भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 558, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 558
५४२आनन्दरामायणे[ सर्गः २४

तद्रामवचनाद्भ्रान्त्या बभूव पूर्ववत्सदा । नाभूकस्य कदा मेधाऽऽनन्दरामायणं प्रति ॥ ६७॥
सहस्रेषु नरः कश्चित्सप्तजन्मसु पुण्यवान् । आनन्दरामचरितं वेद स्तोत्रं न चापरः ॥६८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्द्धे आनन्दरामायणमहिमावर्णनं नाम त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥


चतुर्विंशः सर्गः

( रामका यमको उपदेश, सुमन्त्रका वैकुण्ठगमन और प्रजाको रामकी शिक्षा )

श्रीरामदास उवाच
एकदा संस्थितं रामं सभायां सेवकोऽब्रवीत् । राजराज महाराज रविवंशैकभूषण ॥ १ ॥
सुमन्त्रस्तेऽन्वितोवृद्धः स मन्त्री नाकं गतः प्रभो । तपन्त्यस्तं गन्तुमन्वाज्ञां पृच्छन्ति राघव ॥ २ ॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा चकितः हृष्टमानसः । शीघ्रं सुमन्त्रगेहं स ययौ यानेन राघवः ॥ ३ ॥
सुमन्त्रजन्मपट्टं तस्यायुःसंख्यां ददर्श सः । जन्मकालात्सहस्राणि नव नवशतानि च ॥ ४ ॥
नवनवतिवर्षाणि मासांस्त्वेकादशैव हि । एकविंशद्दिनान्यास्तांस्तथा शेषा दिना नव ॥ ५ ॥
ज्ञात्वैवं रामचन्द्रः स तदा प्राह गुरुं प्रति । कृत युगे तु लक्षायुः सहस्रं द्वापरे स्मृतम् ॥ ६ ॥
शतवर्षं कलौ प्रोक्तं सहस्राणि दशाथ वा । त्रेतायां कायतं चायुस्तन्मद्राज्ये मृषा कृतम् ॥ ७ ॥
यमेन मामवज्ञाय महद्दण्डं लघ्वामहेच्छता । दिनानिनव शेषाणि सांत मे मन्त्रिणः कथम् ॥ ८ ॥
यमेन नीतस्त्वद्यैव यमं दण्ड्या नयाम्यहम् । सुमन्त्रं त्रापयाम्यद्य पश्य मे त्वं पराक्रमम् ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा गरुडारूढः कोदण्डं कलयन् करे । वेगेन रघुनन्दनः स ययौ संयमनीं पुरीम् ॥ १०॥
तावन्मार्गे सुमन्त्रं तं पाशबद्धं यमानुगाः । गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा तान्त्सर्वांस्ताडयन्मुहुः ॥११॥
सुमन्त्रं मोचयामास लिंगरूपधरो प्रभुः । तदा तं राघवं प्रोचुश्चापराधं तवाद्य किम् ॥१२॥


लोगोंके हाथ होंगे और तथा लोग इस जानग । तबस रामके कथनानुसार किसीकी बुद्धि आनन्दरामायणकी ओर नहीं गयी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ क्योंकि हजारोंमे कोई एक-आध मनुष्य ही संत जन्मोंका पुण्यवान् होगा और वही आनन्दरामायणको जान पायगा ॥ ६८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयरचित व्याख्याभावाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

श्रीरामदास कहते लग—एक बार राम अपनी सभामें बैठे थे । तभी एक सेवकने आकर कहा—हे राज-राज ! हे सूर्यवंशके अलङ्कारस्वरूप महाराज आपका वृद्ध मन्त्री सुमन्त्रस्वर्ग चल गये। उनकी स्त्रियां सती होकर पतिकी अनुसरण करनेके लिये आपकी आज्ञा चाहती हैं ॥ १ ॥ २ ॥ इस प्रकारका सन्देश सुनकर राम एक रथपर सवार होकर सुमन्त्रके घर गय ॥ ३ ॥ वहाँ उन्होने उनकी जन्मकुण्डली मँगाकर देखा, जिससे ज्ञात हुआ कि ९९९९ वर्ष ग्यारह महीना सुमन्त्रकी आयु थी । जिसमे सब तो बीत गये, केवल नौ दिन बाकी रह गय थे ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा जानकर रामने गुरु वशिष्ठको बुलवाकर उनसे कहा कि सत्ययुगमें मनुष्यकी वायु लाख वर्षोंकी, द्वापरमें हजारकी, कलियुगमे सो वर्षकी तथा त्रेतायुगमें दस हजार वर्षकी कही गयी है । सो यमराजने मेरे राज्यमें मेरा अपमान करके उस नियमका उल्लङ्घन किया है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ऐसा ज्ञात होता है कि वह मेरे द्वारा दण्ड पाना चाहता है । मेरे मन्त्रीकी वायुके अभी नौ दिन बाकी हैं तो यम उसे यहाँसे क्या ले गया ? मैं आज यमको दण्डकर लाता हूँ और सुमन्त्रको जिलाता हूँ। मेरा पराक्रम देखिए ॥ ८ ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर राम गरुड़पर बैठ और धनुषको टङ्कार करत हुए यमकी संयमनी पुरीको चल दिये । तब तक रास्ते ही में उन्होंने पाशबद्ध सुमन्त्रको ले जात हुए कुछ यमदूतोंको दृष्टा । देखते ही रामने मुष्टियोंका मारकर लिंगरूपधारण सुमन्त्रको छुड़ा लिया। तब यमदूतोंने विनयपूर्वक