भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

४६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

एकाकी हयमारूढो विवेश गिरिगह्वरम् सर्व व्याधाश्च दूताश्च लक्ष्मणाद्याश्च बान्धवाः ॥२५॥
रामादर्शनमग्नांस्ता बभ्रमुस्त इतस्ततः। अथ रामः केसरीणं जघान निशितपत्रिणा ॥२६॥
ततः स दिव्यरूपेण नत्वा प्राह रघूत्तमम् । पुरा विद्याधरश्चाहं मया भुक्ता पतिव्रता ॥२७॥
मुनिपत्नी हठेनेव तया शप्तस्त्वहं क्रुधा। सिंहत्वन्निग्रहो यस्मान्मया मयि कृतोऽद्य हि ॥२८॥
अतस्त्वं मन्दिरात्सिंहा भवाग्रेऽथ महारने। तदा मया प्रार्थिता सा पुनर्मामाह राघव ॥२९॥
चिराद्रामशरस्पर्शाच्छापान्मुक्तिर्भवेत्तव । अतोऽद्य त्वच्छरस्पर्शाच्छापान्मुक्तश्चिरादहम् ॥३०॥
इत्युक्त्वा राममामन्त्र्य स स्वर्गं प्रययौ मुदा । ततः स रामचन्द्रोऽपि तुरगस्थो मुदान्वितः ॥३१॥
तत्र तस्थौ क्षणं यावद्यावत्तद्रिरिगह्वरे। गुहाद्वारे शिलामेकां ददर्श योजनायताम् ॥३२॥
महतीं तां शिलां दृष्ट्वा रामो विस्मितमानसः। धनुष्कोट्याऽक्षिपद्दूरं गुहायां प्रविवेश ह ॥३३॥
कियद्दूरं ततो गत्वाऽग्रे प्रकाशं ददर्श सः। तत्र द्रोण्यां पवनस्य तपस्यन्त्यः स्त्रियः प्रभुः ॥३४॥
ददर्श रामश्चतस्रः किंचिदन्तरसंस्थिताः । अस्थिचर्मावशिष्टैश्च देहैर्दृग्गोचरीकृताः ॥३५॥
घर्मैः सजीविताश्चेति ज्ञात्वाम्ना रघूत्तम. ॥३६।
निजरूपाणि चत्वारि कृत्वादौ तत्पुर स्थितः । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं भिन्नरूपेण ताः पृथक् ॥३७॥
वरयध्वं वरान्नार्यः प्रसन्नोऽहं रघूत्तमः । ततस्ता रामसंस्पर्शान्मांसकादिधातुभिः । ३८।
पूरितानि शरीराणि ददृशुर्नयनैर्निजैः । श्रुत्वा तद्रामवाक्यं तास्तदा स्वपुरतोऽक्षिभिः ॥३९॥

मँदा नाला बह रहा था बहुतसे कँटीले वृक्षोंकी झाड़ियां इसके आसपास लगी थीं। आगे बांसके दरोंत-की दीवारें खड़ी थीं और झांड्य तथा व्याघ्र आदि हिंसक जीव उभय भरे पड़े थे। ऐसी अवस्थामें भी राम उसके पीछे-पीछे दौड़त चल जा रहे थे। उस समय रामचन्द्रजी अपने साथियोंसे बिछुड़कर बहुत दूर निर्जन वनमें उसके साथ निकल गये । अन्तमें वह सिंह पर्वतकी एक विशाल कन्दरामे घुस गया और रामचन्द्रजी भी घोड़ेपर चढ़े हुए उसके साथ कन्दरामे घुस गये । इधर रामके लक्ष्मणादि भ्राता, उनके दूत तथा शिकार खेलानेवाले बहलिये घबड़ाकर रामको इधर-उधर खोजने लगे। उसी समय रामने सिंहको एक विकराल बाणसे मारा ॥ २५-२६ ॥ तब वह एक दिव्य पुरुषके रूपमे परिणत हो और उनको प्रणाम करके कहने लगा हे राम मै पहिले विद्याधर था ; मैंने एक बार एक पतिव्रता मुनिपत्नीके साथ हठात् भोग किया। जिससे कुपित होकर उसने मुझे शाप दे दिया कि तूने सिंहके समान बरबस मेरी आबरू उतारी है, इसलिए मेरा बाण से तू व्याघ्र सिंह हो जा। इस प्रकार शाप का जानेपर मैने उससे विनती की तो उसने कहा कि बहुतसे बहुत दिनों बाद जब रामचन्द्रजी तुझे अपने बाणसे मारेंगे तब तू शरस्पर्श होते ही शापसे मुक्त हो जायगा। सो बहुत समय बाद आपकी दयासे मै आज उस शापसे मुक्त हो गया। इस तरह अपना पूर्ववृत्तान्त सुनानेके बाद उसने रामसे आज्ञा मांगी और अपने लोकको चला गया । रामचन्द्रजी अपने घोड़े-पर बैठे ही बैठे थोड़ी देर वहाँ ठहर हो उन्होने क्या देखा कि उस गुहाद्वारपर याजनो लम्बी चौड़ी एक शिला लगी हुई है। इतनी बड़ी शिला देखकर राम विस्मित हुए और अपने धनुषकी कोरसे उसे दूर हटा दिया । तब वे उसके भीतर घुसे । कुछ दूर आगे जानेपर उन्हे कुछ प्रकाश सा दिखायी पड़ा। और आगे बढ़े तो उन्होंने क्या देखा कि चार स्त्रियां तपस्या करती हुई बैठी हैं उनके शरीरमे हड्डी और चमड़ेके शिवाय मांसका नाम भी नहीं था। उनका श्वास चल रहा था। इससे उनको यह ज्ञात हुआ कि वे स्त्रियां अभी मरीं नहीं, प्रत्युत जीवित हैं। ऐसी अवस्थामें रामने अपना चार शरीर बनाया और सबके सम्मुख जाकर कहने लगे - 'हे नारियों! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मांग लो। मै राम तुम लोगोंको तपस्या-से प्रसन्न हूं।' इसके अनन्तर रामने अपने हाथो उनके शरीरका स्पर्श किया । जिससे उनकी सूखी देहमे रक्त-मांसादिका संचार हो गया ॥ २७-३८ ॥ शरीर भर जानेपर उन सबोने अपने नेत्रोसे रामको देखा । उस समय प्रत्येक स्त्रीके सामनेवाले राम कोटि सूर्यकी दीप्तिके समान देदीप्यमान