श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 515, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४९९
सत्युनेर्वचनं श्रुत्वा कुशस्तं प्राह वै पुनः । लवस्य जीवनोपायं वद मह्यं भो मुने ॥३८॥
कुशस्य वचनं श्रुत्वाऽगस्तिस्तं प्राह सादरम् । विमूर्च्छितो यदा पूर्वं भरतः पथि पार्थिवैः ॥३९॥
मूर्च्छितः पतितश्चास्ति रणे रिपुशरैर्हतः मुद्गलाश्रमतः कल्याणदायिन्यो लताः शुभावहाः ॥४०॥
सौमित्रिणा तदाऽऽय त्वं मुद्गलाश्रमतः पुनः । महौषधी समानीय जीवयैनं लवं जवात् ॥४१॥
अथवा त्वं हनूमंतं प्रेषयस्वाश्रमं मुनेः । एवं यावच्च स मुनिः कथयामास तं कुशम् ॥४२॥
राघवप्लवगश्चन श्रुत्वा मुनेर्माहातिना क्षणात् । ममानीयाश्रमाच्छीघ्रंमुद्गलस्य तपोनिधेः ॥४३॥
ताभिस्तं जीवयामास लवं सैन्यसमन्वितम् ।
विष्णुदास उवाच
गुरो ऽस्यैव च मुनेर्मुद्गलस्याश्रमे कथम् ॥४४॥
मृतसंजीवनीवन्त्यादिका सन्त्योऽत्र निमंताः । कथ ना हि समीपस्था विस्मृत्य द्रोणपर्वतम् ॥४५॥
प्रेषितोऽञ्जनिपुत्रः स तेन जांबवता पुरा । अमुं मे संशयं छिंधि कृपां कृत्वा मुनीश्वर ॥४६॥
श्रीरामदास उवाच
यदा मातृविमोक्षार्थममृतस्य खगाधिपः । कलशं स्वमुखे धृत्वा नाकलोकान्समानयत् ॥४७॥
तदा तत्कलशाद्वेगाद्विंदुस्तत्रापतद्भुवि । तद्देशोमुद्गलस्यापि मुनेस्तपःप्रभावतः ॥४८॥
आसन् वल्ल्यश्च तस्यैव चाश्रमे हि द्विजोत्तम । नैना वेद शुभा कश्चिर्जीवदान्स वनेचरः ॥४९॥
द्रोणाचल स्ततस्तेन प्रेषितो वायूनन्दनः । इति त्वया यथा पृष्टं तथा ते विनिवेदितम् ॥५०॥
इदानीं शृणु शिष्य त्वं शुभा तां प्राक्तनीं कथाम् । ततो लवादिकाः सर्वे ययुस्ते स्वपुरीं मुदा ॥५१॥
नत्वा मुनिं च रामादींस्तत्पुः श्रीराघवाग्रतः । तता महोत्सवश्चासीत्पुर्यां तल्लवदर्शनात् ॥५२॥
ततो दृष्ट्वा लवं रामो जीवितं वायुजेन हि । समालिंग्य रढं प्रेम्णा परं तोषमवाप सः ॥५३॥
दिया और रामने इस आज तुम्हे दिया है ॥ ३७ ॥ मुनिकी बात सुनकर कुशने कहा अब हमें कोई ऐसा उपाय बतलाइए, जिससे लव जीवित हो जाय । ३८ ॥ वह इस समय शत्रुओंके अस्त्रोंसे घायल होकर रणभूमिम पड़ा हुआ है। कुशकी प्रार्थना सुनकर अगस्त्यने कहा—उस समय जब कि जनकपुरके मार्गमे राजाओंने भरत-को मूर्छित कर दिया था, तब मुद्गल ऋषिके आश्रमसे कल्याणदायिनी लताएं लक्ष्मण द्वारा लायी थी उसी प्रकार आज तुम मुद्गलके आश्रमसे वह लता लाकर लवको जी वित कर लो ॥ ३९-४१॥ अथवा हनुमानजीको भेज दो। ये ही वह लता ले आयगे । मुनिकी बात सुनते ही हनुमान्जी चल पड़े और थाड़ा ही दूरपर मुद्गल-ऋषिके आश्रमसे रह लता लाकर रख दी और उन्ही लताओंसे कुशने क्षणमात्रम सेना समत लवको जीवित कर लिया। इतनी कथा सुनकर विष्णुदासने कहा—हे गुरो ! ये मृतसञ्जीवनी लताएं मुद्गल ऋषिके आश्रमपर आकर कैसे उग गयीं। फिर जब वे इतना समीप थी, तब लक्ष्मणकी मूर्छाके समय जाम्बवान्ने हनुमान्जीको द्रोणाचलपर क्यो भेजा—हे मुनीश्वर ! मेरे ऊपर कृपा करके मेरी इस शंकाका समाधान कीजिये ॥ ४२-४६ ॥ श्रीरामदासने कहा—जिस समय अपनी माताको छुड़ानेके लिए गरुड स्वर्गसे ओषम अमृतकलश लेकर चले तो मुद्गल ऋषिके आश्रमपर जाते ही कलशमस अमृतक एक बूंद यहाँ गिर पड़ी। इसीलिए और ऋषिके तपाबलसे उसी स्थानपर वे मृतसञ्जीवनी बल्लरियां उग गयीं। वनचर जाम्बवान् इस स्थानकी लताओंको जानते ही नहीं थे। यही कारण हनुमान्जीका द्रोणाचलपर भेजा या । ४७ ॥ ५० । जैसा तुमने प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया। अच्छा, अब अपनी पुराना कथापर आ जाओ—उसे सावधान मनसे सुनो। उस औषधिसे जीवित लव आदि वीर लौटकर सहर्ष अपनी अयोध्यापुरीमे आ गये ॥ ४१-५१ ॥ रामकी सभामें पहुँचकर लव आदिने वसिष्ठजीको प्रणाम किया और रामके सामने बैठ गये । लवको देखने से उस रोज पुरीभरमें बड़ा उत्साह था। जब रामने देखा कि हनुमान्जीके पुरुषार्थसे लघ जीवित होकर