भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 593

सर्गः ३ ] मनोहरकाण्डम् ५७७

नमो नमस्ते मखपालनाय नमोऽस्तु यज्ञप्रतिपालनाय । अनन्त यज्ञेश हरे मुकुंद गोविंद विष्णो भगवन्मुरारे ॥११४॥ श्रीवल्लभानन्त जगन्निवास श्रीराम राजेंद्र नमो नमस्ते । श्रीजानकीकांत विशालनेत्र राजाधिराज त्वयि मेऽस्तु भक्तिः ॥११५। तप्तजाम्बूनदेनैव निर्मितं रत्नभूषितम् । स्वर्णपुष्पं रघूश्रेष्ठ दास्यामि स्वीकुरु प्रभो ॥११६॥ हृत्पद्मकर्णिकामध्ये सीतया सह राघव । निवसाम्ब रघूश्रेष्ठ सर्वैरावरणैः सह ॥११७॥ मनोवाक्कायजनितं कर्म यद्वा शुभाशुभम् । तन्ममं प्रीतये भूयान्नमो रामाय शार्ङ्गिणे ॥११८॥ अपराधसहस्राणि क्रियंतेऽहर्निशं मया । दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व रघुपूंगव ॥११९॥ नमस्ते जानकीनाथ रामचंद्र महीपते । पूर्णानंदैकरूप त्वं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥१२०॥ एवं यः कुरुते पूजां बहिर्वा हृदयेऽपि च । सकृत्पूजनमात्रेण राम एव भवेन्नरः ॥१२१। किं पुनः सततं ब्रह्मण्येवं पूज्य स्थितो हि सः । सर्वान्कामानवाप्नोति चेह लोके परत्र च । १२२। एवं सुतीक्ष्ण ते प्रोक्तं यथा पृष्टं त्वया मम । हृदये मानसीपूजाविधानं राघवस्य च ॥१२३।

श्रीरामदास उवाच

एवं शिष्य सुतीक्ष्णाय मुनयेऽगस्तिना पुरा । यत्प्रोक्तं तन्मया सर्वं तव प्रोक्तं सविस्तरात् ॥१२४॥ शिष्याधुना बहिःपूजाविधानं च मयोच्यते । नरः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचादिकाः क्रियाः ॥१२५॥ स्नात्वा संध्यादिकं कृत्वा देवपूजां समारभेत् । तीर्थे देवालये वाऽपि गोष्ठे पुण्यस्थलेषु च ॥१२६। नद्यास्तटे देवगेहे तुलसीसन्निधौ तथा । लिप्त्वा भूमिं गोमयेन ततो यन्त्राणि लेखयेत् ॥१२७॥ सितरक्तहरित्पीतनीलकृष्णादिमद्भवैः । नानावर्णैश्चित्रितानि तत्र पूजां समारभेत् ॥१२८॥


हे यज्ञका प्रतिपालन करनेवाले ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे अनन्त ! हे यज्ञेश ! हे हरे ! हे मुकुन्द ! हे विष्णो ! हे मुरारे ! हे भावल्लभ ! हे अनन्त ! हे जगन्निवास ! श्रीराम ! हे राजेन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे श्रीजानकीकान्त ! हे विशालनेत्र ! हे राज धिराज ! आपमें मेरी भक्ति हो ॥ ११४-११५ ॥ तपाये हुए सुवर्णसे निर्मित और रत्नोंसे विभूषित यह सुवर्णपुष्प मैं आपको अर्पण करता हूँ। हे प्रभो ! इसे आप स्वीकार करें ॥ ११६ ॥ हृदयरूपी कमलके बीचमें आप सीता तथा समस्त आवरणोंके साथ उसपर बैठिए ॥ ११७ ॥ मन, वचन अथवा शरीरसे मैंने जो शुभ या अशुभ कर्म किया हो, वह सब आपकी प्रसन्नताका कारण बने। हे धनुर्धारी राम ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ ॥ ११८ ॥ हे रघुपूंगव ! रात-दिन मैं हजारों प्रकारके पातक करता हूँ। मुझे अपना दास समझकर आप क्षमा करें ॥ ११९ ॥ हे जानकीनाथ ! हे महीपते ! हे रामचन्द्र ! आपको नमस्कार है। हे पूर्णानन्दस्वरूप ! मैं आपको अर्घ्य देता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १२० ॥ इस रीतिसे जो मनुष्य हृदयके भीतर या बाहर पूजन करता है वह केवल एक बारके पूजनसे साक्षात् राम हो जाता है ॥ १२१ ॥ फिर उसके लिए क्या कहना, जो रात-दिन उसीमें लीन रहता हो ? वह प्राणी इहलोक और परलोक, दोनोंकी अभीष्ट कामनाएं प्राप्त कर लेता है। हे सुतीक्ष्ण ! तुमने हमसे जैसे पूछा, उस प्रकार मैंने मानसी पूजाका सारा विधान कह सुनाया ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ श्रीरामदासने कहा - हे शिष्य ! इस तरह सुतीक्ष्ण मुनिके लिए अगस्त्य ऋषिने उस समय जो विधान बतलाया था, सो मैंने विस्तारपूर्वक तुम्हें बतला दिया ॥ १२४ ॥ हे शिष्य ! अब मैं बाह्यपूजाका विधान बतला रहा हूँ। उपासकको चाहिये कि प्रातःकाल उठे और शौचादि-से निवृत्त होकर स्नान संध्या आदि करे। फिर किसी तीर्थ, देवालय, गोष्ठ वा या पवित्र स्थानमें देवपूजा प्रारम्भ करे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ ऊपर बताये स्थानोंके सिवाय किसी नदीका तट, देवमन्दिर तथा तुलसीके पास गोबरसे लीपकर सफेद, लाल, हरे, पीले, नीले, काले, इस तरह नाना प्रकारके रंगोंसे चित्र-विचित्र पद्म बनाकर पूजन प्रारम्भ करे ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ एक आसन एक हजार आठ श्रीरामनामक बनता है। एक आसन आठ