भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

[ अ० ४ ] उत्तरखण्डम् ४१

तद्वाक्येन कृतार्थोऽहं यन्मुनिश्रेष्ठ दर्शितम् । तथैव मित्रवाक्येन गृहमेत्य पतिर्मम ॥१३६॥
मामाह ह्यटने प्राप्ते भोजनार्थं समाह्वय । मम मित्रं महद् रूपं तच्छ्रुत्वा स्वपतेर्वचः ॥१३७॥
तदा मन्दधियोक्तः स मित्रं ते साधुसम्मतम् । ममाह्वयाम्यद्यभोज्यार्थमथैनं ब्राह्मणोत्तमम् ॥१३८॥
ततो मया समाहूतः स्वयं गत्वा पतेः सखा । उत्सृज्य निषेधोक्त्या कार्यमप्याययन्मतिः ॥१३९॥
एकदा स पितुःश्राद्धा ह्ययाहू. स्वपतिर्मम । मामाह दयिते श्राद्धं न करिष्याम्यहं पितुः ॥१४०॥
तद्वाक्यं स्वपतेः श्रुत्वा मया विप्रा निमन्त्रिनाः श्या धिक् धिक् कृतो मर्ता कथं श्राद्धं करोषि न १४१॥
दोषमं न जानामि का गतिस्ते भविष्यति ततः पुनः स मामाह पक्वान्नश्च मा कुरु ।१४२॥
एवं निमंत्रयस्वैकं मा विस्तारं कुरु प्रिये । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मयाऽष्टादश भूसुराः ॥१४३॥
निमन्त्रितास्तु श्राद्धार्थं पक्वान्नानि कृतानि हि ततः पुनः स मामाह प्रिये शृणु वचो मम ॥१४४॥
अद्य माहार्हता मिष्टं पाक् भुक्त्वा ततः परम् । स्त्रीपोच्छिष्ट स्वयं विप्रान् परिवेषणमाचर ॥१४५॥
तन्मया कथितं श्रुत्वा स पतितिष्कृतः पुनः कथमादौ स्वयं भुक्त्वा पश्चाद्विप्रान्समर्पयेत् ॥१४६॥
एवमेवं निषेधोक्त्या श्राद्धं सांगं चकार सः । पिण्डदानादिकं कृत्वा मामाह स पतिः पुनः ॥१४७॥
अहभोराषण व्यथ करिष्यामि न संशयः । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा मिष्टान्नेन स भोजिनः ॥१४८॥
नतो दैववशाद्भूत्वा विस्मृत्य प्राह मां पुनः । नान्दी पिण्डान् क्षिपेदाप प्रशौचे परमादरात् ॥१४९॥
ततो मया शौचकूपे नीत्वा पिण्डा विसर्जिताः । ततः खिन्नमना विप्रो हाहेत्युक्त्वा स्थितोऽभवत् १५०
उत्तोलितेत्य मामाह पिण्डान्मा त्वं बहिः कुरु । उत्तोलार्य शौचकूपे मया पेडा बहिः कृताः ॥१५१॥
मनः पुनः स मामाह पिण्डान्तीर्थे क्षिपस्व मा । तदा तीर्थे मया क्षिप्तास्ते पिण्डाः परमादरात् ॥१५२॥

वचन यह सुनकर उसने विचार किया ॥ १३०--१३४ ॥ तदनन्तर उसके घर पतिरस का कुछ कहा था,
** मैं कहता हूँ । उधर कहा हे मित्र ! तुम अपना स्वास उल्टा बात कहा करो, तब वह तुम्हार मना किये
** कामक अवश्य करेगी और तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा । मित्रका बात सुन तथा 'बहुत अच्छा कह कर
मेरा पति घरपर आया ॥ १३५ ॥ १३६ । वह मुझसे कहन लगा-हे प्रिये ! इस मित्रको तुम कभी भोजनके लिये
न बुलाना ॥१३७॥ यह बड़ा दुष्ट है । पतिके इस वचनको सुनकर मैने कहा कि तुम्हारा मित्र ब्राह्मणों श्रेष्ठ
तथा बड़ा सज्जन है। उसको मैं आज हीभोजनके लिये बुलाता हूँ ॥ १३७॥ १३८ ॥ तब मैं स्वयं जाकर पतिके
मित्रको बुला लायी । इसप्रकार मेरा पति विपरीत कहनेपर ही काम बन आया ॥ १३६ ॥ एक दिन मेरा पति अपने
पिताकी श्रद्धतिथि जानकर कहने लगा हे दयित ! मै आज अपने पिताका श्राद्ध नहीं करूँगा ॥ १४० ॥
यह सुनकर मैंने उसके कहनेके प्रतिकूल इष्टपुट ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे दिया और पतिसे कहा कि तुमको धिक्कार
है जो अपने पिताका श्राद्ध भी नहीं करते ॥ १४१॥ तुम पुण्य पापको नही जानते । इसलिय न जाने तुम्हारी
क्या गति होगी । तब उसने कहा कि यदि करना ही है तो केवल एक ब्राह्मणको निमन्त्रण देना अधिक
झगड़ा नही बढ़ाना । पकवान-मिठाई आदिमे व्यर्थ खर्च नहीं करना । यह सुनकर मैने एक साथ अठारह ब्राह्म-
णोंको निमन्त्रण दे दिया । श्राद्धके लिये अनेक प्रकारके पक्वान बनाये । फिर पतिने मुझसे कहा कि आज तुम
अपने कर साथ मिष्टान्न भोजन करके बादमे अपना जूठा भोजन ब्राह्मणोको परोसना ॥ १४२-१४५ ॥ यह सुन-
कर मैने पतिको धिक्कारा और कहा कि तुमको धिक्कार है। पहिले स्वयं खाकर पश्चात् ब्राह्मणोंका भोजन करानेके
योग्य कहते हो ? ॥ १४६ ॥ इस प्रकार विपरीत कथनसे पतिने मेर द्वारा विधिवत् श्राद्ध करवाया, पिण्डदान
आदि करके फिर उन्होंने मुझसे कहा-॥ १४७ ॥ मैं आज कुछ भी न खाकर उपवास करूँगा । यह सुनकर
मैंने उन्हे खूब मिष्ठान्न खिलाया ॥ १४८ ॥ बादमे दैववशात् भूलकर पतिने मुझसे कहा कि इन पिण्डोको
तुम अत्यंत प्रेमसे किसी पवित्र तीर्थके अन्दर फेंक आओ ॥ १४९ ॥ यह सुनकर मैने उन पिण्डोको ले जाकर पाखाने-
में डाल दिया । यह देखा तो वह विप्र हाय-हाय करने लगा ॥ १५० ॥ अनन्तर सोचकर मुझसे कहा कि
हाहा, पाखानेसे पिडोंको बाहर न निकालना । तब शौचकूपमे उतरकर मैने उन पिडांका निकाल लिया