भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५८० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३


जाम्बवता समायुकमङ्गदेन परिष्टुतम् । अयोध्यावासिनं राममेवं हृदि विचिन्तयेत् ॥१६५॥ सीताराम समागच्छ मदग्रे त्वं स्थिरो भव । गृहाण पूजां महतां कृतमावाहनं तव ॥१६६॥ हिरण्मयं रत्नयुक्तं नानारत्नविचित्रितम् । सिंहासनं सुवस्त्रं च कामनाथे ददामि ते ॥१६७। चन्दनागुरुसंयुक्तैर्जलैस्तीर्थसमुद्भवैः । पाद्यं गृहाण श्रीराम मया दत्तं प्रमोद मे ॥१६८। पुष्करादिषु तीर्थेषु गङ्गादिषु सरित्सु च । यत्तोयं तन्मयाऽऽनीतं दत्तमर्घ्यं गृहाण भोः ॥१६९। सुगन्धवामितं तोयं बहुतीर्थसमुद्भवम् । आचमनार्थमानीतं गृहाण त्वं सुरेश्वर ॥१७०। हरिद्राकुङ्कुमैर्युक्तं सुगन्धद्रव्यमिश्रितम् । सुगन्धस्नेहसम्मिश्रमुद्वत्तनमथास्तु ते ॥१७१। कामधेनूद्भवं क्षीरं नन्दिन्या दधि सुन्दरम् । कपिलाया घृतं श्रेष्ठं मधु विन्ध्याद्रिसम्भवम् ॥१७२। सितोपलसमानाभं सितायुक्तं मनोहरम् । पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं त्वं गृहाण भोः ॥१७३॥ गङ्गा च यमुना चैव गोदावरी सरस्वती । नर्मदा सिन्धुकावेरी सरयू गण्डकी तथा ॥१७४॥ ताम्रपर्णी भीमरथी कृष्णा वेणी महानदी । गोमती सागराः सप्त पयोष्णी मत्रनाशिनी ॥१७५। पूर्णा तापी तुङ्गभद्रा क्षिप्रा वेगवती तथा । पिनाकी प्रवरा सिन्धुरेशा सार्द्धत्रयो नदाः ।१७६॥ घृतमाला कृतमाला मही निक्षेपिका तथा । पयोष्णी प्रेमगङ्गा च चित्रगङ्गा करानदी ॥१७७। नीरा चर्मण्वती वृद्धा वज्रा च पुनः पुनः । सिन्धुशीरा च वैकुण्ठाऽलकनन्दा च वारणा ॥१७८। इत्यादिसर्वतीर्थेषु यत्तोयं वर्तते शुभम् । तन्मयाऽऽनीतमद्यात्र स्नानं कुरु रघूत्तम ॥१७९॥ पुनराचमनं रम्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम् । गृहाण रघुनाथ त्वं दीयते यन्मया तव ॥१८०॥ सुवर्णतन्तुमिश्रितं पीतकौशेयसम्भवम् । वस्त्रयुग्मं प्रदास्यामि गृहाण रघुनायक ॥१८१॥ शुद्धं हेममयं रम्यं नवतन्तुसमुद्भवम् । ब्रह्मग्रन्थिसमायुक्तं यज्ञसूत्रं प्रगृह्यताम् ॥१८२॥


आगे खड़े वन्दना कर रहे हैं ॥ १६४ ॥ जाम्बवान्‌के साथ साथ अङ्गदभी खड़े स्तुति कर रहे हैं। इस प्रकार अयोध्यावासी रामका मनमें ध्यान करे । १६५ ॥ और कहे-हे सीताराम ! आप मेरे सामने आकर बैठिए । मैं आपका पूजन करूंगा। मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप आइए और मेरी पूजा स्वीकार करिए ॥ १६६ ॥ सुवर्णका बना हुआ तथा रत्नखचित होनेसे चित्र-विचित्र मालूम पड़नेवाला और सुन्दर वस्त्रस सहित सिंहासन मैं आपकी बैठनेके लिए देता हूँ ॥ १६७ ॥ चन्दन और पुष्पसे मिले हुए तीर्थोंके जलका पाद्य बनाकर आपको देता हूँ । इसे आप स्वीकार करें और मेरे ऊपर प्रसन्न हों ॥ १६८ ॥ पुष्कर आदि तीर्थों तथा गङ्गा आदि नदियों-से लाये जलका अर्घ्य बनाकर मैं आपको देता हूँ, इसे स्वीकार करिए ॥ १६९ ॥ सुगन्धसे वासित एवं कितने ही तीर्थोंसे लाया हुआ जल मैं आपको आचमनके लिए देता हूँ । हे सुरेश्वर ! इसे आप ग्रहण कीजिए । १७० ॥ हल्दी कुमकुम और बहुतसे सुगन्धद्रव्योंसे मिश्रित तथा सुगन्धमय तेल आदिस मिला हुआ जल मैं आपको स्नान करानेके लिये देता हूँ ॥ १७१ । कामधेनुका दूध नन्दिनी गौका दही, कपिला गौका घृत विन्ध्य-पर्वतसे उत्पन्न उत्तम मधु, ॥ १७२ । सफेद पत्थरके समान चमकती हुई चीनीसे मिल्य पंचामृत मैं आपको स्नान करानेके लिए देता हूँ। इसे आप ग्रहण करिए ॥ १७३ ॥ गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, सरयू, गण्डकी, ताम्रपर्णी, भीमरथी, कृष्णा, वेणी, महानदी, गोमती, सातों सागर, मवनाशिनी, पयोष्णी, पूर्णा, तापी, तुङ्गभद्रा, क्षिप्रा, वेगवती, पिनाकी, प्रवरा, सिन्धुरेशा, स'ढे तीन नद, घृतमाला, कृतमाला, मही, निक्षेपिका पयोष्णी प्रेमगङ्गा, चित्रगङ्गा, करानदी, नीरा, चर्मण्वती, वृद्धा, वज्जरा, सिन्धुशीरा, वैकुण्ठा अलकनन्दा, वारणा इत्यादि ॥ १७४-१७८ ॥ नदियोंमें जो पवित्र जल विद्यमान है वह मैं आज यहाँ ले आया हूँ । हे रघूत्तम आप इससे स्नान कीजिए ॥ १७९ ॥ सब तीर्थोंका पवित्र जल मैं आपको पुनराचमनके लिये दे रहा हूँ । इसे आप ग्रहण कीजिए ॥ १८० ॥ सुवर्णके सूतोसे बना तथा चित्र-विचित्र दीखनेवाला पीत कौशेय वस्त्र मैं आपको दे रहा हूँ, इसे स्वीकार करिये । १८१ ॥ शुद्ध, सुवर्णमय,