भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५०० आनन्दरामायणे [सर्गः १७

ततो रामो वायुजाय कङ्कणे रत्नमण्डिते। ददौ परमसंतुष्टस्ताभ्यां स शुशुभे कपिः ॥५४॥ ततो लवाय श्रीरामस्तत्परं कङ्कणं वरम्। ददावगस्त्यिना दत्तं पूर्वं यद्रत्नमण्डितम् ॥५५॥ लवस्तेनातिशुशुभे रत्नकङ्कणमण्डितः। लवस्तदा मुनिं प्राह नत्वा तं कुम्भसम्भवम् ॥५६॥ त्वया लब्धं कुतश्चेदं कङ्कणं वद मे मुने। ततस्तद्वचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह लवं मुदा ॥५७॥ एकदा दण्डकारण्येडहं स्नातुं हि गतः सरः। तस्मिन्स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तत्र स्थितः क्षणम् ॥५८॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र खात्स्वर्गी समुपागतः। दिव्यं विमानमारूढः शतस्त्रीपरिवेष्टितः ॥५९॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धादिचर्चितः। स स्वर्गी खात्समायातो यावत्तावत्सरोवरम् ॥६०॥ शवं विनिर्गतं श्रेष्ठं स्फीतं हि मर्यकण्ड्। दुर्गन्धसहितं दुष्टं प्राप्तं तत्परमप्लवम् ॥६१॥ अवरुह्य विमानाच्चाप्य स्वर्गी तच्छवं ययौ। छित्त्वा तच्छवमांसं वै भक्षयामास सादरम् ॥६२॥ ततः पीत्वा जलं स्वर्गी विमानं चारुरोह सः। निमग्नं तच्छवं चापि पुनस्तस्मिन्सरोवरे ॥६३॥ स्वर्गेण गन्तुकामं स दृष्ट्वाहं चातिविस्मितः। अब्रुवं मधुरं वाक्यं रे रे दिव्यस्वरूपधृक् ॥६४॥ क्षणं तिष्ठोत्तरं देहि कौतुकं मे मवेक्षितम्। ईदृशस्ते शवाहारः कथं स्वर्गीनवामिनः ॥६५॥ इति मद्वचनं श्रुत्वा स स्वर्गी प्राह मां तदा। सम्यक् पृष्टं त्वया ब्रह्मन् शृणु सर्व मयोच्यते ॥६६॥ सुदेवाख्यो हि वैदर्भो नृपोऽभूत्प्रवरोऽभवम्। तत्पुत्रौ श्वेतसुरथौ श्वेतोऽहं पार्थिवोऽभवम् ॥६७॥ नैव दानं मया तस्मिन् जन्मन्पत्र कृतं कदा। स्वीयराज्यमदोन्मत्तः पापकर्मरतः सदा ॥६८॥ ततोऽपुत्री त्वहं राज्ये कृत्वा तं सुरथानुजम्। वार्धके तु वनं प्राप्तस्तपस्तीव्रं समाचरम् ॥६९॥ एकदा स्नातुमुद्युक्तो निमग्नोऽहं सरोवरे। ततो मृतो दिवं प्राप्तस्त्वहं स्वीयतपोबलात् ॥७०॥

सामने बैठे हैं तो प्रेमपूर्वक वाल्मीकिको छातीसे लगा लिया और बड़े प्रसन्न हुए ॥ ५२॥ ५३॥ इसके बाद रामने हनुमान्जीको रत्नोंसे खचित दो कङ्कण दिये। जिन्हें पहनकर हनुमान्जी बहुत सुन्दर दीखने लगे। फिर रामजीने एक दूसरा कंकण जिसे अगस्त्यजीने दिया था, वह लवको दे दिया। उस बहुमूल्य कंकणको पहि- नकर लव भी अतिशय शोभायमान हुए। तब लवने अगस्त्यजी का प्रणाम करके कहा- ॥ ५४-५६ ॥ हे मुनिराज ! यह कंकण आपको कहाँ मिला था ? सो हम बतलाइये। इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर अगस्त्य परम प्रसन्नतापूर्वक कहने लगे ॥ ५७ ॥ एक बार मैं दण्डकारण्यमें एक सरोवरपर स्नान करने गया। वहाँ स्नान-नित्यकर्म आदि कर तीर्थपर थोड़ी देरके लिए बैठ गया ॥ ५८ ॥ इसी बीच आकाशमार्गसे एक स्व- र्गीय प्राणी सैकड़ों स्त्रियोंसे घिरा हुआ दिव्य विमानपर आरूढ़ होकर वहीं आया ॥ ५९ ॥ वह दिव्य माल्य आदि धारण किये हुए दिव्य गन्धसे चर्चित था। उस स्वर्गकि आते ही सरोवरसे एक भयानक दूषित तथा दुर्गन्धपूर्ण शव निकलकर तटपर आ लगा ॥ ६० ॥ ६१ ॥ इसके अनन्तर वह स्वर्गीय प्राणी अपने विमानमें उतरकर उस शवके पास पहुँचा और उसके मांसको उसने बड़े प्रेमसे खाया। फिर जल पिया और अपने विमानपर जा बैठा। उधर शव फिर डूब गया। उस गमनोन्मुख स्वर्गीके पास पहुंचकर मैंने उससे कहा- हे दिव्यस्वरूपधारिन् ! थोड़ी देरके लिए रुककर मेरी बातोंका उत्तर देते जाओ। तुम्हारे इस कार्यको देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ है। अच्छा हमें यह बताओ कि इस प्रकार स्वर्गीय प्राणी होकर भी तुम मुर्दा क्यों खाते हो ? ॥ ६२-६५ ॥ मेरा बात सुनकर उसने उत्तर दिया हे ब्रह्मन् ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। सुनो, मैं सब बतलाता हूँ पूर्वसमयमें विदर्भ देशके अधिपति सुदेव नामके एक राजा थे। उनके श्वेत और सुरथ नामके दो पुत्र थे। जिनमें श्वेत मैं था और राज्य भी मेरे ही हाथोंमें था ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ उस समयमें राज्यमदसे मत्त होकर मैंने कोई दान नहीं किया। हमेशा पापकर्ममें रत रहा ॥ ६८ ॥ मेरे कोई सन्तति नहीं थी। इसलिए वृद्धावस्थामें अपने छोटे भाई सुरथको मैंने राज्यासनपर बिठा दिया और जंगलमें जाकर कठोर तपस्या करने लगा। एक बार स्नान करनेके लिए एक सरोवरमें डूबने लगातो सो वहीं डूबकर मर गया। मरनेके बाद अपनी तपस्याके प्रभावसे मैं स्वर्गलोकमें पहुँचा। तपस्याके फलस्वरूप वहां