श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
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सर्गः ११ ] राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धम् । ४५१
नार्यो विलोकयामासुः सर्वाः सांगुष्ठसायकान् । कराकृष्टधनुर्दण्डान्खड्गहस्तान्निशितैरसिभिः ॥४०॥
हयारूढान्नरवेषेण सर्वासां पुरतः स्थितान् । समुत्तस्थुर्जवेनैव दृष्ट्वा कञ्जलोचनाः ॥४१॥
अतिविस्मयमापन्नास्तदाऽपृच्छन्पृथक् पृथक् । के यूयं क्व गमिष्यध्वं कुतः खलु समागताः ॥४२॥
यूयं देवा दानवा वा सम्यग्ने स्वाधुना पुरः । ब्रूतानृतं वचः सर्वं यद्वै नः प्रतिभासते ॥४३॥
अस्माकं दुःशरीराणि कमनीयानि वै कथम् । जानीथ यद्यसौ दुष्टो दुन्दुभिर्जीवति वा मृतः ॥४४॥
इति तासां वचः श्रुत्वा राघवस्ता वचोऽब्रवीत् । अहं सूर्यकुले जातो रामो नाम्ना न संशयः ॥४५॥
सम्राडधिपतिः श्रीमान् सूर्यवंशसमुद्भवः । मृगयार्थमिहायातः केशरी निहतो वने ॥४६॥
धनुष्कोट्या शिलां स्पृष्ट्वा क्षिप्त्वा चोपरिभागतः । त्यक्त्वा त्वं निःशनैर्गत्वा गुहायान्निर्गताः स्म हि ॥४७॥
मया कृतानि युष्माकं गात्राणि सुदृढान्यतः । स मया निहतो वाली रावणस्थानकारकः ॥४८॥
समाश्विता वरान्दातुं यूयं नेत्रा भयाऽद्य हि । नात्रोऽस्ति मम कार्यं हि परस्वर्ग्यं पुरीं व्रजे ॥४९॥
यत्पृष्टं तन्मया चोक्तं का यूयं कथ्यतां मम । किमर्थं दुन्दुभिः पृष्टः का वांछा प्रियतां वरान् ॥५०॥
तद्राघववचः श्रुत्वा दुन्दुभिर्निहतोऽभवत् । शिलां निष्कास्यतां चापि सर्वास्तु प्रमदा ययुः ॥५१॥
ऊचुः सर्वास्तदा राममानन्दोत्फुल्ललोचनाः । वयं ब्राह्मणपुत्र्यश्च चत्वारस्त्वथ पाठकाः ॥५२॥
सहस्राणि नृपाणां च कन्यानां कश्यपात्पुरः । समानीता बलाइव तेन दुन्दुभिना प्रभो ॥५३॥
लक्ष्म्यामितिविवाहार्थं सप्तानां कदिने सहन् । कृशोऽस्मीति मन्यमानः श्रीरन्वान्ने नहार सः ॥५४॥
यानि यानि जहार स्त्रीरत्नानि रघुनन्दन । अस्यां द्रोण्यां स्थापयित्वा दत्त्वा द्वारं शिलावगम् ॥५५॥
अचलां स्थण्डिलान्यैश्च क्षीरः समानेतुमनादरम् । पुनःशरं गतो दैत्यो वयमत्रैव संस्थिताः ॥५६॥
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हो रहे थे और धनुष-बाण तथा तलवार लिये हुए थे । ३९ ॥ ४० ॥ वे मनुष्यका वेश धारण करके घोड़ेपर सवार होकर एकाएक स्वच्छन्द उन बाणोंके सम्मुख लड़े थे और उन सब स्त्रियोंका भी समान स्वरूप था और एक ही तरहकी वेष-भूषा थी । ऐसे रामको देखकर उन स्त्रियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ और वे कहने लगीं— "आप लोग कौन हैं ? घोड़ेपर सवार होकर कहाँसे आप आ रहे हैं ? आप सब देवता हैं या दानव ? आप कहाँ जायेंगे ? कृपया हम यह भी बतलाइये कि आप हमसे क्यों बात करना चाहते हैं ? हम लोगोंका यह हीन-शीर्ण शरीर इस प्रकार सुन्दर कैसे हो गया ? वह दुष्ट दुन्दुभि जीवित है या मर गया ?" ॥ ४१-४४ ॥ इस प्रकार उनका बात सुनकर रामने उन सबसे कहा 'सूर्यवंशमें उत्पन्न और सीता डोपके अधिपति हम राम नामका मैं एक राजा हूँ । इस समय अपने एक ही रूपको चार भागों में विभक्त करके तुम सबके सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ । मैं यहाँ जङ्गलमें शिकार करने आया था और उसी कन्दरामें मैंने एक सिंहको मारा है । फिर तुम्हारे गुफा द्वारपर एक लम्बा-चौड़ी शिला देखा । उसे अपने धनुषका अग्रसे दूर हटाकर तुम्हारे समीप आया और अपने हाथके स्पर्शसे तुम्हारे जर्जर अंगों शरीरोंको पवित्र तथा सुन्दर बना दिया है । दुन्दुभी राक्षसको बालिने मार डाला । रावणका विनाश करनेके निमित्त मैंने उस बालिको भी मार डाला है ॥ ४५-४८ ॥ केवल तुम्हें वरदान देनेकी इच्छासे मैंने तुमसे संभाषण किया है । अब यहाँसे आगे जानेका हमारा कोई कार्यक्रम नहीं है । इससे अपनी अयोध्या नगरीको लौट जाऊँगा । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा, मैंने उसका उत्तर दे दिया । अब यह बताओ कि तुम कौन हो ? दुन्दुभीको तुमने क्यों पूछा ? तुम्हारा क्या कामना है ? इच्छित वर मुझसे माँग लो ।" जब उन सबने रामके मुखसे यह सुना कि दुन्दुभी मार डाला गया और हमारे द्वारपर लगी हुई शिला भी हट गयी है तो वे बहुत प्रसन्न हुईं और आनन्दमें प्रफुल्लित होकर उन्होंने कहा हे नाथ ! बहुत दिन हुए वह दुन्दुर्भ राक्षस हम चार ब्राह्मणकी पुत्रियों तथा सोलह हजार क्षत्रियों तथा वैश्योंकी कन्याओंको हर लाया था । उसकी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं एक ही दिनमें एक लाख स्त्रियोंके साथ विवाह करूँगा । इसी विचारसे वह अच्छे-अच्छे कन्याओंका अपहरण किया करता था ॥ ४९-५४ ॥ हे रघुनन्दन वह जिन सुन्दरियोंको लाता था, उन्हें इसी कन्दरामें डालकर दरवाज़ेपर एक इतनी बड़ी शिला लगा दिया करता