भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 524
५०८आनन्दरामायणे[सर्गः १८

मासेनेकेन पत्रं ते दर्शयिष्यामहे वयम् । ततो मुमोच तान्राजा तेऽपि तूष्णीं पुरं ययुः ॥७२॥
तटाकस्य तटं भित्त्वा प्रवाहाः शतशस्ततः । मोचयामासुः सर्वत्र नांतं तस्य जलस्य ते ॥७३॥
ददृशुः सकला विप्रास्ततस्ते प्राणसंकटम् । साग्न्या तत्र निराहारा निषेदुः सङ्गमस्तटे ॥७४॥
राघवं परमात्मानं चिंतयामासुरादरात् । एवं मासे व्यतिक्रांन्ते वर्षं कृत्वाऽमनो नृपात् ॥७६॥
भयात्प्राणांस्त्यक्तुकामाश्चासन्स्तस्मिन जलाशये । तदा तेषां स्त्रियः पुत्राश्चक्रुः कोलाहलं महत् ॥७७॥
तान्सर्वात्सांत्वयामासुर्नानानीत्युत्तरैर्द्विजाः । स्वयं स्नात्वा द्विजाः सर्वे ददुर्दानान्यनेकशः ॥७८॥
चक्रुः प्रदक्षिणाः सप्त तटाकायोत्तराणनाः । ऊर्ध्वदीर्घस्वरेणैव प्रबद्धकरांसंपुटाः ॥७९॥
हे राम जानकीकांत त्वद्दानादीदृशी गतिः । प्राप्ताऽस्माकं सुताग्रस्त्वं सर्वान्पश्य रघूत्तम ॥८०॥
पुरोद्भवं तु यद्द्रव्यं पूर्वजैर्भुक्तमेव तत् । एतावत्कालपर्यन्तमद्यतन्निराधुना कुतः ॥८१॥
तत्प्रदेयमसंरूयातमतस्त्यक्ष्याम जीवितम् । इत्युक्त्वा ब्राह्मणाः सर्वे निमील्य नयनानि ते ॥८२॥
चिंतयामासुः स्वीयेष्टां देवतां मरणोन्मुखाः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवागारे हनूमतः ॥८३॥
पाषाणमूर्तेः प्रकटाः संबभूवाऽञ्जनीसुतः । दीर्घस्वरेण तान् प्राह भूमण्डलसमाद्रुतिः ॥८४॥
यूयं मा जीवितान्यद्य त्यजध्वं ब्राह्मणोत्तमाः । आगतो राघवस्याहं दामाऽञ्जनेयमुद्भवः ॥८५॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा द्विजास्ते विस्मयान्विताः । उन्मील्य नयनान्यग्रे ददृशुर्मारुतनन्दनम् ॥८६॥
दीर्घबाहुं महाघोरं पिंगकेशविराजितम् । जरठं पर्वताकारं रामनामप्रभाषणम् ॥८७॥
तं दृष्ट्वा ते द्विजाः सर्वे प्रणेमूर्हृष्टमानसाः । कथयामासुस्त सर्वं स्वीयं वृत्तं सविस्तरम् ॥८८॥
ततः स मारुतिर्वेगात्सरसस्तां शिलां बहिः । निष्कास्य विप्रवर्येस्तैः शिलां पूत्वा स्वयं कपिः ॥८९॥


समराज हूँ ॥६९-७१॥ राजाकी ऐसी बात सुनकर ब्राह्मण भयभीत हो तथा परस्पर सलाह करके उससे बोले कि एक महीने में आपका वह दानपत्र लाकर दिखायेंगे। यह सुनकर राजाने ब्राह्मणोंको छोड़ दिया और वे चुपचाप लोटकर अपने-अपने घर चले गये ॥७२-७३॥ वहाँ पहुंचकर उन्होंने उस तड़ागका बांध तोड़ दिया। जिससे सैकड़ों सोते वह निकले और चारों ओर फैलकर वहनेपर भी तड़ागका जल नहीं चुका। जब ब्राह्मणोंने देखा कि अब प्राण सङ्कटमें आ गया है तो सस्त्रीक सब उसीके एक ऊंचे किनारेपर उपवास करते हुए बैठ गये और परमात्मा रामचन्द्रजीका ध्यान करने लगे। इस प्रकार एक महीना बीत जानेपर जब उन विप्रोंने सोचा कि अब वह दुष्ट राजा हमकों मार डालेगा तो सबने अपने प्राण त्यागनेके लिए तैयार हो गये। उस समय उनके घरकी स्त्रियां तथा बच्चे अत्यधिक दुखित होनेके कारण सब के सब चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगे ॥७४-७७॥ तब उन्होंने स्त्रिया बच्चोंको अनेक प्रकारका नीतिमयी बात सुनाकर सान्त्वना दी। स्वयं उन विप्रोंने स्नान करके नाना प्रकारके दान दिये। फिर उन्होंने उस तलावकी सात परिक्रमा की और उत्तरकी ओर मुख करके खड़े हो गये हाथ जोड़कर ऊंचे स्वरसे वे कहने लगे हे राम ! हे जानकीकान्त ! तुम्हारे दिये हुए दानसे आज हमारी यह दुर्दशा हो रही है हे रघूत्तम ! अब तुम हमलोगोंको मरा हुआ समझो ॥७८-८०॥ पूर्वकल्पमें हमारे पूर्वजोंने जो धन इस राज्यसे पाया, वह सब उन्हीं लोगोंने खर्च कर दिया। अब हम कहाँसे असंख्य धन लाकर इस राजाको दें, इतना धन जुटाना हमारी शक्तिसे बाहर है। अतएव हम अपने शरीरको त्याग देंगे। इतना कहकर उन मरणोन्मुख विप्रोने नेत्र मूंद लिये और अपने इष्टदेवका ध्यान करने लगे। उसी समय पासके देवालयमें पाषाणमयी मूर्तिसे हनुमान्जी प्रकट हुए और जोर-जोरसे चिल्लाकर कहने लगे—॥८१-८४॥ हे ब्राह्मणो ! तुम लोग अपने प्राण मत त्यागो, रामचन्द्रजीका सेवक अञ्जनीपुत्र मैं हनुमान् आगया, इस प्रकार उनकी बात सुनकर विस्मित भयेसे उन सबोंने नेत्र खोलकर हनुमान्जीको देखा ॥८५॥८६॥ उस समय उन हनुमान्जीका लम्बा तथा भयानक हाथ था, पीले-पीले केश थे, बूढ़ी अवस्था थी, पर्वताकार शरीर था और वे निरन्तर रामनामका उच्चारण करते जाते थे ॥८७॥ उनको देखा तो प्रसन्न चित्तसे उन ब्राह्मणोंने प्रणाम किया और विस्तारपूर्वक अपने