श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः २ ] मनोहरकाण्डम् ५५३
आत्मा ज्ञेयस्त्वत्र राजा जीवश्चेन्द्रियदेवताः । प्रजाश्च देहनगरे पौरास्तत्र नृशंसकः ॥३९॥
कालो ज्ञेयो महाबीरः त्रिदोषाद्या गदाश्च ये । कालस्य सेवका ज्ञेया नागरं इव संस्थिताः ॥४०॥
दुर्बलास्तेऽत्र जीवाद्यास्तेषामेवास्ति संशयम् । किं मोहे पतिता ज्ञात्वा कालप्रज्ञानयन्ति ते ॥४१॥
न ज्ञायते मृत्युकालस्तस्माद्भांति शुभाऽत्र न । ज्ञानमेव महाशस्त्रो वैराग्यं तीक्ष्णता भ्रमेः ॥४२॥
सच्छीलं कवचं भूयं धैर्यं भक्तिर्दृढा मयि । आत्मज्ञानेन जागर्ति न तस्यास्ति भयं कदा ॥४३॥
सावधानं शास्त्रनिष्ठं भक्तिनयं सताऽत्र हि । वाद्यानि रचनान्येव माधवं बोधदानि वै ॥४४॥
सदा धृतानि हृदये तानि बुद्ध्याऽवलोकयेत् । मोहक्षयः प्रभावोऽप्यमिदानीं त्वन्पुरः स्थितः ॥४५॥
त्वमेवात्मा ममेयं ते नित्यामस्थानरीरितम् । तवाग्रे ये स्थिताः सर्वे वयं त्वां मुक्तिमागताः ॥४६॥
किमिदानीं ने द्रष्टव्य वोपदेश्यं त्वयाऽथ किम् । तव कीर्तनमात्रेण नग मुक्ति लभंति हि ॥४७॥
वयं त्वदन्तिकाः सर्वे मुक्ता एव न संशयः । इति तेषां वचः श्रुत्वा सस्मितः प्राह राघवः ॥४८॥
सम्यग्बुद्ध्या परिज्ञातं सुखे ध्येयं सदा जनाः ।
नान्यथा स्वमतिः कार्याऽऽत्मनो राम पृथक् स्थितम् ॥४९॥
इत्युक्त्वा सकलानामो ययौ सीतागृहं मुदा । पौराया गतमओहास्ते चात्मवान् मेनिरे परम् ॥५०॥
एवं राधेष भोः शिष्य दूतवाक्यं सुबोधिताः । पौराः सर्वे यथा तच्च मया ते विनिवेदितम् ॥५१॥
एकदा कैकयी राममागत्य प्रणिपत्य सा । अब्रवीन्मधुरं वाक्यं विनयात्पुरतः स्थिता ॥५२॥
राम राजीवपत्राक्ष मया यदपराशितम् । पुराऽज्ञानावशात्तच्च सव्वं सन्तव्यं वै कृपालुना ॥५३॥
अहं ते शरणं प्राप्ता मामुद्धर जगत्पते । किञ्चिदुपदिशस्व त्वं येनाज्ञानं विनश्यति ॥५४॥
रहते हैं ॥ ३८ ॥ इनमें आत्मा राजा है और जीव तथा इन्द्रियां इस नगरके निवासी हैं ॥ ३९ ॥ काल महान् वीर है और वात पित्त कफ आदि उसके सेवक पूरे देशमें नागरिकोंकी तरह रहते हैं ॥ ४० ॥ इस नगरमें जीव आदि नागरिक दुर्बल हैं। अतएव उन्हींको चोरका विशेष भय रहता है। यदि वे नागरिक मोहग्रस्त होकर भ्रममें पड़ जायं तो अवसर पाकर वे चोरके सेवक अवश्य अपने स्वामी कालका तृण लावेंगे ॥ ४१ ॥ मृत्युका समय किसीको मालूम नहीं है। इस कारण गाफिल रहना ठीक नहीं है। इसके लिए ज्ञान शस्त्र है और वैराग्यको उसकी तीखी धार समझनी चाहिए ॥ ४२ ॥ सदाचार कवच है और अपने दृढ़ भक्तिका होना ही धैर्य है। जो मनुष्य आत्मज्ञानपूर्वक नित्य जागता रहता है उसे कभी किसी प्रकारका भय नहीं रहता ॥ ४३ ॥ सदा सब लोगोंको शास्त्रनिष्ठ होना चाहिए, यही सावधान रहनेका मतलब है। साधुजन आनन्ददायक बाजाके समान उन दूतोंके बाजे हैं ॥ ४४ ॥ सब लोगोंको चाहिए कि इन बातोंको हृदयमें रक्खें और अपनी बुद्धिमें इन्हें देखें। इस प्रकार हे राम ! आज हमारे मोहनाशका प्रभाव आपके सामने उपस्थित है ॥ ४५ ॥ आप ही आत्मा हैं और यह सभा आपका निवासस्थान है। आपके सामने हम जितने लोग उपस्थित हैं, सब मुक्त हो गये हैं ॥ ४६ ॥ और आपसे क्या पूछना है और क्या हमारे लिए आपको उपदेश देना है ? हमारा तो यह विश्वास है कि आपके नामके स्मरणमात्रसे प्राणी मुक्त हो जाते हैं ॥ ४७ ॥ आपके समीप पहुंचे हुए हम सब लोग मुक्त हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। इस तरह उनका बात सुनकर मुसकाते हुए राम बोले— ॥ ४८ ॥ तुम लोगोंने अपनी बुद्धिसे सब कुछ समझ लिया है। सब सानन्दपूर्वक रहो। कभी अपनी बुद्धिमें यह बात न आने देना कि राम मुझसे अलग हैं ॥ ४९ ॥ ऐसा कहकर राम प्रसन्नतापूर्वक सीताके महलमें चले गये । जितने पुरवासियोंका किसी प्रकारका अज्ञान था, अब वह सब नष्ट हो गया और वे आत्मज्ञानी बन गये ॥ ५० ॥ हे शिष्य ! जिस तरह रामके दूतोंसे उनका मति जागृत हुई, वह सारा कथ मैंने कह सुनायी । ५१ । एक समय कैकेयी रामके पास गयी और प्रणाम करके मीठी-मीठी बातोंमें कहने लगी—॥ ५२ ॥ हे कमलपत्रके समान नेत्रोंवाले राम ! मैंने उस समय अज्ञानवश जो अपराध किया था, उसे क्षमा कर दो। क्योंकि तुम कृपालु हो ॥ ५३ ॥ मैं जगत्पते ! हे तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। मेरा उद्धार करो और मुझे कोई ऐसा उपदेश