भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २४


इत्यादिनानावचनैः प्रार्थितो रविणा यदा ।
तदा लवेोऽपि संहारं चक्रास्त्रस्य ब्रह्मणः ॥६२॥
ततो लवं पुरस्कृत्य यमेन तपनः पुरीम् । विवेश रघुनाथस्य दर्शनार्थं मुदान्वितः ॥६३॥
तदा खे देववाद्यानि नेदुः कुसुमवृष्टिभिः । लवं ववर्षुरमरा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६४॥
पौरनार्यो लवं मार्गे दवर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । गोपुराट्टालमस्थाश्च ददृशुस्तं मुहुर्मुहुः ॥६५॥
नेदुनानासुवाद्यानि ननृतुर्वारयोषितः । तुष्टुवुर्मगधाश्चाथ जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥६६॥
एवं नानामहोत्साहैः स्त्रीभिर्नीराजितः पथि ।
ययौ स विजयी बालः प्रननाम रघूत्तमम् ॥६७॥
रविमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । नत्वा रविं करे धृत्वा सभायां सन्निवेश्य ह ॥६८॥
ततः सिंहासने भानुं निवेश्य स्वीयपूर्वकम् । पूजयामास श्रीरामः षोडशैरुपचारकैः ॥६९॥
बद्धाऽञ्जलिर्द्विविं रामः सभायां पुरतः स्थितः ।
पूर्वजस्त्वं क्षमस्वाथ यल्लवेनापराधिनाम् ॥७०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शमं प्राह रविस्तदा । त्वन्नाभिकमलाद्ब्रह्मा समुद्भूतो रघूत्तम ॥७१॥
मरीच्याद्या विधेः पुत्रा मरीचेः कश्यपः सुतः ।
कश्यपस्य च ममोत्पत्तिः पौत्रपौत्रस्त्वहं तव ॥७२॥
क्षमस्व मम पुत्रेण यद्यमेनापराधिनाम् । एवं संप्रार्थ्य श्रीरामं चासने संन्यवेशयत् ॥७३॥
यमेन कारयामास रघुनाथाय वन्दनम् । तदा समाययुर्देवा नेमुः सर्वे रघूत्तमम् ॥७४॥
रामोऽपि सकलान्देवान्पूजयामास सादरम् ।
ततो रामाज्ञया चेन्द्रः सुधावृष्ट्या रणे मृतान् ॥७५॥
शीघ्रमुत्थापयामास सर्वान्वीरान्सवाहनैः । ततो रामो यमं प्राह यावद्राज्यं करोम्यहम् ॥७६॥

पावेंगे । वीर लोग संग्रामभूमिसे भागे हुए शत्रुकी भी रक्षा ही करते हैं ॥ ६१ ॥ इस प्रकार कितनी ही बातोंके सूर्यके प्रार्थना करनेपर लवने ब्रह्मास्त्रका संम्हरण कर लिया ॥ ६२ ॥ इसके अनन्तर लवको आगे करके यमराजके साथ-साथ सूर्य रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिए हर्षपूर्वक अयोध्या नगरीमें गये ॥ ६३ ॥ उस समय देवताओंने अपने बाजे बजाये, लवपर फूलोंकी वर्षा की और अप्सरायें नाचने लगीं ॥ ६४ ॥ पुरवासिनी स्त्रियें भी रास्तेमें कोठेपरसे फूल बरसाती हुई बार-बार लवको निहार रही थीं । ६५ ॥ उस समय विविध प्रकारके बाजे बजे, गणिकाय नाचने लगीं और मागध, गन्धर्व तथा किन्नरगण स्तुति करने लगे ॥ ६६ ॥ इस तरह अनेक उत्सवके साथ रास्तेमें आरती उतरवाता हुआ वह विजयी बालक लव रामके पास पहुंचा और प्रणाम किया ॥ ६७ ॥ रामने सूर्यभगवानका आगमन सुनकर उनकी अगवानी की, प्रणाम किया और हाथ पकड़कर सभाभवनमे ले गये ॥ ६८ ॥ इसके अनन्तर अपने पूर्वज सूर्यको रामने सिंहासनपर बिठलाया और षोडशोपचारसे उनकी पूजा की । ६९ ॥ फिर रामने सूर्यभगवान्से कहा—आप हमारे पूर्वज हैं। अतएव लवने जो कुछ अपराध किया हो, सो क्षमा कीजिये ॥ ७० ॥ रामकी ऐसी बात सुनकर सूर्यने भगवान्से कहा—हे रघूत्तम ! आपकी नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए थे और उनसे अत्रि आदि उत्पन्न हुए मरीचिसे कश्यप हुए और कश्यपसे मैं उत्पन्न हुआ हूं । अतएव मैं आपके पौत्रका पौत्र हूं ॥ ७१ ॥ ॥ ७२ ॥ हमारे पुत्र यमने जो अपराध किया हो, सो क्षमा करिये । इस प्रकार विनय करके सूर्यने रामको आसनपर बिठलाया और यमसे प्रणाम करवाया । इसके बाद समस्त देवतावृन्द वहां आ पहुंचे और उन्होंने रामचन्द्रजीकी वन्दना की ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ रामने भी सादर सब देवताओंकी पूजा की । इसके बाद रामकी आज्ञासे इन्द्रने संग्राममें मरे हुए लोगोंपर अमृतकी वर्षा की और वाहनसमेत समस्त वीरोंको उठा-

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