श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५] | सारकाण्डम् | ४५
त्वद्धस्ततुलसीवारिसंस्पर्शाद्गतपातका । तत्कृपां कुरु विप्रेन्द्र कथं मुक्ता भवाम्यहम् ॥१६८॥ योनित्रयादग्रभावादस्माच्च प्रेतभावतः । मामुद्धर मुनिश्रेष्ठ त्वामहं शरणं गता १६९॥ इत्थं निशम्य कलहावचनं द्विजश्च तत्पापकर्ममयविस्मयदुःखयुक्तः । तद्ग्लानिदर्शनकृपाचलचित्तवृत्तिश्चिन्त्या चिरं सुवचनं निजगाद दुःखात् ॥१७०॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे वृन्दाशापकलहाख्यानं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( धर्मदत्त द्वारा कलहाका उद्धार )
धर्मदत्त उवाच विलयं यांति पापानि तीर्थदानव्रतादिभिः । प्रेतदेहे स्थितायास्ते तेषु नैवाधिकारिता ॥१॥ त्वद्ग्लानिदर्शनादस्मात् खिन्नं च मम मानसम् । नैव निर्वृतिमायाति त्वामनुद्धृत्य दुःखिताम् ॥२॥ पातकं च त्ववान्त्युग्रं योनित्रयविपाकजम् । नैवान्यैः क्षीयते पुण्यैः प्रेतत्वं चातिगर्हितम् ॥३॥ तस्मादाजन्मजनितं यन्मया कार्त्तिकव्रतम् । तत्पुण्यस्यार्धभागेन सद्गतिस्त्वमवाप्नुहि ॥४॥ कार्त्तिकव्रतपुण्येन न साम्यं याति सर्वथा । यज्ञदानानि तीर्थानि व्रतान्यपि ततो ध्रुवम् ॥५॥
मुद्गल उवाच इत्युक्त्वा धर्मदत्तोऽसौ पावनामभ्यषेचयत् । तुलसीमिश्रतोयेन श्रावयन् द्वादशाक्षरम् ॥ ६ । तावत्प्रेतत्वनिर्मुक्ता ज्वलदग्निशिखापमा । दिव्यरूपधरा जाता लावण्येन यथोर्वशी ॥७.। ततः सा दंडवद्भूमौ प्रपनाम यदा द्विजम् । उवाच सा तदा वाक्यं हृष्टगद्गदभाषिणी ॥८॥
कलहोवाच त्वत्प्रसादाद्द्विजश्रेष्ठ विमुक्ता निरयादहम् । पापाब्धौ मज्जमानायास्त्वं नौभूतोऽसि मे ध्रुवम् ॥९॥
भूखों मरती एवं भ्रमण करतो हुई मैंने यहाँ तुमको देखा । १६५-१६७॥ यहाँ तुम्हारे हाथका जल तथा तुलसीसे मेरे सब पाप दूर हो गये हैं। इस कारण हे विप्रेन्द्र ! अब ऐसी कृपा करो कि जिससे भावी तीन योनियोंसे मेरी मुक्ति हो जाय। हे मुनिश्रेष्ठ मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ। तुम मेरा इस प्रेतयोनिसे भी उद्धार करो। ब्राह्मणने कलहाके वृत्तान्तको सुना तो उसके पापकर्मस भय विस्मय तथा दुःखसे इस और उसकी इस ग्लानिपूर्ण दशाको देखकर कृपासे चञ्चलचित्त हो और बहुत देरतक सोचकर दुःखस इस प्रकार सुन्दर वचन कहना आरम्भ किया ॥ १६८-१७०। इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकायां सारकाण्डे वृन्दाशापकलहाख्यानं नाम चतुर्थ सर्गः ॥ ४ ॥
धर्मदत्त बोले—तीर्थ, दान तथा व्रतके द्वारा पाप क्षीण होते हैं, परन्तु प्रेतशरीरमें रहनेसे तुम्हारा उनपर अधिकार नहीं है ॥ १ ॥ तुम्हारी इस दुर्दशाको देखकर मेरा मन बहुत दुःखी हो रहा है। जबतक तुम्हारा इस दुःखसे उद्धार न होगा, तबतक मुझको शान्ति नहीं मिलेगी । २ ॥ यह नीच प्रेतत्व और तीन योनियोंको भोगानेवाला तुम्हारा महान् पाप साधारण पुण्योंसे क्षीण न होगा । ३ ॥ इस कारण जन्मसे लेकर अबतक किये हुए अपने कार्त्तिकव्रतके पुण्यका आधा भाग मैं तुमको देता हूँ। उससे तुम सद्गतिको प्राप्त होओगी ॥ ४ ॥ कार्त्तिकव्रतके पुण्यके समान यज्ञ-दान-तीर्थ आदि कोई भी नहीं हो सकता' यह बात निश्चित है ॥ ५ ॥ मुनि मुद्गल कहने लगे—हे राजन् ! इतना कहकर धर्मदत्तने ज्यों ही उसके ऊपर तुलसीदल तथा जल छिड़ककर द्वादश अक्षरोंका मंत्र सुनाया। त्यों ही प्रेतयोनिसे मुक्त होकर वह जलती हुई अग्निकी लपटके समान दिव्य रूप धारण करके उर्वशीके सदृश सुन्दर स्त्री बन गयी ॥ ६ । ७ ॥ तब वह ब्राह्मणके चरणोंको दण्डवत् प्रणाम करके सहर्ष गद्गद वाणीसे कहने लगी ॥ ८ ॥ कलहा बोली—हे द्विजोमें श्रेष्ठ द्विज ! आपकी कृपासे मैं नरकमें जानेसे बच गयी। पापसमुद्रमें डूबती हुई मुझ पापिनीको बचाकर आपने