श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 523, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १८ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५०७
रामनाथेन यद्दत्तं पुरदानं द्विजोत्तमान् । रामनाथपुरं चेति तदारभ्य प्रथां गतम् ॥५७॥
तस्य ब्रह्मपुरमिति नाम प्राथमिकं स्मृतम् । रामनाथपुरं चेति तस्यैवाख्याऽपरा स्मृता ॥५८॥
शिलामारोपितं द्रव्यं दक्षिणार्थं निधाय सः । तां शिलां पूज्य विप्रेभ्यः श्रीरामः सीतया ददौ ॥५९॥
ततोऽब्रवीद्वायुपुत्रं भोजनोत्तरं त्वया । विमानेन शिला नेया रामनाथपुरं द्विजैः ॥६०॥
कम्बुकण्ठं ततः पत्रं लेखयामास राघवः । ब्राह्मणानां त्वया कार्यं साहाय्यं सर्वदेति वै ॥६१॥
ततस्तुष्टा द्विजाः सर्वे ददुराशीः सहस्रशः । चकार भोजनं रामस्ततस्तैः परिवेष्टितः ॥६२॥
ततः सर्वे विमानेन ययुर्विप्राः पुरं प्रति तान्दृष्ट्वा मारुतिश्चापि विमानेन ययौ पुनः ॥६३॥
एवं चकार दानानि सप्तद्वीपान्तरेषु हि । सहस्रशो रामचन्द्रेस्तेषां संख्या न विद्यते ॥६४॥
रामनाथपुरस्थास्ते विप्राः कालांतरेण वै दुष्टराज्यभयादग्रे तां शिलां भयविह्वलाः ॥६५॥
तडाके प्रक्षिपिष्यन्ति ततः कष्टं भजन्ति ते । मर्तुकान् द्विजान्दृष्ट्वा तटाकान्मारुतिः पुनः ॥६६॥
बहिर्निष्कास्यति शिलामग्रे कालान्तरेण हि ।
विष्णुदास उवाच
किं कष्टं भूसुरानग्रे भविष्यति स्वजीविते ॥६७॥
यतस्ते त्यक्तुकामाश्च भविष्यन्ति वदस्व तत् ।
श्रीरामदास उवाच
अग्रे कश्चिद्दुष्टराजा भविष्यत्यवनीतले , ६८॥
स ताडयिष्यत्य विप्रांश्च तद्राज्यहरणेच्छया वदिष्यति कलौ गजा युष्माकं दानमर्पितम् ॥६९॥
यदि रामेण तद्दानपत्रं मे दृष्टिगोचरम् । करणीयं न चेच्छीघ्रं यावत्काल पुरोद्भवम् । ७०॥
युष्माभिर्वसु यद्भुक्तं तत्सर्वं दीयतां मम । नोचेत्सर्वान्वधिष्यामि भूसुराणां यदस्त्वहम् ॥७१॥
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे श्रुत्वेदं नृपतेर्वचः । भयभीता मंत्रयित्वा नृपं प्रोचुस्त्वरान्विताः ॥७२॥
साफ दिखायी देने लगा ॥ ५६ ॥ रामने ब्राह्मणोंको वह पुर दान दिया था, इसीसे उसका रामनाथपुर नाम पड़ गया । ५७ ॥ पहले उसका ब्रह्मपुर नाम था। जबसे रामने उनको दान दे दिया, तभीसे रामनाथपुर उसकी संज्ञा हुई । ५८ ॥ उस शिलाक तोल कर द्रव्य दक्षिणाके निमित्त रखकर सीताके साथ रामने उन विप्रोंकी पूजा की और वह शिला उनको दे दी ॥ ५९ ॥ इसके बाद रामने हनुमान्जीसे कहा कि भोजन कर लेनेके बाद इन ब्राह्मणोंके साथ जाकर यह शिला गामनाथपुरमें पहुँचा आना ॥ ६० ॥ इसके बाद रामने कम्बुकण्ठको एक पत्र लिखवाकर उन ब्राह्मणोंको दिया ; जिसमे लिखा था कि आप सदा इन ब्राह्मणोंकी सहायता करते रहें ॥ ६१ ॥ तदनन्तर प्रसन्न मनसे विप्रोंने आशीर्वाद दिया और रामने इन सबके साथ बैठकर भोजन किया ॥ ६२ ॥ इसके अनन्तर वे सब विप्र पुष्पक विमानपर बैठकर अपने आश्रमको चले और रामसे पूछकर हनुमान्जी भी विमानपर बैठकर उनके साथ-साथ गये ॥ ६३ ॥ इस तरह सातो द्वारोंमें रामने हजारों दान किये । ठीक तरहसे जिनकी सही संख्या नहीं जानी जा सकती ॥ ६४ । रामनाथपुरमें रहनेवाले वे विप्र भविष्यमें दुष्ट राजाओके भयसे उस शिलाको तालाबमें फेंक देंगे, जिससे उनको बड़ा कष्ट प्राप्त होगा। जब वे मरनेपर उतारू हो जायेंगे तो हनुमान्जी उस शिलाको फिर निकालेंगे ।६५। विष्णुदासने पूछा कि ब्राह्मणोंको आगे चलकर अपने जीवनमें कौन-सा कष्ट उठाना पड़ेगा । ६६ ॥ ६७ ॥ जिसके लिये उन्हें वह शिला त्यागनी पडेगी, सो कहिये श्रीरामदासने कहा कि पृथ्वीतलमें आगे चलकर एक कोई दुष्ट राजा होगा ॥ ६८ ॥ वह कलियुगी राजा उन ब्राह्मणोंको मारकर उनका राज्य छीननेकी इच्छासे कहेगा कि यदि रामने तुमको यह राज्य दान करके दिया है तो वह दानपत्र दिखाओ। नहीं तो इतने दिनों तक इस राज्यकी जितनी आय तुम लोगोंने ली है, वह सब लाकर दे दो । नहीं तो मैं सबको मार डालूँगा। क्योंकि ब्राह्मणोंके लिए मैं