भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 559

सर्गः २४ ] राज्यकाव्यम् (उत्तरार्द्धम्) ५५३


अस्माभिर्भेदृशो दण्डो यतोऽस्माकं कृतस्त्वया । तदा तान्माधवः प्राह दिनान्यप्युर्नवास्व हि ॥१३॥
वर्तन्ते शेषभूतानि कथमद्यैव नीयते । भविष्यन्ति दिनान्यग्रे यदा नव यमानुगाः ॥१४॥
तदाऽऽनेयः सुखेनैषं न निषेधं करोम्यहम् । इति रामवचः श्रुत्वा तमूचुस्ते यमानुगाः ॥१५॥
अपूर्वमभवज्जन्म सुमन्त्रस्यास्य राघव । मातुर्योन्या बहिस्तस्य मुखं हस्तौ विनिर्गतौ ॥१६॥
पूर्वं तनोजस्य दशमे दिवसे दैवयोगतः । उदरादीन्यथोऽङ्गानि पदांशानि शनैः शनैः ॥१७।
विनिर्गतानि धीराश्च सुमन्त्रं रक्षिणो बुधैः । यस्माज्जन्मन्ययं तस्मात्सुमन्त्राख्याऽस्यमार्पिता १८॥
अतः पूर्वदिनारभ्य संख्ययाऽऽयुः प्रपूरितम् । अस्य तद्दिनादारभ्य संख्यया दिवसा नव ॥१९॥
शेषभूताश्च भवता कीर्त्यन्ते ये रघूत्तमः । अतोऽस्माकं नापराधः संदिग्धं जन्म चास्य हि ॥२०॥
वृथाऽयं नीयते राम वृथा शिक्षाऽपि नः कृता । इति तेषां वचः श्रुत्वा रामः प्राह यमानुगान् ॥२१॥
अस्य मौल्यदिनो ज्ञेयोऽप्रथमो हि यमानुगाः । यस्मिन् दिने सुप्रसूतिर्भवदस्यैव मातृकात् ॥२२॥
जन्माहदिवसो ज्ञेयः स एव जातकं तथा । तस्मिश्चैव दिनेऽप्यत्र कृतं पित्रा द्विजोत्तमैः ॥२३॥
ज्योतिर्विदा जन्मपत्रे स एव लिखितो दिनः । अतः शेषदिनाः मन्ये ऽस्यास्त्वद्याप्युतो नव ॥२४॥
अतो युष्माभिर्गन्तव्यं नेयोऽयं दशमे दिने । पुनरागत्य सान्निध्यान्मे निषेधं करोमि न ॥२५॥
इति रामवचः श्रुत्वा तूष्णीमेव यमानुगाः । साध्वसाच्च छिन्नाङ्गा यमराजं शनैर्ययुः ॥२६॥
रामोऽपि परिवर्त्याथ ययौ स्वनगरीं प्रति । स्त्रीभिर्निराजितो मार्ग विवेश मन्त्रिणो गृहम् ॥२७॥
तावत्सर्वान्प्रमुदितान्सुमन्त्रेण समन्वितान् । ददर्श रामचन्द्रः स तावद्दृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥२८॥
प्रणनाम सुमन्त्रः स पूजयामास राघवम् । ततो रामो ययौ गेहं सर्वे स्युर्मुदिताननाः ॥२९॥
दिनानि नव शेषापुर्ज्ञात्वा दानादिकं सुधीः । चकार प्रत्यहं भक्त्या सुमन्त्रो राघवाज्ञयाः ॥३०॥


कहा—हमने आपका क्या अपराध किया था, जिसके लिए आपने हमें ऐसा दण्ड दिया ? रामने कहा कि अभी इसके जीवनके नौ दिन बाकी हैं ॥ १०-१३॥ तब तुम आज ही इसे क्यों लिये जा रहे हो ? जब इसके दिन पूरे हो जायें, तब आकर आनन्दपूर्वक ले जाना। तब मैं भी कुछ नहीं बोलूँगा इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर यमके अनुचर कहन लगे-॥ १४। १५। हे राघव ! इसका जन्म भी एक अपूर्व प्रकारसे हुआ था। पहिले दिन माताकी योनिसे इसके दोनो हाथ तथा मुख बाहर निकल आया था। तदनन्तर दशवें दिन धार-धारे इसके और अङ्ग निकल ये ॥ १६ ॥ १७ ॥ तबसे धीरोंने दैवियोगसे इसको रक्षा कर ली थी। अतएव इसका सुमन्त्र नाम पडा था ॥ १८ ॥ इसके पूर्व दिनसे अर्थात् जिस दिन इसका हाथ तथा मस्तक बाहर आया, उस दिनसे लेकर आज तकमें इसकी आयु समाप्त हो गयी। आप जो इसके नौ दिन बाकी बतलाते हैं, वे संदिग्ध हैं। इसलिए हे राम ! हमारा कुछ दोष नहीं है ॥ १९ ॥ २० ॥ आप व्यर्थ इसे छीने लिये जात हैं, हमपर व्यर्थ आपक भाग भी है। उनकी बात सुनकर यमदूतोंसे रामने कहा—॥ २१ । हे यमानुचर ! वह अन्तका दिन अर्थात् जिस दिन माताके गर्भसे इसका अच्छी तरह जन्म हुआ है, वही जन्मका दिन माना जायगा ॥ २२ ॥ जिस दिन इसके जन्मका उत्सव मनाया गया है, वास्तव-में वही जन्मदिन है। उसी रोज इसके पिता तथा ज्योतिर्विदोंने इसका जन्म लिखा है। इसलिए अभी इसके नौ दिन बाकी हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम लोग जाओ और दसवें दिन आकर इसे ले जाना । तब मैं तुम लोगोंको नहीं रोकूँगा ॥ २५ ॥ रामकी बात सुन और छिप्तअङ्ग होकर शोचोम आंसू भरे हुए वे दूत यम-लोकको लौट गये ॥ २६ ॥ राम भी लौटकर अयोध्या चले आय। वहीं स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और राम सुमन्त्रके घर गये ॥ २७ ॥ वहाँ सब लोगोंको सुमन्त्रके साथ प्रसन्न देखा। सुमन्त्रने रामको देखते ही प्रणाम किया और उनकी पूजा की । इसके बाद राम अपने भवन गये । तबसे सब लोग परम प्रसन्न रहे ॥ २८ ॥ २९ ॥ सुमन्त्रने अपने जीवनके केवल नौ दिन बाकी जानकर रामके आज्ञानुसार खूब दान-पुण्य