भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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५८२ आनन्दरामायणे [सर्गः ३


उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा । पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां साष्टांगश्च नमोऽस्तु ते ॥२००॥ आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर ॥२०१। मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं रघूत्तम । यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥२०२॥ एवं श्रीरामचन्द्रस्य भक्त्या कार्यं प्रपूजनम् । निरन्तरं तथा कार्यं नवम्यां च विशेषतः ॥२०३॥

विष्णुदास उवाच गुरो नवविधैः पुष्पैस्त्वया पुष्पांजलिः कथम् । निवेदितोऽत्र रामस्य पूजने तद्वदस्व माम् ॥२०४। त्वत्तो नानाविधाः पूजाः सुरणां च मया श्रुताः । एवं तन्मे श्रुतो नैव नवपुष्पांजलिः कदा ॥२०५॥

श्रीरामचन्द्र उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । आसीत्पुरा द्विजवरः कावेर्या उत्तरे तटे ॥२०६। रामनाथपुरे कश्चित्सुन्दरश्चाऽतिभक्तिमान् । तस्याऽभवन् पुत्राश्च रामचिंतनतत्पराः ॥२०७॥ चन्द्रोऽथचन्द्रश्चन्द्राभश्चन्द्रायश्चंद्रशेखरः । चन्द्रांशुर्जितचन्द्रश्च चन्द्रचूड़ोऽष्टमः स्मृतः ॥२०८॥ रामचन्द्रांशतः नव गृहाप्ताश्च नव स्मृताः । एकदा ते त्रयोऽोध्यायां रामं भक्तकृपाकरम् ॥२०९॥ द्रष्टुं मधुचैत्रमासे तस्थुस्ते सरयूतटे तावत्तत्र समायाता नानादेशान्तरस्थिताः । २१०॥ जनानां कोटयश्च नानावाहनसंस्थिताः । सरय्यां शमतीर्थे हि चैत्रस्नानमादरात् ॥२११। तेषां समागतानां हि समर्द्दस्तत्र वै बभूत् । समर्दाद्रामचन्द्रस्य तेषां नाभूच्च दर्शनम् ॥२१२॥ तदा ते मंत्रयामासुर्नव विप्राः परस्परम् । कथं श्रीरामवभ्रयात्र समर्दे दर्शनं भवेत् ॥२१३.। खेजातं त्वतियत्नेन तर्हि यत्किं न दर्शनम् यावत्सम्येन मनसा राघवो न निरीक्षितः । २१४। तावत्तद्दर्शनं नैव तृप्तिं नो जनयिष्यति । तदा चन्द्रोऽब्रवीज्ज्येष्ठस्त्वत्रैव शमदर्शनम् ॥२१५।


एक-एक पग चलकर मैं आपकी प्रदक्षिणा करता हूँ ॥१९९॥ हृदयसे, मस्तकसे, दृष्टिसे, मनसे, वचनसे, हाथोंसे, पैरोंसे और घुटनोंसे मैं साष्टांग प्रणाम करता हूँ ॥२००॥ हे परमेश्वर ! न मैं आवाहन करना जानता हूँ, न विसर्जन करना आता है। पूजन करना भी मैं नहीं जानता। यदि कुछ भ्रम हुआ हो तो आप क्षमा करें ॥२०१॥ हे रघूत्तम ! मंत्रसे, क्रियासे और भक्तिसे हीन मैने जो कुछ पूजा की है हे देव ! वह सब परिपूर्ण हो जाय । २०२। इस तरह निरन्तर भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिए और नवमीको विशेष करके ऐसा करना उचित है ॥२०३॥ विष्णुदासने कहा-हे गुरो ! इस पूजनके प्रसङ्गमें आपने नौ प्रकारके फूलोंसे पुष्पाञ्जलि देनेकी विधि क्यों बतलाई है ? सो आप हमसे कहिये ॥२०४॥ अबतक आपने मुझे बहुतसे देवताओंका विविध पूजन बताया, किन्तु उनमें नवपुष्पाञ्जलि आपने कहीं नहीं बतलायी ॥२०५॥ श्रीरामदासने कहा- हे शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है, सो सावधान मन होकर सुनो। बहुत दिनों-की बात है, कावेरी नदी के उत्तर तटपर रामनाथपुरम अति भक्तिमान् सुन्दर नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह रामका ध्यान करता था। रामका ध्यान करनेवाले उस भक्तके नौ बेटे थे ॥२०६॥२०७॥ चन्द्र, अति-चन्द्र, चन्द्राभ, चन्द्राय, चन्द्रशेखर, चन्द्रांशु, जितचन्द्र, चन्द्रचूड़ और गूढ़ाम रामचन्द्र ये उन लड़कोंके नाम थे। एक बार चैत्रके महीनेमें वे नवों लड़के भगवान् रामचन्द्रका दर्शन करनेके लिये अयोध्या गये। वहीं पहुंचकर वे सरयूके तटपर पहुंचे। तब तक अनेक देशोंके रहनेवाले करोड़ों मनुष्य चैत्रमास स्नानके लिये अनेक प्रकारकी सवारियोंपर चढ़कर वहाँ आ पहुंचे ॥२०८-२११॥ उन आये हुए लोगोंकी भारी भीड़के कारण वे नवों ब्राह्मणकुमार रामचन्द्रजी का दर्शन नहीं पा सके ॥ २१२॥ उस समय उन्होंने परस्पर मंत्रणा की कि इस प्रकारका भीड़में रामचन्द्रजीका दर्शन कैसे हो ॥२१३॥ बहुत प्रयत्न करनेपर यदि थोड़ा-सादर्शन हो भी जाय तो जबतक अच्छी तरह उन्हें न देख सकूँ तो दर्शनसे लाभ ही क्या ? ॥२१४॥ उस क्षणिक दर्शनसे हमें सन्तोष नहीं होगा। उनमेंसे ज्येष्ठ भ्राता चन्द्र बोला कि हमलोग तीव्र तपस्या करके यहीं ही रामचन्द्रजीका