श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
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वयमेकगुणाः स्वामिंस्त्वं चैव गुणाधिकः। गोविप्रदेवतादींषु शस्त्रा नामन्त्रयास्ततः ॥३५५॥ मयैतच्च जीवितानि तव पादार्पितानि हि। यथेच्छं यात्तथास्माकं विधेर्युद्धं करोमि न ॥३५६॥ इति ब्रुवति रामे वै चचाल वसुधा भृशम् । क्रुद्धं दृष्ट्वा जामदग्न्यं क्षत्रियौघसमुद्यतम् ॥३५७॥ अन्धकारो बभूवाथ क्षुभितः सप्त सागराः । रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥३५८॥ धनुर्गच्छंस्तद्धस्ताद्रोप्य शुनमजयत्। तूणीगद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥३५८॥ उवाच भार्गवं रामः शृणु ब्रह्मन् वचो मम। लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो गमनायकः ॥३५९॥ लोकान् पादयुगं वापि वद शीघ्रं समाज्ञया। एतन्वदति श्रीरामे भार्गवो विगताननः ॥३६०॥ संस्मरन् पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥३६१॥ पुराणपुरुषं विष्णुं जगन्मङ्गलमोद्धवम् । बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमंजसा ॥३६२॥ गत्वा हि तीर्थे गोमन्दारूपस्य सोप्य शार्ङ्गिणः। अहर्निशं महात्मानं नारायणमकल्पयीः ॥३६३॥ यस्यांशेन मया भूम्यामवतारो गृहीतोऽस्ति हि भूभारहरणार्थाय कार्त्तवीर्यवधैप्सया ॥३६४॥ ततः प्रसन्नो देवेशः शंखचक्रगदाधरः उवाच मां नृगुश्रेष्ठं प्रसन्नमुखपंकजः ॥३६५॥
श्रीभगवानुवाच
उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन् विदितं ते तपो महत् मद्विचद्रेन युक्तस्त्व जहि हैहयपुंगवम् ॥३६६॥ कार्त्तवीर्यं पितृऋणं एदर्थं तपसा श्रमः। ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हन्ता क्षत्रियमण्डलम् ॥३६७॥ कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वाऽशान्तिमवाप्स्यह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥३६८॥ वन्दत्स्ये परया भक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां पुनः। मनेजः पुनरादास्ये मयि दत्तं मया कृतम् ॥३६९॥ तदा तपश्चरँल्लोके तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम्। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवस्तथा सर्वं मया कृतम् ॥३७०॥ स एव विष्णुरूपस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः। मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनर्गृह्यताम् ॥३७१॥
हे स्वामिन् ! हम एक गुणवाले तथा आप अनेक गुणवाले हैं रघुवंशियों, ब्राह्मण, देवता तथा स्त्रीपर बास्त्र नहीं उठता ॥ ३५४॥ मैंने और इन सबने आपके चरणोंमें आत्म अर्पण कर दिया है। आप जैसा चाहें वैसा करें। यदि चाहें तो मार डालें परन्तु मैं ब्राह्मणके साथ युद्ध कदापि नहीं करूंगा ॥ ३५५॥ रामके ऐसा कहनेपर क्षत्रियोंके नाशका उद्योग जामदग्न्य (परशुराम) को देख डरकर पृथ्वी कांपने लगी। चारों ओर अन्धकार छा गया तथा सातों समुद्र क्षुभित हो उठे। तब दशरथपुत्र वीर रामने श्री परशुरामको प्रत्यक्ष देखकर उनके हाथसे धनुष लाग लिया और दोनों चढ़ा तथा भाथेमेंसे बाण निकाल और उसपर चढ़ा तथा बलपूर्वक खींचकर भार्गव परशुरामसे कहने लगे हे ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनिए और मुझे लक्ष्य बताइए। मेरा बाण खाली नहीं जा सकता ॥ ३५६-३५६ ॥ शीघ्र ही मुझ वा सो लोकोंको बिद्ध करनेकी आज्ञा दीजिए अथवा अपने दी चरणोंको। रामके इस वचनको सुनकर विकृतमुख होते हुए परशुरामन पूर्व वृत्तान्तको स्मरण करते हुए कहा-हे राम हे राम ! हे महाबाहो! मैं आपको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयके कारणस्वरूप पुराणपुरुष साक्षात् परमेश्वर विष्णु समझता हूँ। बचपनमें मैन गोमतीतीर्थमें जाकर शार्ङ्गधनुर्धारी विष्णुभगवान्को जिनके एक अंशसे मैन संसारका भूभार हरण करने तथा कार्तवीर्यको मारनेके लिए अवतार लिया है, उन्हें अपने रूपसे प्रसन्न किया। तब प्रसन्नमुख होकर शंखचक्रगदापद्मधारी उन देवाने मुझसे कहा ॥ ३६०-३६५ ॥ श्री भगवान् बोले- हे ब्रह्मन् ! तप करना छोड़कर तू उठ खड़ा हो। मैंने तेरे तपोबलको जान लिया है। मेरे चिदंशस युक्त होकर तू हैहयश्रेष्ठ तथा अपने पिताको मारनेवाले कार्तवीर्यको मार। जिसके लिए तूने तपका परिश्रम किया है। बादमें इक्कीस बार क्षत्रियसमुदायका नाश करके समस्त पृथिवी कश्यपको दान देकर शान्त हो। पश्चात् त्रेतायुगमें मैं अविनाशी दाशरथी राम होकर उत्पन्न होऊँगा। तब तू परम भक्तिसे मुझे देखेगा। उस समय मैं तुझे दिया हुआ अपना तेज लौटा लूँगा ॥ ३६६-३६६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माने एक दिन तक तू तप करता हुआ संसारमें