श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 580, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५६३ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
तन्मथ्या वचनं श्रुत्वा रामो राजीवनोचनः। उवाच कैकयीं वाक्यं मधुरं प्रहसन्निव ॥५५॥
न त्वया मेऽपराधो हि मच्छन्दात्तच्च सम्भवौ । स्थित्वा गवाक्ष्ये मा प्राह वरय स्वेदि यत्पुरा ॥५६॥
त्वं च कैकेयि शुद्धोऽसि मयि क्रोधो न मेऽस्ति ते । धन्यां नीत्वोपदेशं हि कारयिष्यति लक्ष्मणः ॥५७॥
इत्युक्त्वा तां विसर्जनार्थं लक्ष्मणं गयचोऽब्रवीत् । शिविकास्था हि कैकेयी यः प्रयाते निशामम ॥५८॥
त्वया नेया वहिः पुर्याः सरय्वाश्च तटं प्रति । अविप्रमूहसंस्थानं वर्तते यत्र तत्र हि ॥५९॥
अविबृन्दान्तिकं नीत्वा कैकेयीं शिविकास्थिताम् । प्रविवाक्यं नि श्राव्याणि मुहुर्ते मम वाक्यतः । ६०,
आनेयव्या ततश्चैव कैकेयी मम मन्निधौ । इति तद्ब्राह्मवचनं श्रुत्वा स लक्ष्मणोऽपि च ॥६१॥
तथेत्युक्त्वा तदा रामं तूर्णां तस्थौ तदग्रतः । अथ प्रभाते सौमित्रिर्गत्वा भरतमन्दिरे । ६२ ।
शिविकायां स कैकेयीं समारुह्य सुसञ्चिताम् । दासीभिः सेवकैश्चैव वेष्टितां वेत्रपाणिभिः । ६३।
तां निनाय बहिः पुर्याः सरय्वाश्च तटे वरे । अविपुर्धानीकं यानं स्थापयामास लक्ष्मणः । ६४ ।
मुम्नातां कैकयीं विप्रास्ते ज्ञात्वा दक्षिणेच्छया । दद्रुवुः शिविकारूपुष्ठे लक्ष्मणस्तानन्यवारयत् । ६५।
अतिमात्रार्थं पञ्चाद्या ये ते ज्ञेया द्विजातयः । दानाहः पण्डिता नते श्रोत्रिया न प्रतिष्ठिता । ६६॥
ततो दूतान्निर कृत्य मुक्ताजालानि लक्ष्मणः । ऊर्ध्वं कृत्वा स्वहस्ताभ्यां कैकेयीं वाक्यमब्रवीत् ६७।
पश्य कैकेयि मातस्त्वमविथूयं पुरःस्थितम् । रामेण प्रेषितोऽस्मि त्वामुपदेशामम ददातु ६८॥
तन्मात्रैर्वचः श्रुत्वाऽऽश्चर्ययुक्ताऽथ कैकयी । प्रतारितोऽहं रामेण किमत्र प्रेष्य मादरम् ॥६९॥
इति तर्कान्कुर्व्वन्ती सा तस्थौ तूष्णीं भृशं तदा । तावच्छुश्राव सा मे मे स्वविश्राव्याणि वै मुहुः ७० ।
तानि श्रुत्वाऽथ कैकेयी तदा चिन्तेऽविगाहतत् । मे मे त्विति मुहुश्चात्र किमर्थं वचनानि हि । ७१॥
अव्यक्तः सर्व्व एवायमत्र गूढार्थस्त्वत्र वर्तते । ततो निभाल्य कैकय्या नेत्रं ध्यात्वा क्षण हृदे । ७२.
दो, जिससे मेरा अज्ञान नष्ट हो जाय ॥५४॥ इस प्रकार कैकेयीकी बात सुनकर मंद २ हंसते हुए राम कहने लगे -, ५५ । हे माता ! तुमने हमारा कोई अपराध नहीं किया है । उस समय हमारी ही इच्छानुसारसंतान तुम्हारा दुराव बैठकर यह वर माँगाथा ॥ ५६ । हे कैकयी ! तुम शुद्ध हो, तुम्हारे ऊपर मेरे हृदयमें कुछ भी रोष नहीं है । कल लक्ष्मण तुम्हारे यहाँ से आकर उपदेश दिला देंगे ॥ ५७ ॥ ऐसा कहकर उसे विदा कर दिया और लक्ष्मणसे कहा कि हमारे कथनानुसार कल कैकेयीको नगरके बाहर सरयूतटपर जहाँ कि भेड़ें रहती हैं, वहाँ ले जाओऔर उन भेड़ेंके मुखसे ही पश्चात् उपदेशमय वाक्य सुनवाकर कैकेयीको यहाँ पर पास ले आओ। इस प्रकार रामका भाता सुनकर लक्ष्मणने वैसा करना स्वीकार कर लिया और चुपचाप रामके सम्मुख बैठ रहे। इसके अनन्तर सबेरे लक्ष्मण जी भरतके भवनमें पहुँचे ॥ ५८ ६२ । वहाँसे कैकेयीको पालकीमें बिठाकर दास-दासी तथा छत्र पर आदिके साथ उस अजाशालाके बाहर सरयूतटपर जहाँ कि भेड़ें रहती थीं, ले गये । वहाँ पहुंचकर उन्होंने रथ रोक दिया ॥ ६३ ।। ६४ । जबकि पुरवासीलोग लक्ष्मण पालकी के साथ जा रहे थे, तब अनेक ब्राह्मणोंने समझा कि कैकेयी स्नान करके लौट रही हैं। और दक्षिणा-सुवर्ण, वस्त्र हेताण दक्षिणा लेनेके लिये दौड़े वहे। लक्ष्मणने उन्हें रोका। क्योंकि वे सब ब्राह्मण लोभामूर्वे, पशु और अन्ध आदि थे। उनमेंसे कोई भी ब्राह्मण ऐसा न था, जो प्रतिष्ठित श्रोत्रिय रहा हो । ६५-६६। जब लक्ष्मणके मना करनेपर भी उन लोगोंने पीछा नहीं छोड़ा तब विवश होकर उन्होंने दोनों दूतों उन्हें हटाया और मोतियोंके लटकने वाले पर्देको अपने हाथसे उठाकर कैकेयीसे कहा-॥ ६७ । हे माँ कैकेयी ! सामने भेड़ोंका झुण्डकी ओर देखो। रामचन्द्रजी आदरपूर्वक तुम्हें इनसे उपदेश लेनेके लिये भेजा है ॥ ६८ ॥ लक्ष्मणकी बात सुनकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वह अपने मनमें सोचने लगी 'रामन यहाँ भेज कर मुझे धोखा तो नहीं दिया है।" इस प्रकार तरह-तरहके तर्क वितर्क करती हुई कैकेयी क्षणभर चुपचाप बैठी रही । तभी उसने कई बार भेड़ोंके मुखसे 'मे मे' की ध्वनि सुनी ॥६९ । ७० ॥ सो सुनकर कैकेयीने अपने मनमें सोचा कि भेड़ बार-बार 'मे मे' क्यों करती है। इसमें कोई न कोई गूढ़ भाव छुपा हुआ