भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 474
१५८आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

अदृष्ट्वा राघवं सर्वास्ताः शृण्वन्नप्रमदोत्तमाः । दृष्ट्वा तदद्भुतं कर्म विस्मयाविष्टमानसाः ॥३७॥
वित्रस्तहृदयाः सर्वाः कुरंग्य इव कातराः । संभ्रांतनयना दीना इत्यूचुस्ताः परस्परम् ॥३८॥
व्याप्तं च हृदयं तासां तदैव विरहाग्निना । ज्वलज्ज्वालानलेनैव मूर्च्छिन्नं सार्द्रकाननम् ॥३९॥
त्यजैन्द्रजालिकां मायां कांत दर्शय मन्वरम् । स्यान्मानं नर्पणा युक्तं प्राग्ग्रासे मक्षिकाऽपतत् ॥४०॥

स्त्रिय ऊचु
हा कष्टं दर्शितः कस्माद्वाञ्छा किं रचितं त्विदम् ।
ज्ञातं महत्तमं तापं दातुं नस्त्वं समागतः ॥४१॥
कच्चित्त्वं निर्दयं चेतः कच्चिदस्मान् परीक्षसि ।
कच्चित्तुष्टोऽसि हे कांत कच्चिन्मुष्णासि नो मनः ॥४२॥
कच्चिन्नो प्रत्ययोऽस्मासु कच्चिदस्मासु नो रतिः
कच्चिद्विनोदयसि नः कच्चिन्मायाविशारदः ॥४३॥
कच्चिच्चित्ते प्रवेष्टुं त्वं वेत्सि विज्ञानलाघवम् । कच्चिद्विनापराधं हि त्वमस्मासु प्रकुप्यसि । ४४॥
कच्चिद्दुःखं न जानासि परेषां विप्रलंभजम् । स्वदर्शनं बिना नूनं हृदयेधर सांप्रतम् ॥४५॥
न जीवामोऽथ जीवामः पुनस्त्वद्दर्शनाशया । अस्मांस्त्वं नय त्वं हि यत्र नाथ गतो ह्यसि ।४६।
सर्वथा दर्शनं देहि कारुण्यं भज सर्वथा । पश्यन्तं न हि पश्यति कस्यचिन्मृजता जनाः ॥४७॥
इत्थं विलप्य ताः सर्वाः प्रतीक्ष्य च बहुक्षणम् ।
रामं द्रष्टुं वने सर्वा बभ्रमुस्ता इतस्ततः ॥४८॥
वृक्षान् वनेचरान् रामो दृष्टोऽस्माकं पतिर्न वा ।
एवं सर्वांस्तु पप्रच्छु रामविश्लेषमज्वराः ॥४९।
रे रे पिप्पल वृक्षाणामधिपस्त्वं ब्रवीहि नः । रामो दृष्टोऽथ वा नैव वयं त्वां शरणं गताः । ५०॥

फिर भी वे क्या करती हैं, यह देखनेके लिए राम गुप्तकूपसे वहाँ खड़े-खड़े देख रहे थे ॥ ३७ । ३८ ॥ क्षणभरमें रामको अलक्षित देखकर वे बहुत चकरायीं । फिर व्याकुल होकर हरिणियों के नाई चञ्चल नेत्रोंसे इधर-उधर देखती हुई आपसमें कहन लगीं । ३७ । ३८ । उस समय उनका हृदय विरहाग्निमे पूर्ण हो गया था । उनकी उस विरहाग्निकी ज्वालासे उस जङ्गलमें भी थोड़ी देरके लिए तृणोंको धारा बदल गयी ॥ ३९ ॥ वे बोलीं— हे कान्त इस ऐन्द्रजाल (ठगहारी) मायाका परित्याग करके हमें शीघ्र दर्शन दीजिए । हमने आपसे हँसी की और पहले ही ग्रासमें मक्खी गिरनेके समान इतना बड़ा विघ्न आकर उपस्थित हो गया ॥ ४० । कितने दुःखकी बात है। हे विधातृ ! तुम्हारी क्या इच्छा है ? हे विश्वंभर ! ज्ञात पड़ता है कि तुम हम सबको सन्ताप देनेके लिए ही यहाँ आये थे । ४१ ॥ तुम्हारा हृदय ही निष्ठुर है या हम लोगोंकी परीक्षा ले रहे हो । हमसे नाराज़ हो या हमारा चित्त चुरा रहे हो ? । ४२ ॥ क्या हमारे ऊपर तुम्हारा विश्वास नहीं है ? क्या हमसे प्रेम नहीं करते हो ? हम लोगोंके साथ ठठोली तो नहीं कर रहे हो ? क्योंकि तुम मायाजाल फैलानेमें भी बड़े निपुण हो ॥ ४३ ॥ तुम किसीके चित्तमें घुसनेका कोई वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म साधन जानते हो । बिना किसी अपराधके हमसे इतने क्यों रूठ गये हो ? । ४४ ॥ दूसरेको धोखा देनेसे जो दुःख होता है, क्या तुम उसे नहीं जानते ? बिना तुम्हारा दर्शन पाये हम लोग नहीं जी सकेंगी और यदि जियेंगी भी तो तुम्हारे दर्शनोंकी ही इच्छासे, अन्यथा नहीं । हे नाथ ! हमें भी वहीं ले चलिये, जहाँ आप गये हों ॥ ४५ ॥ ४६ ॥ दया करके हमें दर्शन दीजिए। सज्जनजन कभी किसीका दुःख नहीं देख सकते ॥ ४७ ॥ इस तरह बहुत देरतक विलाप करके उन्होंने उनके आनेकी प्रतीक्षा की । तब भी जब वे नहीं आये तब वे उनको ढूँढ़नेके लिये वनमें इधर-उधर घूमने लगीं ॥ ४८ ॥ रास्तेके प्रत्येक वृक्ष और वनके पशुओंसे वे रामविरहिणियां यह