श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
सायंकाले ततः संध्यां कृत्वा हुत्वा यथाविधि । गंधाद्यैरुपचारैश्च शिवं सम्पूज्य भक्तितः ॥१०३॥ कृतोपहारं निर्वेद्य पुत्राभ्यां बन्धुभिः सह । शिविकायां पुनः स्थित्वा देवयानेषु च ॥१०४॥ साकेतस्थेषु श्रीरामोगत्वा नत्वा शिवादिकान् । नानाविधान्देवगणान् फलैः पुष्पैर्ह्यपूजयत् ॥१०५॥ देवालयेषु सर्वेषु सुराणां तेषु राघवः । शृण्वन्नानाकीर्तनानि वारस्त्रीनर्तनान्यपि ॥१०६॥ पश्यन्नानाकौतुकानि परां मुदमवाप सः । वाहना रूढ देवान् मपश्यत्कौतु कानि च ॥१०७॥ ततो ययौ ब्राह्मणेन दृढमार्गेण राघवः । रत्नदीपप्रकाशैश्च विवेश निजमंदिरम् ॥१०८॥ क्षणे नानागथाभिश्च वार्त्ताभिः पुत्रबन्धुभिः । सार्द्धयामां निशां नीत्वा रतिगेहे विवेश सः ॥१०९॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीताऽग्रे रतिमन्दिरे । पुष्पशय्यादि सम्पाद्य तन्प्रतीक्षां चकार सा ॥११०॥ तावदायांतमालोक्य सहसोत्थाय जानकी । धृत्वा हस्ते रामचंद्रं रतिशालां निनाय सा ॥१११॥ सर्वा विसर्ज्य दासीश्च मुक्ताजालान्यनेकशः । समततो विमुच्याथ तस्थौ रामः स मंचके । ११२॥ ततस्तां मैथिलीं धृत्वा मंचके संन्यवेशयत् । नाना क्रीडां विधायाथ तस्थौ रामः स मंचके ॥११३॥ ततस्तुष्टं रमानाधं जानकी लज्जिताऽब्रवीत् । राम राजोदवत्राक्ष किंचिन्पृच्छामि मे वद ॥११४॥ कुशजन्मानन्तरं हि कथं गर्भो मयान वै । धार्यते कारणं स्वस्य किमस्ति तद्वदस्व माम् ॥११५॥ तत्सीतावचनं श्रुत्वा सस्मित प्राह राघवः । हे सीते कञ्जनयने सम्यक् पृष्टं त्वया मम । ११६॥ तत्सर्वं ते वदाम्यद्य तच्छृणुष्व सुमध्यमे । किमर्थं च बहून् पुत्रांस्त्वमत्र वाञ्छसि प्रिये ।॥११७॥ सदृशे बहवः पुत्रा न योग्यास्त्वत्र वै भुवि । कुर्दकस्य दुराचारात्कुलस्य लांछनं भवत् ॥११८॥ अतएव ममेच्छा न बहुपुत्रेषु मैथिलि । मदिच्छया त्वया गर्भो धार्यते न कदाचन ॥११९॥ पुत्रस्त्वेकः प्रतीक्ष्यो हि यः कुल भूपयेद्गुणैः । किं भ्रात्रा बहवः पुत्रा दुष्टास्ते कुमयो यथा । १२० ।
की आज्ञा देकर स्वयं भी अपने घर चले जात थे ॥१०२॥ सायंकालके समय विधिवृर्वक सन्ध्या और हवन करके धूप-दीप-गन्धादि उपचारोंस भक्तिपूर्वक शिवजीकी पूजा करते थे । १०३ । फिर भोजन करके पुत्रों तथा बान्धवोंके साथ पालकीमें बैठकर देवताओंके मन्दिर को जाते थे ॥१०४॥ साकेतपुरी (अयोध्या) के सब मन्दिरोंमें जाकर शिवाटिक देवताओंको नमस्कार करके फल-फूलसे पूजन करते थे ॥१०५॥ उन्हीं देवालयोंमें थोड़ी देर तक हरिकीर्तन सुनने तथा गणिकाओंका नृत्य देखने थे ॥१०६॥ इस प्रकार विविध कौतुकोंको देखकर राम बहुत प्रसन्न होते थे। तदनन्तर देवताओंका सवारोक कौतुक देखते थे। १०७॥ इसके बाद सवारीपर बैठकर रत्नके बने दीपकोंके प्रकाशमें चलते हुए राजमार्गेसे अपने घर जाते थे ॥ १०८ फिर पुत्रों तथा भ्राताओंके साथ कुछ देरतक इधर उधरकी बात करते और डेढ़ पहर रात बीतनेक बाद रतिशालामें प्रविष्ट होते थे। १०९। उधर सीता अपना रतिशालामे फूलोंकी शय्या बिछाकर रामके आनेकी प्रतीक्षा करती रहती थीं ॥ ११० ॥ वे शमको आते देखती तो तुरन्त आगे बढ़ती और उनका हाथ पकड़कर रतिशालाके भीतर ले जाती थी ॥ १११ ॥ वहाँ सीताका सेवाम उपस्थित दासियोंको बिदा करके रामचन्द्र कमरेकी सारी खिड़कियां खोलकर शय्यापर बैठते थे ॥ ११२ । इसके बाद सीताका हाथ पकड़कर उन्हें भो बैठाते और विविध क्रीड़ा करके सीताको प्रसन्न करने लग जाते थे । ११३ ॥ इस प्रकार प्रसन्न रामको देख-कर एक दिन सीताने लज्जित भावसे कहा- हे राजोवपत्राक्ष राम ! मैं आपसे यह पूछना चाहती हूँ कि कुशके जन्म लेनेके बाद फिर मेरे गर्भ क्यों नही रहता ? इसका कारण बतलाइये ॥ ११४-११५ ॥ इस प्रकार सीता का प्रश्न सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे-हे कञ्जनयनी सीते ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। मैं सब कारण बतलाता हूं । ११६ ॥ हे सुमध्यमे ! तुम सावधान होकर सुनो । हे प्रिये ! पहले मुझे यह बतलाओ कि तुम अधिक पुत्र क्या चाहती हो ? ॥ ११७ ॥ इस संसारके अच्छे कुलम अधिक पुत्र होना ठीक नहीं है। बहुतरे पुत्रोंमें यदि एक पुत्र भी दुराचारी निकल गया तो सारे कुलपर लाञ्छन लग जाता है ॥ ११८ । इसलिये हे मैथिलि ! मुझे अधिक पुत्नोंकी इच्छा नहीं है। मेरी इच्छा न रहनेके कारण ही तुम्हें गर्भ नहीं रहता ॥११९॥