप्यत्र सम्प्राप्तं दुर्घटं मां पुरःस्थितम् ॥१३२॥ कथं न्यायोऽत्र वै कार्यः कस्मै गेहं प्रदीयताम् । तद्रामवचनं श्रुत्वाऽप्यन्येऽप्यतिविस्मिताः ॥१३३॥ तदोलूकं विभुः प्राह कृतं गेहं त्वया कदा । उलूकः प्राह भूश्चैव यदा जाता तदा कृतम् ॥१३४॥ तदुलूकवचः श्रुत्वा गृध्रं समवलोकयत् । गृध्रः प्राह यदा चेयं महानीरेऽवनिस्तदा । १३५॥ भूतधात्रे कृतं विद्धि पुरं गेहं मया विभो । तद्गृध्रवचनं श्रुत्वा तदा तं प्राह राघवः ॥१३६॥ कथं विनाऽऽश्रयेणासीन्महानीरे नगन्ददा । नौकाऽक्षयवटः सोऽपि वृक्षाक्षम्भवता स्मृतः ॥१३७॥ तस्माद्मृषा त्वया गृध्र स्पर्धतेऽनेन निश्चितम् । वृथाऽयं तत्र वाक्येन धिक् त्वां दुष्टपत्रीणम् ॥१३८॥ इत्युक्त्वा राघवो दूतैस्तं गृध्रं पर्वतोपरि । त्रिशूलाग्रेषु चारोप्य प्रपन्नाम स्वं पदम् ॥१३९। धन्यः स गृध्रो विज्ञेयो रामाग्रे यस्य वै मृतिः । अभूद्दर्शनमप्या यस्य देहविसर्जने ॥१४०॥
कहा कि तुम लोग क्यों लड़ रहे हो ? मुझे विस्तारपूर्वक कारण बतलाओ ॥ १२१-१२४ ॥ रामकी बात सुनकर उलूकने कहा कि मैने एक वृक्षपर रहनेके लिए एक घोंसला बनाया था। कालवश उसी समय उसे छोड़कर मुझे स्थानान्तरको चला जाना पड़ा और यह गृध्र उसमें रहने लगा। अब मेरे मागनेपर यह मुझे मेरा घोंसला नहीं दे रहा है। इस प्रकार उलूककी बात मानकर रामने गृध्रसे कहा कि तुम इसका घोंसला इसे क्यों नहीं देते ? गृध्रने तड़पकर कहा- हे राम ! बहुत दिन हुए वृक्षपर यह घोंसला बनाया था। कुछ दिनोंके लिए मैं बाहर चला गया तो यह उलूक उसमें रहने लगा। फिर वह जब उसे छोड़कर कहीं चला गया तो मैं आकर अपने घरमें रहने लगा। यह व्यर्थ हमसे लड़ाई कर रहा है। हे राम ! इसको बातोंमें आकर कहीं आप अधर्म न कीजियेगा। क्योंकि आपके वंशमें कभी कोई पातकी नहीं हुआ है ॥ १२५-१३० ॥ उन दोनोंसे रामने कहा कि तुमने उस घोंसलेको बनाया था, इसका कोई साक्षी दे सकते हो ? इस प्रकारके प्रश्न होनेपर वे दोनों चुप हो गये। क्योंकि उन दोनोंके पास कोई गवाह नहीं था। ऐसी दशामे मुसकराते हुए रामने विमानपर बैठे हुए लोगोंसे कहा कि यह विकट समस्या आगे आ गयी है। इस झगड़ेका कैसे न्याय हो ? किसको वह घोंसला दिया जाय ? इस तरह रामकी बात सुनकर सब लोग भौंचक्के रह गये। किसीको कोई युक्ति नहीं सूझी ॥ १३१-१३३ ॥ फिर रामने उलूकसे कहा कि तुमने कब अपना घोंसला बनाया था। उसने उत्तर दिया कि मैने अपना निवासस्थान उस समय बनाया था, जब इस पृथ्वीकी रचना हुई थी। इस प्रकार उलूककी बात सुनकर रामने गृध्रकी ओर देखा। गृध्रने उत्तर दिया कि मैंने उस घोंसलेको आम्रके वृक्षपर उसी समय बना लिया था, जब पृथ्वी जलमग्न थी- उसका उद्धार ही नहीं हुआ था। गृध्रसे रामने कहा कि जब पृथ्वीकी उत्पत्ति ही नहीं हुई थी, तब वह आम्रका वृक्ष जिसके सहारे खड़ा था, वृक्षोम तुमने अक्षयवट भी नहीं बताया जो किसी तरह रह भी जाता है। इसलिए मालूम पड़ता है कि तुम्हारी बात झूठ है। तुम उलूकको व्यर्थ सता रहे हो। तुम जैसे दुष्ट पक्षीको धिक्कार है ॥ १३४-१३८ ॥ इतना कहकर रामने दूतों द्वारा गृध्रको शूल पर चढ़ाकर उसे अपना परम पद दे दिया। वह गृध्र धन्य था, जिसकी मृत्यु रामके सम्मुख हुई और रामका दर्शन करते हुए उसने अपने प्राणोंका परित्याग किया। इस प्रकार उसे