श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] सारकाण्डम् १३
अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽसि मम प्रभो । नमोऽस्तु जगतां नाथ नमस्ते भक्तिभावन ॥३७२॥ नमः कारुणिकान्त रामचन्द्र नमोऽस्तु ते । देव यद्यत्कृतं पुण्यं मया लोकजिगीषया ॥३७३॥ तन्मत्रं तव बाणाय भूयाद्राम नमोऽस्तु ते । ततो मुक्त्वा शरं रामस्तत्कर्म भस्मसात्करोत् ॥३७४॥ ततः प्रसन्नो भगवान् श्रीरामः करुणामयः । जामदग्न्यं तदा प्राह वरं वरय चेति सः ॥३७५॥ ततः प्रीतेन मनसा भार्गवो राममब्रवीत् । यदि मेऽनुग्रहो राम तवास्ति मधुसूदन ॥३७६॥ त्वद्भक्तसङ्गस्त्वत्पादे मम भक्तिः सदाऽस्तु वै । तथेति राघवेणोक्तः परिक्रम्य प्रणम्य तम् ॥३७७॥ पूजितस्तदनुज्ञातो महेंद्रं चलमन्वगात् । रावणेन जिता देवाः सगणो रावणो महान् । ३७८॥ सहस्रबाहुना बद्धः सोऽर्जुनो भार्गवेण हि । हतः क्षणेन समरे सोऽद्य श्रीभार्गवोऽपि च । ३७९॥ जिताऽनेनूप बाणमोचनाद्राघवेण हि । एवं श्रीरामचन्द्रस्य पौरुषं किं वदाम्यहम् ॥३८०॥ अथ राजा दशरथो रामं मृतमिवागतम् । दृढमालिङ्ग्य हर्षेण नेत्राभ्यां जलमुत्सृजन् ॥३८१॥ ततः प्रीतेन मनसा स्वस्थचित्तः पुरीं ययौ । अयोध्यायां सुमन्त्रोऽपि नृपं श्रुत्वा समागतम् । ३८२॥ नगरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः । वारणेंद्रं पुरस्कृत्य रामं प्रयुद्ययौ जरात् ॥३८३ अथो नदत्सु वाद्येषु राजा पुत्रैः सुहृज्जनैः । विवेश नगरं पौरैः पश्यन्नृत्यादिकं पथि ॥३८४॥ रामादयः स्वपत्न्यो ते राजभक्त्या ययुः पुरीम् । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः ॥३८५ एवं राजा गृहं गत्वा बालकैः स्वीयमश्मनि । रमापूजाः कारयित्वा ददौ दानान्यनेकशः ॥३८६॥ सदाऽलङ्कारवस्त्रार्थैः सुहृदः पार्थिवाद्यः । रामादीन्पूजयामासुस्तथा दशरथं नृपम् ॥३८७॥
रह, ऐसा कहकर प्रभु अन्तर्द्धान हो गये। मैंने भी सब वैसा ही किया ॥ ३७० ॥ हे राम ! वहां आप ब्रह्मासे प्रार्थित होकर पृथिवीपर अवतीर्ण हुए हैं, मेरे तनमें स्थित अपना तेज आपने ही फिर आज आहरण कर लिया है ॥ ३७१ ॥ आपके दर्शनसे मेरा जन्म सफल हो गया। हे भक्तिभावन ! हे जगन्नाथ ! हे करुणामय हे रामचन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे देव ! लोकोंको जीतनेकी इच्छासे मैने जो जो कर्म किए हैं, वे सब आपके बाणको समर्पित हैं (अर्थात् उन्हें आप अपने बाणका लक्ष्य बनाकर नष्ट कर दें) । तब रामने बाण छोड़कर उनके कर्मोंको भस्म कर दिया ॥ ३७२-३७४ ॥ तत्पश्चात् प्रसन्न होकर करुणामय भगवान् श्रीरामने परशुरामसे कहा कि तुम वर मांगो, मैं तुमपर प्रसन्न हूँ ॥ ३७५ ॥ यह सुनकर प्रसन्न मनसे भार्गवने रामसे कहा—हे मधुसूदन राम ! यदि आप मेरेपर अनुग्रह रखते हों तो मुझे सदा आप अपार भक्तोंका संग तथा अपने विषयमें निर्मल भक्ति प्रदान करें। तब रामचन्द्रजीने 'तथास्तु' कहा। तदनन्तर परशुराम उन्हें नमस्कार तथा परिक्रमा करके और आज्ञा लेकर महेन्द्राचलकी ओर चल दिये। जिस रावणने देवताओंको जीता था, उस भारी सङ्ग्रामी रावणको सहस्रबाहु अर्जुनने बाँध लिया था। उसी अर्जुनको परशुरामने युद्ध करके क्षणभरमें मार डाला था। उन परशुरामजीको भी रामने उन्हींके दिये हुए धनुषपर बाण चढ़ाकर जीत लिया है पार्वती ! इस प्रकार रामके पुरुषार्थका वर्णन मैं कहाँ तक करूं । उनके बलका कोई अन्त नहीं है ॥ ३७६-३८० ॥ पश्चात् राजा दशरथ रामको मरकर लौटे हुए की तरह आलिङ्गन करके हर्षके आंसू बहाने लगे ॥ ३८१ ॥ बादमें प्रसन्न मन होकर वे स्वस्थ चित्तसे अयोध्यापुरी को चल पड़े। उधर अयोध्यामें सुमन्त्रने जब राजा दशरथके आगमनकी बात सुनी तो उन्होंने नगरीको पताका, ध्वजा तथा तोरणोंसे खूब सजाया और हाथी लेकर रामको लेनेके लिए आगे आये ॥ ३८२-३८३ ॥ राजा दशरथने पुत्र-मित्र तथा नगरनिवासियोके साथ रास्तेमें नृत्य आदि देखते हुए बाजे-गाजेके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥ ३८४ ॥ राम आदिने भी अपनी स्त्रियोंके साथ हाथियोंपर बैठकर पुरमें प्रवेश किया। वेश्याएँ नृत्य करने लगीं तथा भाट आदि स्तुति करने लगे ॥ ३८५ ॥ राजाने घर आकर बालकोंसे लक्ष्मीका पूजन करवाया और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ३८६ ॥ पश्चात् सुहृदों तथा राजाओंने वस्त्र-अलङ्कारसे राम आदिकी और राजा दशरथकी पूजा की ॥ ३८७ ॥