श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ५८२
मुकुटं कुण्डले रम्ये मुद्रिकाः कङ्कणे तथा। नूपुरे रत्नजालानाः केयूरे रत्नमण्डिते ॥१८४॥ इत्यादीन्नामभूषांश्च दिव्यस्वर्णमयान्यविभो। त्वदर्थं च मयानीतानलङ्कारान् गृहाण भोः ॥१८४॥ छत्रं सव्यजनं रम्यं चामरद्वयसंयुतम्। त्वदर्थं च मयाऽऽनीतं गृहाण विपुलोदन ॥१८५॥ सुगन्धं चन्दनं दिव्यं कस्तूरीमिश्रितं तथा। रक्तचन्दनसंयुक्तं गृहाण त्वं मयाऽर्पितम् ॥१८६॥ अक्षतांश्च वरान् दिव्यान्मुक्ताफलविनिर्मितान्। कर्पूराद्रान्द्रुमेशान्चान् गृहाण परमेश्वर ॥१८७॥ माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो। मयाऽहृतानि पूजार्थं गृहाण रघुपायक ॥१८८॥ वनस्पतिरसोद्भूतं गन्धयुक्तं सुशोभनम्। आघ्रेयं सर्वदेवानां धूपं गृहाण राघव ॥१८९॥ आज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण भो राम त्रैलोक्यतिमिरपह ॥१९०॥ अन्नमन्नरसं सम्यक् पायसंघृतमिश्रितम्। शर्करामधुसंयुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥१९१॥ आम्रादीनि सुपक्वानि फलानि विविधानि च। समर्पितानि ते राम गृहाण रघुनन्दन ॥१९२॥ पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम्। कर्पूरैलायुतं ताम्बूलं स्वीकुरु प्रभो ॥१९३॥ हिरण्यं ब्रह्मसम्भूतं वह्नितेजःसमुद्भवम्। दीयते दक्षिणार्थे ते गृहाण रघुनन्दन ॥१९४॥ एवं मया षोडशोपचाराः सविस्तरं ते कथिताः विशाम्पते। आवाहनाद्यश्च हि दक्षिणांतः शेषा अप्यंशं सकलां हि दृश्ये ॥१९५॥ पञ्चवर्तिमसंयुक्तं कपिलाऽऽज्यविमिश्रितम्। वह्निना योजितं रम्यं गृहाण त्वं निराजनम् ॥१९६॥ जाती चंपककन्दारौ केतकी तुलसी तथा। दमनो मुनिकुन्दैश्च ददामि स्वामिनं तव ॥१९७॥ एभिर्नवविधैः पुष्पैर्मन्त्रपुष्पाणि राघव। मयाऽर्पितानि गृहाण प्रसीद परमेश्वर ॥१९८॥ यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिण पदे पदे ॥१९९॥
२८४ नवोर सूत्रसे बना तथा सुवर्णसंयुक्त यज्ञसूत्र मैं आपको देता हूँ, इसे आप स्वीकार करिये ॥ १८२ । मुकुट, रत्न कुण्डल, मुद्रिका, कंकण, नूपुर स्वर्णनिर्मित जंजीरका माला, रत्नमण्डित केयूर इत्यादि परम रम्य, दिव्य, स्वर्ण और बाणमय दन अलंकार मैं आपके लिए लाया हूँ। इन आप ग्रहण करिए ॥ १८४ ॥ १८४.५ ॥ व्यजन और चमर संयुक्त छत्र मैं आपके लिए लाया हूँ। हे रघुनन्दन, इसे आप स्वीकार करिए ॥ १८५ ॥ सुन्दर गन्धयुक्त, दिव्य कस्तूरी अमिश्रित तथा लाल चन्दन (घिसा चन्दन) मैं आपके लिए लाया हूँ सो आप ग्रहण कीजिए ॥ १८६ । पाजाके टुकड़ासे बनाया हुआ कर्पूरा और दुमट्ममिश्रित अक्षत मैं आपको समर्पण करता हूँ, इसे आप ग्रहण करें ॥ १८७ ॥ मालती आदि सुगन्धित कुशस बनी माला मैं आपको पूजाके निमित्त लाया हूँ, हे रघुपायक ! इन आप ग्रहण कीजिए ॥ १८८ ॥ वनस्पतिकारस उत्पन्न, गन्ध-युक्त, उत्तम सूंघनेवाला और सब देवताओंके सूँघने योग्य धूप आपके लिए लाया हूँ इसे ग्रहण कीजिए ॥ १८९ ॥ घीसे भीगी तीन बत्तियोंवाले दीपकको लाया हूँ। हे तीनों लोकोंका अन्धकार दूर करनेवाले राम ! इसे आप ग्रहण करिए ॥ १९० ॥ साने योग्य अन्न, दूध घी, चामर तथा मधुमिश्रित नैवेद्य मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करिए ॥ १९१ ॥ आम्र आदिक खूब पके अच्छे अच्छे फल मैं आपको अर्पण करता हूँ, इसे ग्रहण करें ॥ १९२ ॥ सुपारी युक्त पानके पत्तोंस झाड़ा हुआ और अनेक मसालों युक्त ताम्बूल आप ग्रहण करें । १९३ ॥ हे रघुनन्दन ! ब्रह्मस उत्पन्न तथा अग्निके तेजसे आयमान सुवर्ण मैं दक्षिणाके लिए आपको देता हूँ, उसे आप स्वीकार करें ॥ १९४ ॥ हे वत्स ! इस तरह मैंने विस्तारपूर्वक आवाह्नसे दक्षिणा तकके षोडश उपचायोंको कह सुनाया। शेष पूजनादि आगे बतलाता हूँ ॥ १९५ ॥ पाँच वत्तियोंसे युक्त, कपिला गौके घृतसे मिश्रित एवं अग्निसे संयोजित रम्य नीराजन मैं आपको अर्पण करता हूँ सो स्वीकार करिए ॥ १९६ ॥ जूही, चम्पा, कन्दार, केतकी, तुलसी दमनक, अगस्त और दो प्रकारके मुनिकुन्द इन नौ फूलोंका मन्त्रपुष्प मैं आपको देता हूँ। हे परमेश्वर ! इसे स्वीकार करिए और मेरेपर प्रसन्न होइए । १९७ ॥ १९८ ॥ जन्मान्तरमें भी मैने जिस किन्हीं पापोंको किया हो, वे नष्ट हो जायें।