भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514
४९८आनन्दरामायणे[ सर्गः १७

तद्दृष्ट्वा कौतुकं तस्य ज्ञात्वा तपसः फलम्। लवश्चिच्छेद बाणैर्हस्तस्थं दिव्यमुत्तमम् ॥२१॥ ततो लवः स्वबाणौघैरुग्रबाहुसुतं मुदा। चकार व्याकुलं शीघ्रं तद्दृष्ट्वा लवचेष्टितम् ॥२२॥ उग्रबाहुर्ययौ योद्धुं लवेन वेगतस्त्वरः। लवस्तमपि बाणौघैश्चकार विरथं क्षणात् ॥२३। उग्रबाहुस्तदा वीरोऽन्ये रथे चारुरोह सः। ववर्ष निशितैर्बाणैर्मूर्च्छयामास तं लवम् ॥२४॥ लवं विमूर्च्छितं दृष्ट्वा हाहाकारो महानभूत्। तदा ययौ कुशो योद्धुमुग्रबाहुनृपेण वै ॥२५। कुशमागतमाज्ञाय बद्धाद्यास्तदा पुनः। रथस्था युयुधुस्तेन उग्रबाहुनृपेण वै ॥२६॥ पुनस्तानङ्गदादींश्च चकार विरथान्नृपः। तदा कुशः स्वबाणौघैरुग्रबाहुं नृपं क्षणात् ॥२७। चकार विरथं वीरांश्चिच्छेद तस्य कार्मुकम्। उग्रबाहुस्तदा व्यग्रो बभूव चकितस्तदा ॥२८॥ तं धृत्वा स कुशस्तोषाह्वादयामास दुन्दुभीम्। अथोग्रबाहु मसुनं निन्ये श्रीरामसन्निधौ ॥२९॥ रामस्तं मोचयामास मत्वा तं सुहृदं वरम्। तदा रामो विजायिने कङ्कणं मुनिनाऽर्पितम्। ३०। ददौ कुशाय प्रीत्या स पुनः कुम्भजन्मनः। कुशस्तदाऽतिशुशुभे वरकङ्कणमण्डितः ॥३१॥ तदा कुशो मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम्। त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मां मुने ॥३२। तत्तस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह कुशं मुदा। पुरेन्द्ररिपवो वत्स बहवः सागरेण हि। ३३॥ कृताः स्वौर्वनिवामाश्च तदाऽहं नाकपार्थिनः। कृत्वा सन्तुलनंऽब्धिं तं पीतवाँल्लीलयैव हि । ३४॥ ततो मुमो द्वीपयोर्हि मर्यादां मध्यवर्तिनीम्। दृष्ट्वा पुनर्नार्कपेन प्रार्थितो ह्यवधृणा ॥३५॥ मूत्रवन्तामरं भीमं सजीवं मुक्तवानदम्। तदाऽब्धिनाऽर्पितं मह्यं कुश यत्कङ्कणं वरम् ॥३६॥ नानारत्नविचित्रं च सूर्यतेजोवगर्जितम्। तद्रामस्यार्पितं पूर्वं मया तेन त्वयार्पितम् ॥३७॥

दिया। इस कौतुकको देखकर लवने समझ लिया कि यह सब चमत्कार उसकी तपस्याका है। यह विचार- कर लवने अपने बाणवर्षास चित्रांगदके उस उत्तम धनुषको काट डाला और इतनी शीघ्रतासे बाणवर्षा की कि चित्रांगद व्याकुल हो गया ॥ १६-२२। ऐसी अवस्थाम उपबाहु चित्रांगदका पिता, स्वयं लवके साथ युद्ध करनेके लिय रणमे उतर पड़ा, किन्तु लवने थोड़ी ही देरमें उसका भी रथ ध्वस्त कर दिया तब उप्रबाहु तुरन्त एक दूसरे रथपर बैठकर युद्ध करने लगा और अपने तीक्ष्ण बाणोंका मारस लवको मूर्च्छित कर दिया। उसे मूर्च्छित देखकर संग्रामभूमिमें हाहाकार मच गया। तभी उधर कुश युद्ध करनेके लिए रामका दूसरा पुत्र कुश भी आ पहुंचा। कुशको आया देखकर वे अङ्गद आदि रघुवंशी राजकुमार रथोंपर बैठ बैठकर उत्साहपूर्वक उग्रबाहुस युद्ध करने लग। किन्तु उपबाहुने अपने युद्धकौशलस था। ड़ी दरमें अङ्गद आदि सभी राजकुमारोकि रथोंको नष्ट कर डाला। उधर अपने भ्राताओंपर प्रहार करते देखकर कुशने उपबाहुको क्षणभरमे विरथ कर दिया और उसका धनुष काट डाला। उग्रबाहु इस समय आश्चर्यके साथ व्यग्र हो उठा ॥ २३-२७ ॥ तब कुशने झटपट उन बाण-बेगको बन्दी बना लिया और अपनी विजयदुन्दुभी बजवा दी। चित्रांगद तथा उग्रबाहुको अपने साथ लेकर कुश रामचन्द्रजीके सामने गये। वहाँ पहुँचनेपर उग्रबाहुको अपना मित्र समझ- कर रामने छुड़ा दिया और विजयी कुशको अगस्त्य ऋषिके समक्ष अगस्त्यका ही दिया हुआ कङ्कण दिया। उस कङ्कणके पहिननेसे कुशकी शोभा ओर भी बढ़ गयी २८-३१ ।। इसके बाद कुशने अगस्त्यऋषिसे कहा- हे मुने आपने यह कङ्कण कहाँ पाया था ? यह हमसे कहिए । ३२ । कुशकी बात सुनकर अगस्त्यने कहा- हे वत्स ! आजके बहुत समय पहले इन्द्रके बहुतरे शत्रु समुद्रके भितर घर बनाकर रहा करते थे। इन्द्रके प्रार्थना करनेपर मैंने समुद्रको चुल्लुक भरकर पी लिया। जब इन्द्रने अपने सारे शत्रुओंको मार डाला, तब दो द्वीपोंके मध्यकी सीमाको नष्ट देखकर इन्द्रने मुझसे समुद्रको फिर पूर्ववत् बना देनेकी प्रार्थना की ॥३३-३५॥ तब मैंने मूत्रके मार्गसे फिर समुद्रको सजीव करके बहा दिया। उसी समय समुद्रने मुझे उपहारके रूपमें यह कङ्कण दिया था ॥ ३६ ॥ अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित तथा सूर्यके तेजकी नाई तेजोमय यह कङ्कण मैंने रामको दे