भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 475

सर्गः १२ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४८९

भो भो तुलसि नो नाथस्त्वया रामो निरीक्षितः । बद श्वावास्त्व त्वं नोऽने रामो निरीक्षितः ॥५१॥ त्वं कोकिल सदा शब्दान् करोषि परमान् शुभान् । वदाद्य जानकीकान्तस्त्वयाऽरण्ये निरीक्षितः ॥५२॥ भो कदंब वदस्व त्वं तत्र पृच्छामहे वयम् । दीनानाथो रमानाथाः र्सोवानाधस्त्वयेक्षितः ॥५३॥ पिक त्वमुत्तरं देहि सदा शब्दान् करोषि हि । पीतंर्नः श्रीपतिः संतापातेदृष्टोऽथवा न वा ॥५४॥ भो वरग मदोन्मत्त शृंगारजसमः प्रभुः । सप्तद्वीपपतिः श्रीमान् रामोऽरण्ये निरीक्षितः ॥५५॥ शुक नः कथयाद्य त्वं प्रभुर्दृष्टोऽथ वा न वा । वद पुण्ये सरिच्छ्रेष्ठे किं तूष्णीं संस्थिताऽधुना ॥५६॥ नः प्रभुः सप्तद्वीपानां प्रभुश्च निरीक्षितः । भो वायो कथयाद्य त्वं सीताराम्रो निरीक्षितः ।५७॥

श्रीरामदास उवाच एवं ता रामविश्लेषसंभ्रांताः शुशुचुर्वने । ततस्ता गडकीतीरं गत्वा गीतं प्रचक्रिरे ॥५८॥

स्त्रिय ऊचुः किं प्रभो त्वया जानकी यदा तेन रक्षसाऽरण्यमभ्यतः । स्वस्थयं हृता गौर्त्रानीतटात्तत्कृते त्वया नैव शोचितम् ॥५९।१॥ त्वद्वियोगतप्तममानसाः सर्वतो वने शोकमग्नगाः । एकदा प्रभो देहि दर्शनं देहि नो वरान् माऽस्तु वै रतिः । ६०।२॥ नो वाञ्छामो राघव त्वत्तो रतिमद्य यद्वहत्तं भूमूरजाम्प्यो वरदानम् । तद्वत्त्वंस्त्वं पूरय कामान्वरदानैर्वाञ्छामस्ते सेवनमग्रये जननेऽपि ॥६१।३॥


पूछती जाती थी कि तुमने हमारे पति रामको तो इधर कहीं नही देखा है ? । ४६ । वे कहती थी कि हे वृक्षोंके राजा विप्लवदेव ! हमें बताओ कि तुमने रामको तो नही देखा है ? हम आपकी शरणम हैं ॥५०॥ हे तुलसी देवी ! तुमने तो रामको नहीं देखा है ? हे वानरगण इस वनमें तुमन कहीं रामका तो नहीं देखा है ? ॥ ५१ ॥ हे कोकिल ! तू वहीं मीठा वाणी बोलता है, अब उसी भाषण हम यह बताव कि तून वनम कहीं रामचन्द्रको तो नही देखा है ? ॥ ५२ ॥ हे कदम्ब तुझम हम सब स्त्रियां यही पूछना चाहती है कि तूने सीतापति रामको तो कहीं नहीं देखा ? ॥ ५३ । अरे पिक ! तू सदा पीकहा पीकहा बोलता रहता है। अब हमें यह बता कि तूने कहीं जानकीवल्लभ रामको देखा है ? देखा हो तो बतला व ॥ ५४ ॥ हे मतवाले गजराज ! मन्दोधाम हाथोके समान श्रेष्ठ रामचन्द्रजीको तो तूने नहीं देखा है ? ॥ ५५ । हे शुक ! तू ही बता दे कि इस वनमें कहीं रामको देखा है ? हे पवित्र नदी ! तू क्या चुप है, मन्दोदक अशोकवर और हम लोगोंके प्रभु रामचन्द्रजी को तो नूत नही देखा है ? यदि देखा हो तो बता दे । हे वायो ! कहो, तुमने इस वनमें कहीं सीतापति रामको देखा है ? । ५६ ॥ ५७ ॥ श्रीरामदास कहते यन—इस प्रकार रामके वियोगसे पगली सी होकर वे स्त्रियां विलाप करती हुई चलती-चलती गण्डकी नदीके किनारे जाकर इस तरह प्रार्थनाभरे गायन गाने लगी - ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! जब रावण वनमेंसे समाका हरण करके अपनी राजधानी लङ्काको ले गया था, तब क्या उनके लिए आपने कोई शोक नहीं किया था ? ॥ ५९ । १ हे नाथ ! आपके वियोगसे हमारा हृदय जला जा रहा है। शोकमें व्याकुल होकर हम सब इस वनम आ पहुँची हैं। हे प्रभो ! हमें एक बार अपना दर्शन दे दें और कुछ वरदान भी दे दें.... तुमसे प्रेम नहीं करना चाहते ता न करिए ॥ ६० ॥ २ । हे राघव जबतक हम यहाँ हैं तबतक आपका दर्शन चाहती थी । अब उसकी इच्छा भी नहीं रह गयी ! जिस प्रकार आपने केतु (सीता) को वरदान दिया था, उसी