भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २


कदा कृत्वाऽत्र ते भेदं चोरमत्रानयति हि । स कालो ज्ञायते नैव तस्मान्निद्रा शुभा न हि ॥२२॥ स्वस्थचित्तास्त्यक्तनिद्रास्त्वस्यां पुर्यामहर्निशम् । यूयं भूत्वा सदा खड्गं शितां धार्यः स्वसन्निधौ ॥२३॥ कवचानि शरीरेषु सदा धार्याणि भो जनाः । धैर्यं धृत्वा न भेतव्यं यो जागर्ति निरन्तरम् ॥२४॥ अयोध्यायां न तस्यास्ति चोरादपि कदा भयम् नैतद्विस्मरणीयं हि मदाऽस्माकं वचः शुभम् ॥२५॥ सावधानाः सावधानाः सावधानाः सदा जनाः । भवतध्वं चात्र माकेतपुरि स्थेहि निरन्तरम् ॥२६॥ इत्युक्त्वा ते राजदूतः कृत्वा दुंदुभिनिःस्वनान् । वादयमासुर्वाद्यानि मङ्गलानि महान्ति च ॥२७॥ एवं सर्वत्र पुर्यां ते विचेरू रामसेवकाः । एवं निशायां नैर्दनैश्चास्र किंचिद्गतम् ॥२८॥ पौराश्च बोधिताः प्रापुर्ज्ञानं तस्य विचारतः । ततः प्रभाते ते सर्वं पौरा जानपदादयः ।२९॥ सभायां राघवं नत्वा तुष्टाः प्रोचुः पुरः स्थिताः राम राजीवपत्राक्ष त्वद्दूतवचनानि हि ॥३०॥ श्रूयन्तेऽद्य सदाऽस्माभिने विचारस्तदा कृतः । अद्यास्माभिर्निशायां हि त्वद्दूतवचनं शुभम् ॥३१॥ श्रुत्वा कृतो विचारो हि हृदि बुद्ध्या नराज्ञया । लब्धं ज्ञानं प्रभोऽस्माभिस्त्वज्ञानं नद्यत हि नः ॥३२॥ नैदानीमुपदेशं हि त्वत्तो वांछाम राघव । इति तेषां वचः श्रुत्वा तान्रामः प्राह सस्मितः ॥३३॥ कथं लब्धं हि तज्ज्ञानं किं भतं किं विचिन्तितम् तन्मेऽग्रे कथनीयं हि विस्तरेण यथाक्रमम् ॥३४॥ इति रामवचः श्रुत्वा जनाः प्रोचुर्मुदान्विताः । शृणु राम महाबाहो यन्लब्धं ज्ञानमुच्यते ॥३५॥ मोह एव निशा ज्ञेया निद्रा भ्रान्तिस्तु कथ्यते । नैय भ्रान्तिः समाचीनाऽनर्थो मृत्युर्भविष्यति । ३६॥ अयोध्येयं स्वीयदेहस्तत्र छिद्राणि वै नव । लघु मन्मस्तके ज्ञेयं दंताया द्वाररक्षकाः ॥३७॥ पक्ष्मौष्ठादीनि द्वारेषु कपाटानरितानि च । प्राणाश्च ते राजदूताः पुर्यां नित्यमटति हि ॥३८॥


न जाने कब ये तुम्हारा भेद लेकर उस चोरको यहां बुला लावे । उस समयको कोई जान नहीं सकता। इसलिए इस प्रकार सोना ठीक नहीं है ॥ २२ ॥ तुम सब निद्रा त्यागकर रात दिन इस पुरीमें जागते रहो और अपने पास एक तीक्ष्ण खड्ग रखो ॥ २३ ॥ शरीरपर कवच धारण करो, हृदयमे धैर्य रक्खो, किसीसे डरो नहीं । जो इस तरह जागता है ॥ २४ ॥ उस इस अयोध्यामे उस चोरसे कोई डर नहीं है। हमारे इस हितकर वचनोका कभी भूलना मत ॥ २५ ॥ हे अयोध्यावासियो ! फिर भी तुमसे कहता हूं सावधान । सावधान ॥ इस पुरीमे सदा सावधान होकर रहना ॥ २६ ॥ इतना कहकर वे दूत दुन्दुभी तथा अन्यान्य मङ्गलमय वाद्य बजाने लगे । २७ । इस रीतिसे दूत रातभर सारी अयोध्यामें घूम-घूमकर थोड़ी-थोड़ी देरमें तीन-तीन बार लोगोंको वही बात सुना-सुनाकर सजग करते रहे । २८ ॥ दूतोंकी बतायी बातांपर विचार कर-करके वे सब नगरनिवासो ज्ञानी हो गये । सब नागरिक और जनपदवासी सभामें रामके पास पहुंचे और प्रणाम करके कहने लगे हे राजीवपत्राक्ष राम ! वैसे तो हम नित्य आपके दूतोंकी बातें सुनते थे । किन्तु अभीतक उसपर विचार नहीं किया था । आज रात्रिमें उनकी बातें सुनकर हमने उनपर आपके आज्ञानुसार विचार भी किया है हे प्रभो ! अब हमारा अज्ञान नष्ट हो गया और ज्ञान प्राप्त हो गया है ॥ २९-३२॥ हे राघव । अब मैं आपसे उपदेश नहीं सुनना चाहता इस तरह उनकी बात सुनकर मुस्कराते हुए राम कहने लगे-॥ ३३ ॥ अच्छा हमें यह तो बताओ कि वह ज्ञान तुम्हे कैसे प्राप्त हुआ और तुम लोगोंने उसपर किस प्रकार विचार किया है सो विस्तारसे कह सुनाओ ॥ ३४ ॥ रामका प्रश्न सुनकर वे लोग प्रसन्नतासे कहने लगे हे राम ! जो ज्ञान प्राप्त हुआ है, सो हमलोग कहते हैं । सुनिय । ३५। मोह रात्रि है और भ्रान्ति निद्रा है। यह भ्रान्ति कभी अच्छी नहीं मानी जा सकती । इसके फेरमें पड़नेसे अनर्थ यह होगा कि एक न एक दिन मृत्यु घेर दवायगी ॥ ३६॥ अयोध्या अपना शरीर है। इसमें मुंह-कान आदि नौ द्वार हैं और दसवां द्वार मस्तकमें है । जिसे लोग ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और दांत आदि इन द्वारोंके रक्षक हैं ३७ ॥ आँखकी पलकें और ओंठ आदि इनके दरवाजे हैं। प्राण ही राजदूत है। जो सदा इस पुरीमें चक्कर लगाते