भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ११ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४५१

विटपोद्गीर्णसंस्वस्तलीनकेफिकुलाकुलाम् । हरिणीगणसन्त्रस्तां धावच्छायाददिश्रुताम् ॥९॥ क्वचित्केतच फूत्कारक्षिप्त गर्भावभीपनाम् । खड्गयूथैः क्वचिल्लक्ष्मीं दधानाभिव दन्तिनाम् ॥१०॥ क्वचित्कोटरमविशुक्रां नदत्पिनादिनाम् । मृग लिप्तमुदाभिमृदितां च क्वचित् क्वचित् ॥११॥ शार्दूलनखनिभिन्नरोहिद्रक्तारुणां क्वचित् । पायश्त्वङ्कभारानमुक्तिक्ष्मधविवाग्रजैः ॥१२॥ अवराधांग्लरोधाणि सुखपन्तीमिव क्वचित् । क्वचिदुवृक्षघमच्छायां वनपुष्पसुगन्धिनीम् ॥१३॥ क्वचिन्नागदशारमूमण्डलमवोरगाम् । सर्पनिःसुवनिर्मोकनागभीषणमण्डिताम् ॥१४॥ वृत्तस्याजगरं व्याप्तां क्वचिन्निर्मुक्तसर्पवीम् । क्वचिद्दावानलज्वालाशिग्वाद्याममहीरुहाम् ॥१५॥ ज्वलन्तिकुंजानिर्गच्छद्धरूपाश्रमसङ्कटाम् । व्यमुंचंस्तु शुनां यूथं शशकेषु कचित् कचित् ॥१६॥ पल्वलेषु च विश्रांतः पुनर्याति वनान्तरम् । ततो मध्याह्नसमये निवासं सरसस्तटे ।१७॥ कारयामास सेनायाः सीतायाश्च रघूत्तमः । स्वयं मृगद्वयोत्क्रीडामारभेटसुहृदंगतः ।१८॥ दूरस्थं मृगशरेण मुक्त्वा बाण जघान तान् एवं खेलति राजेंद्रै व्याघ्रगर्जं च वै द्विज ।१९॥ तत्र कोलाहलत्रस्तः पंचरभ्यो निर्गतो वनात् । स केसरी महावेगार्नाक्षाद्दष्ट्रा भयावहः ।२०॥ स्फुरद्दशममात्रौंतदुर्गममार्गमोहितः । कदाचिद्रगमासूढः कदाचिद्भूमिमाश्रितः ॥२१॥ न रयालश्यतां याति धन्विनां पृष्ठगामिनाम् । क्वचिद्दूरानिपथ याति दर्शनागोचरः क्वचित् ॥२२॥ वक्रमोद्योजितगंभीर कंटकीद्रुमसंकुलम् । शुकव्याघ्रममाकीर्ण पर्वतंञ्च भयंकरम् ॥२३॥ प्रविष्टो विषमरण्यं गमस्तस्य पदानुगः । दूरद्दूरं ततो गत्वा देशादेशं च निर्जनम् ॥२४॥

ठाठोंको छोड़कर दूसरेमें और दूसरेको छोड़कर तीसरेमें, इस तरह बार बार इधर उधर वनस्थलीमें दौड़ रहे थे ॥ ४-८ ॥ उस समय वही श्रृंगोपर रहनेवाले मयूरके परिवार भार दूषक वृक्षके शाखाम छिप जाने, हरिणियों चकित नत्राम इधर-उधर निवृत्त हुई भाग जाती, वनले जाब कालाहदृस त्रस्त होकर अपनी शौडसे निकल परन्त कही अपत्न विशम निकलकर सवपना फुफकार मारते थे ओर कश दौगुराकी भल्यन सनकर सुनाई देती थी। वही गेंडेके समान शोभाको धारण किये हुए हाथी भाव रहे थे, कही काटग्मे बेठे हुए तीन अनेक प्रकारकी बोलियां बोल रहे थे कही शरात्र पैशके निसान दिखाई देते थे ओर कही कियी सिंहके द्वारा मार गये हरिएाके रुधिरसे पृथ्वी रक्तवण हा गयी थी। कहीकी भूमि बड़े-बड़े स्तनोवाले भसांसे अन्त पुरके आंगनसदृश बाम सरला थी ओर कहीके पृथ्वी पन वृक्षाक छिपात छायामय्य हो गयी थी । कहीं वनपुष्योकी गानिपम यह स्थली सचगन्धयी हो रही थी और कही प्राकृतिक गैरिक स्तामण्डल बन गया था । उसपर जो भोरे मँडग रहे थे, वे उमक कारण सदृश जान पड़ते थे। कही मौर्यक शरीरसे आधा कवच छूटकर त्रिलक भूमपर लगी थी। इस प्रकार वडे वड सर्पोकी खिले दिखाई पड़ती थी । ९-१४। कहीं मुँह वाये हुए बड़े-बड़े अजगर हवं बैठे थे । कही सर्पोका केंचुवियां दिखायी देती थी । कहींपर दावानल लगनेके कारण जलते हुए निकुञ्जोमसे व्याघ्र पशू आदि बड़े-वड जन्तु निकल निकलकर भाग रहे थे। रामके सथ आये हुए शिकारी खरगोशांपर कुत्ते दौड़ा रहे थे। काई तलैया मिल जानपर वे लोग वहीं कुछ देर विश्राम करके आगे दूसरे वनमे चले जाते थे और मध्याह्नके समय किसी बड़े सरोवरपर सीता आदिके साथ आराम करते थे ॥ १५-१७॥ नौकर वहर उठकर फिर शिकारी लग जाने थे रामचन्द्रजी किसी भी मृगको देखकर उसके पीछे दौड़ पड़ते और उस बाणोंसे मार डालते थे। इस प्रकार रामचन्द्रजी मृगया कर ही रहे थे, तभो दूसरी ओरसे 'सिंह आया-सिंह आया' यह कोलाहल हान लगा। सिंह इसम ऊबकर और भी वेगस चला। उसके बड़े बड़े दाँत थे । देखनेमे वह बड़ा भयानक मालूम पड़ता था। वह बड़े भारी दुर्गम मार्गको त करता हुआ इन लोगोंकी ओर बढ़ता आ रहा था वह कभी छालां मारकर आकाशमार्गे चलता और कभी पृथ्वी-पर दौड़ता चलता था ॥ १८-२१॥ अतिशय वेगसे भागनेके कारण उसका पीछा करनेवाले लोग कभी उसे देख पाते थे-कभी नहीं इस तरह भागता हुआ वह एक ऐसे दुर्गम स्थानपर पहुँच गया, जहाँ एक टेढ़ा-