श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
DevanagariHindipublished811 पृष्ठ
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सर्गः १७ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०१
तपसश्च फलैस्तत्र ममासन्सर्वसंपदः अदृष्ट्वा भक्षितुं किंचिन्मया पृष्टः सुरेश्वरः । ७१॥
वर्तन्ते विविधास्तत्र मम भोगाः सुदुर्लभाः । कथं नास्तीहभक्ष्यार्थं कथं मेऽत्र सुखं भवेत् ॥७२॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा मामिंद्रः प्राह सस्मितः । नैव दानं त्वया भूमौ कृतं राज्यमदेन हि ॥७३॥
अदत्तं लभ्यते नैव नृप पुण्यैः कदेतरैः । अतस्त्वं प्रत्यहं गत्वा विमानेन सरोवरम् ॥७४॥
भक्षयस्व शवं पुष्टं मिष्टान्नौः पोषितं च यत् चिरकालं भवेत्तच्च क्षुध यास्यात नैव तत् ॥७५॥
इतींद्रवचनं श्रुत्वा स पृष्टश्च पुनर्मया दिव्यान्नानि कथंचाहमाप्नुयां तद्वदस्व माम् ॥७६॥
इति मद्वचनं श्रुत्वा सेंद्रैः प्राह मां पुनः अधुना दण्डकारण्यं वर्तते हीनमानुषम् ॥७७॥
विन्ध्यवृद्धिनिरोधार्थमगस्तिः सुरयाचितः यदा यास्यति पन्त्या वै मुक्त्वा काशीं हि दण्डकम्॥७८।
सरस्यस्मिंस्तदा स्नात्वा स्थितं पश्यसि तं मुनिम् । तदा तस्मै कंकणं स्वं देहि तोयैः परिप्लुतः ॥७९॥
तेन कंकणदानेन दिव्यान्नंः प्राप्स्यसे नृप । इतींद्रवचनं श्रुत्वा तदारभ्य चिरं मुने । ८०.।
अत्रागत्य शवाहारः क्रियते वै सदा मया एतावत्कालपर्यंतं नात्र कश्चिन्मयेक्षितः । ८१॥
मया दृष्टस्त्वमेवात्र वेद्मि त्वां कुम्भसंभवम् । अद्य त्वया तारितोऽहं दानं स्वीकुरु मे त्विदम् ॥८२॥
#### अगस्त्य उवाच
इत्थं स्वर्गी स मामुक्त्वा ददौ कंकणमुज्ज्वलम् मद्य सार्द्धं ततः स्वर्गं ययौ स्वर्गी मुदा युतः । ८३॥
तदारभ्य शवं तोयात्सद्विहस्तन्न ययौ कदा । दिव्यान्नानि तु संप्राप नाकलोके यथामुखम् ॥८४॥
इति यत्कंकणं लब्धं मया लव पुरा वने । अर्पितं राघवायेदं तेन तच्चापि तेऽर्पितम् ॥८५॥
#### श्रीरामदास उवाच
इत्यगस्त्यवचः श्रुत्वा लवः पप्रच्छ तं पुनः । किमर्थं दण्डकारण्यं तद्बभूव विजनं वद ॥८६॥
#### अगस्त्य उवाच
इक्ष्वाकुवंशसंभूतोऽभून्नृपो विन्ध्यदक्षिणे । नाम्ना दण्डकेति ख्यातः पापकर्मरतः सदा ॥८७॥
सब चीजें तो विद्यमान थीं, लेकिन खानेके लिए कुछ नहीं था। तब मैने इन्द्रसे कहा- हे देवेन्द्र ! यहाँ मेरे भोगनेके लिए तो और सब कुछ है, किन्तु खानेके लिए कुछ भी नहीं दीखता। बताइए, इस तरह मैं क्योंकर सुखी रह सकूँगा ॥ ६९-७२ ।। मेरा बातको सुनकर मुस्कराते हुए इन्द्र कहने लगे- तुमने राज्यमद वश पृथ्वीपर कोई दान नहीं किया था । बिना दिये कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए तुम प्रतिदिन विमानसे जाकर उस मिष्टान्नसे परिपुष्ट अपने शरीरको खा जाया करा। वह बहुत दिनों तक नष्ट न होकर ज्योंका त्यों बना रहेगा ।। ७३-७५ ।। इस प्रकार इन्द्रकी बात सुनकर मैने कहा- यह बतलाइये कि मुझे स्वर्गीय अन्न किस तरह प्राप्त होगे ? मेरा बात सुनकर इन्द्रने उत्तर दिया कि अभी तो दण्डकारण्य मनुष्यविहीन है। जब विन्ध्य पर्वतकी वृद्धि रोकनेके लिए अगस्त्यजी देवताओंके प्रार्थना करनेपर काशी छोड़कर दण्डकारण्यको जायेंगे, तब तुम इसी सरोवरमें स्नान करके अपना कंकण उन ऋषिकों दे देना ।।७६-७९ ।। उस कंकणके दानसे तुम्हे स्वर्गीय अन्न मिलने लगेगा। अतएव इंद्रके आज्ञानुसार मै बहुत दिनोंसे आकर यह शव खाया करता हूँ। इतने दिन बीत गये, किन्तु यहाँ मुझ कोई नहीं दिखायी पड़ा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ आज तुम्ही दीख रहे हो। इससे ज्ञात होता है कि तुम अगस्त्य ऋषि ही हो। आज तुमने मेरा उद्धार कर दिया। अब कृपा करके मेरे दानको स्वीकार करो ॥ ८२ ॥ अगस्त्यने कहा कि इस तरह कहकर उस स्वर्गीय प्राणीने अपने कंकण उतारकर हमें दे दिये और प्रसन्न मनसे विमानपर सवार होकर स्वर्गलोकको चला गया। तबसे वह शव उस सरोवरमें कभी नहीं उतराया और वह स्वर्गी स्वर्गलोकमें दिव्य अन्नोंको पाने लगा। हे लव ! मैने जिस कङ्कणको उस समय दण्डकारण्यमें पाया था, उसे रामको दिया और रामने आज आपको दे डाला है। श्रीरामदासने कहा- तब लवने अगस्त्यसे पूछा कि उस वनका दण्डक यह नाम क्यों पड़ा ? अगस्त्य कहने