भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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४५ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

एवं मया कदा भर्तुर्वचनं न कृतं तदा । कलहप्रियया नित्यं मय्युद्विग्नमना यदा ॥१५३॥ परिणेतुं ततोऽन्यां वै मनश्चक्रे पतिर्मम । ततो विषं समादाय प्राणस्त्यक्तो मया द्विज ॥१५४॥ अथ बद्ध्वा वध्यमानां मां निन्युर्यमकिंकराः । यमश्च मां तदा दृष्ट्वा चित्रगुप्तमपृच्छत ॥१५५॥

यम उवाच अनया किं कृतं कर्म फलं शुभमथाशुभम् । प्राप्नोत्येषा च तत्कर्म चित्रगुप्तावलोकय ॥१५६॥

कलहोवाच चित्रगुप्तस्तदा वाक्यं मन्दंस्मयंस्तमुवाच ह ।

चित्रगुप्त उवाच अनया तु शुभं कर्म कृतं किंचिन्न विद्यते ॥१५७॥ मिष्टान्नं भुज्यमानेयं न भर्त्रे तदर्पितम् । अथ बगुलीयोन्यां स्वनिष्ठायाञ्च तिष्ठतु ॥१५८॥ पतिं दृष्ट्वा सदा रुष्टा नित्यं कलहकारिणी । विष्ठाश शूकरीयोन्यां तस्मात्तिष्ठत्वियं यम ॥१५९॥ पाकभांडे सदा भुंक्ते गुप्तं चैका यतस्ततः । तस्माद्दोषाद्बिलाडाङ्गेष्ववजातान्यभक्षिणी ॥१६०॥ भर्त्तारमपि चोद्दिश्य ह्यात्मघातः कृतोऽनया । तस्मात्प्रेतशरीरेऽपि तिष्ठत्वेकाऽविनिंदिता ॥१६१॥ अतश्चैषा मरुद्देशे प्रापितव्या ह्यमेश्चरैः । तत्र प्रेतशरीरस्था चिरं तिष्ठत्वियं ततः ॥१६२॥ ऊर्ध्वं योनित्रयं चैषा भुङ्क्त्वशुभकारिणी ।

कलहोवाच ततो दूतैः प्रापिताऽहं मरुद्देशे क्षणाद्द्विज ॥१६३॥ दत्त्वा प्रेतशरीरं मां गतास्ते स्वस्थलं प्रति । साऽहं पंचदशाब्दानि प्रेतदेहे स्थिता किल ॥१६४॥ क्षुत्तृड्भ्यां पीडिताऽत्यर्थं दुःखिता स्वेन कर्मणा । ततः क्षुत्पीडिता नित्यं शरीरं वणिजस्त्वहम् ॥१६५॥ प्रविश्य दक्षिणे प्राप्ता कृष्णावेण्यास्तु संगमे । तत्राऽहं मन्निता यात्रास्वावलस्य शरीरतः ॥१६६॥ उग्रविष्णुगणैर्दूरमपाकृष्टा बलादहम् । ततः क्षुत्क्षामया दृष्टो भ्रमन्त्या त्वं मया द्विज ॥१६७॥


॥ १५३ ॥ फिर पतित कहा—देखा, कहीं इनको किसा ताड़न न डालना । तब प्रेत ने जाकर उस पिंडोका बड़े आदरपूर्वक सायंकाल डाल दिया ॥ १५४ ॥ इस तरह मुझ कलहप्रियाने जब कभी भी पतिका सीधा तौरपर कहा हुआ काम नहीं किया, तब दुःखित होकर उसने अपना दूसरा ब्याह करना निश्चित किया । हे द्विज ! तब मैने जहर खाकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ तब यमदूत मुझे बाँधकर यमराजके पास लेगये । यमराज मुझे देखकर चित्रगुप्तसे कहने लगे ॥ १५५ ॥ यमराजने कहा—चित्रगुप्त देखो, इसने अच्छा कर्म किया है या बुरा, जिससे इसको वैसा ही फल दिया जाय ॥ १५६ ॥ कलहा कहन लगा—यह सुनकर चित्रगुप्त मुसकमुकात हुए कहने लगे कि इसने तो कोई अच्छा कर्म कभी किया नहीं। यह मिष्टान्न बनाकर खाती थी परन्तु अपने पतिको नहीं देती थी। इसलिये यह बगुलीकी योनिम जाकर अपना ही विष्ठा खानकाश्ये वणिंगा बने प्रतिदिन झगड़ा एव पातक द्वेष करनेके कारण यह विष्ठा भक्षण करनेवाली शूकरयोनिम पैदा हो। हे यम इधर-उधर छिपकर भोजन बनानेके पात्रमे अकेला ही खान्वाली यह बिल्ली बन ॥१५७ १६०॥ पातक उद्देश्य इसने आत्मघात किया है। इस कारण यह अविनिन्दित प्रेतयोनिमे अकेली रहे ॥ १६१ ॥ हे यम ! इसम दूतोंके द्वारा मरुद्देशमे भेज देना चाहिये, वहाँ जा नया प्रेत बनकर यह बहुत काल पर्य्यन्त निवास कर ॥ १६२ यह पापिनी उपर्युक्त सभी योनियोंको भोगे। कलहा बोली-हे द्विज ! तब यमदूतोन क्षण ही भरम मुझे मरुद्देश पहुंचा दिया ॥ १६३॥ यहाँ प्रेतयोनिमें डालकर वे अपने स्थानको चले गय। मै पन्द्रह वर्ष तक प्रेतयोनि रही ॥ १६४ ॥ अपने किये हुये कमोके अनुसार मै सदा भूख-प्याससे अत्यन्त दुःखिनी रहने लगी। इस प्रका नित्य भूखस पीडित हो एक बनियके देहम पैठकर मै दाक्षणम कृष्णा-वेणाक संगमपर आयी। वहाँ आत्म प्रिय तथा विष्णके गणान मुझे बरबस उस वणिक्के शरीरसे अलग करके दूर भगा दिया। तदनन्तर हे द्विज