श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १९ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५१५
जनागमान्वितां दृष्ट्वा दृष्ट्वेष्यांडिरिङ्गिताम् । शनैर्ययौ प्रभुर्गोष्ठं नानाधेनूर्ददर्श सः ॥८६॥ तां सम्प्रेक्ष्य गृहं मातुः स्वदासीपरिवेष्टिताम् । द्वारान्निर्गत्य ययौ रामस्तत्र ते लक्ष्मणादयः ॥८७॥ चक्रुः प्रणामं श्रीरामे तैः सहैव शनैः शनैः । वाजिशालां ययौ रामो दृष्ट्वा तत्र स वाजिनः ॥८८॥ गजशालामुष्ट्रशालां दृष्ट्वा रामः शनैः शनैः । ददर्श शस्त्रागारांश्च व्याघ्रशालां प्रभुर्ययौ ॥८९॥ दृष्ट्वाऽथ शिविकाशालां माहिषेयीं विलोक्य च । महिषादृष्टवानां च रथशालां ददर्श सः ॥९०॥ आरुह्य स्यन्दने रामः शनैः सर्वैरनिर्ययौ । सप्तकक्षाः समुल्लङ्घ्य तत्रस्थाः पूर्ववज्जनैः ॥९१॥ सर्वैर्युक्तब्रह्मचर्य्यां तां श्रेष्ठां कक्षां ददर्श सः । तत्र यन्त्राणि श्रेष्ठानि शतघ्नीः सङ्कटस्थिताः ॥९२॥ तृणकाष्ठादिमत्तानि दूतस्थानान्यपश्यत । ततो नवमकक्षायां ददर्श रघुनन्दनः ॥९३॥ शस्त्रपाणीन्गजान्स्थांश्च तुङ्गस्थाननेकशः । रक्षयन्ति हि ये सर्वे स्वीयं गेहं त्वहर्निशम् ॥९४॥ एवं स नवरक्षाश्च समुल्लङ्घ्य रघूत्तमः । बहिः समाचनो दृष्ट्वा परिखाः सजला नव ॥९५॥ शनैः पश्यन्नयोध्यां तां राजमार्गं मुदान्वितः । शीघ्रं ययौ पुरद्वारं ददर्श द्वाररक्षकान् ॥९६॥ नवकक्षास्त्वयोध्यायाः समुल्लङ्घ्य शनैः प्रभुः । परिखाश्च नरापश्वनौषयन्त्रादिसंरिताः ॥९७॥ ततो नानावनारामकौतुकानि रघूत्तमः । पश्यन्म बन्धुपुत्रैश्च सरय्वास्तीरमाययौ ॥९८॥ तत्र स्थित्वा सुनीकायां क्रीडां कृत्वा कियत्क्षणम् । नद्यास्तटे सभायां म तन्व्यों सैन्यवृतः प्रभुः ॥९९॥ यत्रापि वारयोषितां पश्यन्कल्याणनि राघवः । कियत्कालमतिक्रम्य ययौ शीघ्रं ततः पुरम् ॥१००॥ ततः शनैः सभां गत्वा पूर्वकिङ्करसंयुतः । लक्ष्मणाद्यैः सेवितश्च तव्यां सिंहासनेोपरि ॥१०१॥ ततः कृत्वा ह्यनेकानि नानाकार्याणि राघवः । आज्ञाप्य बन्धुपुत्रांश्च पूर्ववन्म गृहं ययौ ॥१०२॥
फौवार आदि दखत थे ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ फिर पोकराम पान हुए पौलपका दखत थ। सन्चभूत होकर मार्गमे सर्वोच्य प्रासादपर चढ़ जाते और बट्टभि वनों और बगीचास अलंकृत, बावली तथा गंजोसे अतिरंजित अपनी अयोध्यापुरीको देखत थ। फिर बार-वारे गोशालास जात और वहांपर गौओका देख्या करते थे। ८५ ॥ ॥ ८६ ॥ इसके अनन्तर दासियो सम्त सीताका घर नल दन और म्वयं पाहरका आर जाते थे। वही लक्ष्मण आदि भ्राता रामका संविभ्रम प्रणाम करत थ ॥ ८७ ॥ फिर उनका साथ लेकर राम धीरे-धीरे अश्वशालाका जाते । वहाँ पाशेका देखकर ॥ ८८ ॥ गजशाला और उष्ट्रशालाका देखत हुए अस्त्रशाला तथा व्याघ्रशालाका अवलोकन करते थे ॥ ८६ ॥ फिर शिविकाशाला और महिषीशालाम जाकर शिविकाओं तथा भैंसोको देखकर बाद रथशाला दखत थे ॥ ९० ॥ तत्पश्चात् एक रथपर सवार होकर बनै बनै बाहरकी तरफ जाया करते थे । सातवे महलके सातों चौकाका लाघत एव पहनेक तरह उपस्थित सब लोगी दखत हुए आठवें फाटकवाले आँगनम पहुंचते थ। वहाँपर लट्टध्याय काम आनवाल कितन ही यन्त्र तथा बहुत-सी तोपे रक्खी रहती थी ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ उण्टे दक्सर दूतके निवासस्थान तथा तृण काष्ठ दिके सग्रहभवनका देखनेके अनन्तर नव आँगनम पहुंचते थे ॥ ९३ ॥ वहीं यह दखत थे कि हाथम शस्त्र लिये पाठ और हाथोपर सवार होकर सिपाही रात-दिन अपने अपने स्थानो की रक्षा कर रहे है ॥ २४ ॥ इस प्रकार नया कक्षाओका लांघकर कोटके चारों ओर जलसे भरी बाहरकी नौ साइरोका देखत थे ॥ ९५ ॥ इसके बाद राजमार्गम चलकर अयोध्याको देखत हुए शीघ्र पुरद्वारपर पहुँचत और वहाँपर रहनेवाले द्वाररक्षकोभी देख-रेख करते थे ॥ ९६ ॥ फिर अयोध्याकी नौ कक्षाओंको लांघकर जल और अग्निस परिपूर्ण नौ परिखाएँ और अनेक बाग-बगीचेके कौतुक देखते हुए अपने भाइयो और पुत्रोके साथ सरयूके तीर पहुंचते थे ॥ ९७। ९८ ॥ वहीं एक अच्छी नौकापर बैठ तथा कुछ देरतक तैर करके सेनके शिबिरमे जाते और सैनिकोके साथ सभा में बैठते थे ॥ ९९ ॥ वहाँ कुछ समय तक वेश्याओक नृत्य देखकर पुरमें लोट आया करते थे ॥ १०० ॥ तदनन्तर सभामे जाते ओर पूर्वमे जो कह भये है, उन सबके साथ लक्ष्मणादि भ्राताओसे संवित होकर सिंहासनपर बैठते थे ॥ १०१ ॥ वहाँ कनक कार्योंको करनेके पश्चात् भइओं और पुत्रोको अपने-अपने घर जाने-