श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ४ |
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द्वादशाक्षरविद्यायां जपनिष्ठोऽनिशंक्रियः। कदाचित्कार्तिके मासि हरिजागरणाय सः ॥ १२१॥ रात्र्यां तुर्यावशेषायां जगाम हरिमन्दिरम् । हरिपूजोपकरणान् प्रगृह्य व्रजता तदा ॥ १२२॥ तेन दृष्टा समायाता राक्षसी भीमनिःस्वना। वक्रदंष्ट्रा ललज्जिह्वा विनग्ना रक्तलोचना ॥ १२३॥ दिगंबरा शुष्कमांसा लंबोष्ठी घर्घरस्वना । तां दृष्ट्वा भयसंत्रस्तः कंपितावयवस्तदा ॥ १२४॥ पूजोपकरणं सर्वः पयोमिश्राह्नदलात् । संस्मृत्य यद्धरेर्नाम तुलसीयुक्तवारिणा ॥१२५॥ मोहमद्वाग्णि तस्मात्तत्पापं लयमागतम् । अथ संस्मृत्य सा पूर्वजन्मकर्मविपाकजम् ॥ १२६॥ स्वां दशामब्रवीत्तीव्रं दंडवच्च प्रणम्य सा ।
कलहोवाच
पूर्वकर्मविपाकेन दशामेतां गताऽस्म्यहम् ॥१२७॥
मन्कथं तु पुनर्विप्र याम्यहं गतिमुत्तमाम् ।
मुद्गल उवाच
तां दृष्ट्वा प्रणतामार्ता वदमानां स्वकर्म सा ॥१२८॥
अतीव विस्मितो विप्रस्तदा वचनमब्रवीत् ।
धर्मदत्त उवाच
केन कर्मविपाकेन त्वं दशामीदृशीं गता ॥ १२९॥
कुतः प्राप्ता च किंशीला तत्सर्वं विस्तराद्वद ।
कलहोवाच
सौराष्ट्रनगरे ब्रह्मन् भिक्षुनामाऽभवद्द्विजः ॥१३०॥
तस्याहं गृहिणी भद्रात् कलहाख्याऽतिनिष्ठुरा । न कदाचिन्मया भर्तुर्वचसाऽपि शुभं कृतम् ॥ १३१॥
नार्पितं तस्य मिष्टान्नं भर्तुर्वचनभंगया । पाककाले यथा नित्यं यद्यच्चान्नं मनोरमम् ॥ १३२॥
तत्तत्पूर्वं स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्भर्त्रे निवेदितम् । एकदा स पतिर्मित्रं मम वृत्तं न्यवेदयत् ॥ १३३॥
नैव शृणोति मे पत्नी मद्वाक्यं किं करोम्यहम् । तेन श्रुत्वा तु सकलं शृण संचित्य वै हृदि ॥१३४॥
उवाच मन्पतिं किंचिद्युक्तिं नां ते रटाम्यहम् । निषेधोक्त्या यद्वस्त्वं गृहिणी सा करिष्यति ॥ १३५॥
रहता था वह विष्णुके व्रतोंको करनेवाला, भली भाँति विष्णुपूजामें रत, सदा बारह अक्षरके मन्त्र ( ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ) के जपमे निष्ठा रखनेवाला तथा अभ्यागतोंका प्रेमी था । एक बार वह कार्तिक-में रात्रिजागरण करके चौथे प्रहर पूजाकी सामग्री लेकर हरिमन्दिरमें जा रहा था कि रास्तेमें सहसा उसने एक भयानक थरथर शब्द करती हुई, टेढे दाँतोवाली, जीभको हिलाती, नितान्त नग्न लाल नेत्रोंवाली, जिसके शरीरका सर्व माँस सूख गया था— ऐसी लम्बे होठों और नग्न शरीरवाली एक राक्षसीको आते देखा । उसको देखकर ब्राह्मण भयसे काँप उठा । तब वह समस्त पूजाकी सामग्री तथा जल आदि फेंक-फेंककर उसको मारने लगा । वह नारायणका नाम लेता हुआ उसके ऊपर तुलसीपत्र तथा जल फेंकता जाता था । बस, इसीसे अनायास उस राक्षसीके सब पाप घुल गये और उसको पूर्वजन्मके कर्मोंका स्मरण हो आया ॥ ११८-१२६ ॥
तब वह ब्राह्मणको दंडवत् प्रणाम करके कहने लगी । कलहा बोली— हे विप्र ! मैं पूर्वजन्मके कर्मोंके फलस्वरूप इस दशाको प्राप्त हुई हूँ । हे ब्रह्मन् ! सौराष्ट्रनगरमें भिक्षुनामका एक ब्राह्मण रहता था । मैं उसकी कलहा नामकी बड़ी निष्ठुर स्त्री थी । मैने कभी वचनसे भी पतिकी भलाई नहीं की ॥ १२७-१३१ ॥ रसोईमें कभी मैं मिष्टान्न बनाती तो पतिसे झूठा बहाना करके तथा उसकी बात टालकर मिठाई नहीं देती थी। भोजनके समय प्रतिदिन जो जो अच्छी चीज बनाती पहिले उसको मैं खा लेती थी तब पतिको देती थी। एक दिन मेरे पतिने जाकर अपने एक मित्रसे कहा कि मेरी स्त्री मेरी बात नहीं मानती । मैं क्या करूँ ? उसके