भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२


यावद्देवं गतिर्नास्त्यवसंवने मद्यति द्रुतमदेन पूरुषः ।
मोहयंतु मदयन्तु रागिणं योषितः स्वचरितैर्मनश्शरैः ॥ १२॥
मोहयन्ति मदयन्ति मामिमा धर्मलक्षणवरं हि कैर्गुणैः ।
मांसरक्तमलमूत्रपूरितं योषितां वपुरिह निर्गुणेऽशुचौ ॥१३॥
कामिनस्तु परिकल्प्य चारुतामारभन्ति सुविमूढचेतसः ।
दारुणः परिक्लान्तिदाऽनामनिनिधिविमलबुद्धिर्वानभिः ॥१४॥
यावद्देव न मत्समीपमागतास्तावदेव हि व्रजाम्यदृश्यताम् ।
तर्हि में व्रतमित्दं सुनिर्मलं नान्यथा कथमहं करोम्यदह ॥१५॥
अथवा किं करिष्यन्ति मामेकदयिताप्रियम् । इति निश्चिय श्रीरामश्चन्द्र तूष्णीं स्थितोऽभवत् ॥१६॥
एतस्मिन्नन्तरे सर्वास्तास्तं प्रोचुर्नृपात्मजम् । वृत्तञ्च वृत्तसम्भाविनात्र कार्या विचारणा । १७॥
एकपत्नीव्रतं किं ते पार्थिवस्य श्रुतम् । अस्ति चेत्संगता प्राप्तं फलं भोक्तुमर्हसि ॥१८॥
इत्युक्त्वा तास्तदा सर्वा गत्वा तन्मन्निधिं जवात् । सङ्गालभ्यन्दनैश्च भुजपाशान् प्रचक्रिरे ॥१९॥
तद्दृष्ट्वा राघवः प्राह शृणुध्वं वचनं मम । युष्माभिरुक्ते सद्गमनुकूलं प्रियं वचः । २०॥
यतिनस्तन्न योग्यं मे मा खेदं गन्तुमर्हथ आकर्ण्य रामवाक्यानि तमूचुस्ताः समन्ततः ॥२१॥
सकामध्वनिनोत्कण्ठाः कोकिला इव माधवे ।
गोपसाम्प्रदायिक ऊचु
धर्मादर्थोऽर्थतः काम कामाद्धर्मफलोदयः ॥२२॥
इत्येवं निश्चय शास्त्रे वर्णयन्ति विपश्चितः । स कामो अतबाहुल्यात्पुरस्ते समुपस्थितः । २३॥
सेव्यतां विविधैर्भोगैः स्वर्गभूर्मार्गण मनः । अन्वा तडच्न नागां गमन्ताः प्राह सम्मितः , २४॥


मृग उस वाणसे घायल नहीं हो जाता ॥ १० ॥ मनुष्यका चित्त तभी तक वश रहता है, तभी तक कुलकी मर्यादा रहती है, तथा तब तक याग मन त्याग है तभी तक नियम व्रत आदि होते हैं, जबतक स्त्रियोंके चञ्चल कटाक्षोंसे पुरुषका मन मतवाला नहीं हो जाता और जबतक स्त्रियाँ उनपर मोहिनी डालकर अपने मनोहारी हाव-भावोंसे मोहित नहीं बना देतीं ॥ ११ । १२ ॥ ... पुरुष अपना धर्मकाम तत्पर जानकर भी अपने गुणोंसे मुग्ध करना चाहता है । मांस रक्त और मल-मूत्रसे परिपूर्ण स्त्रियोंकी अपवित्र देहपर कामी पुरुष सौन्दर्यकी कल्पना करके आनन्द लूटते हैं । भयं सम्भवता तो केवल दुःखदायक है । क्योंकि विमल बुद्धिवाले लोगोंका कहना तो यह है कि स्त्रियोंका संग बड़ा ही दारुण पश्चात्तापका हेतु होता है । अच्छा, जबतक ये मेरे समीप नहीं आ जातीं, इसके पहले ही मैं अन्तर्धान होऊँ तो अच्छा है, मेरा व्रत निर्मल रह जाय । इसके सिवाय और कोई उपाय भी तो नहीं दीखता । १३-१५ । अच्छा, यह भी देख लूँ कि ये मेरे साथ क्या करती हैं, यह निश्चय करके रामचन्द्रजी चुपचाप बैठ गये । १६ । इतनेमें ही वे सब स्त्रियांने एक स्वरसे कहा कि हम लोगोने आपको अपना पति मान लिया है । अब आप इस प्रकारका विचार मत करिये ॥ १७ ॥ हे राम क्या आपने एकपत्नीव्रत धारण किया है ? यदि ऐसा है तो अब उससे प्राप्त फलका उपभोग कीजिए ॥ १८ ॥ ऐसा कहकर वे सब उनके पास पहुँची और दौड़ती-दौड़ती दोनों भुजाओंसे रामको अपने भुजपाशमें बांधनेकी चेष्टा करने लगीं । १९ ॥ ऐसी अवस्था में रामने उनसे कहा कि आप सब जो कुछ कह रही हैं, वह ठीक ही है। किन्तु हमारे जैसे वानप्रस्थियोंके लिए वह उचित नहीं है। इसलिए तुम सब किसी प्रकारका खेद न करके पुनः दुर्योधनके यहां जाओ । इधर तो वे सब रामके वचनोंको सुनकर बड़े आदरसे सब कहने लगीं । उस समय वास्तवमें उनके कण्ठकी ध्वनि वसन्त ऋतुके कोकिलके समान मधुर सुनाई देती थी ॥ २०-२१ । सोलह हजार स्त्रियां बोलीं—धर्मसे अर्थकी प्राप्ति होती है, अर्थसे काम प्राप्त होता है और कामसे धर्मफल मिलता है । विद्वान् लोग शास्त्रोका यही निर्णय बतलाते हैं । वही काम आपके