श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 599, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १] मनोहरकाण्डम् ५८३
वयं क्षेणेण तपसा प्राप्स्यामस्तत्फलं हरः। तच्चन्द्रवचनं श्रुत्वा पुनः प्रोचुर्द्विजोत्तमाः ॥११६॥
एककाले तु सर्वेषां वक्ष्यामस्त्वन्तरेण हि। कस्यादौ रामचन्द्रश्च दास्यत्यत्र प्रहर्शनम् ॥११७॥
कस्य दास्यति पश्चाच्च विदितं तद्भविष्यति। कस्यास्मासु दृढा भक्तिर्विदिता सा भविष्यति ॥११८॥
एवं परस्परं चोक्त्वा ते सर्वे द्विजसूनवः। त्यक्तादाश बाष्पुमञ्चार्थकान्ते तत्परेण हि ॥११९॥
गत्वाऽतिदूरं संमर्दात्सेदुः सर्वे तपो महत्। तत्सर्वं राघवौ ज्ञात्वा सर्वसाक्षी जगत्प्रभुः ॥१२०॥
तेषां स्वदर्शनं दातुं नवमे दिवसे मुदा। संवादामास श्रीरामः सर्ग चिन्ते समास्थितः ॥१२१॥
एककाले तु सर्वेषां यदि दास्यामि दर्शनम्। तर्ह्येष तुष्टिः सर्वेषां भविष्यति न चेतरहि ॥१२२॥
अतोऽद्याहं करिष्यामि नव रूपाणि निश्चयात्। एवं संमन्त्र्य श्रीरामो लक्ष्मणं प्राह सादरम् ॥१२३॥
शिविकामानयस्वाद्य बहिर्गच्छाम्यहं मुदा। तथेति राघववाक्येन शिविकां लक्ष्मणाऽथवा ॥१२४॥
आनयामास दूतैः स राघवाय न्यवेदयत्। तदा सिंहासनाद्रामश्चोत्थार्य शिविकास्थितः ॥१२५॥
बन्धुमित्रैर्विवृत्तैश्च सुहृन्मित्रादिभिर्युतः। वाहैः शनैश्चयोध्याया ययौ रामो मुदान्वितः ॥१२६॥
ततस्तं जनसंमर्दं समतिक्रम्य राघवः। चकार नव रूपाणि ह्यात्मनः परमेश्वरः ॥१२७॥
शिविकाः सुहृदो भ्रातॄन्तान्मित्रान्भ्रातृन्वाहनान्। चकार नवधा राघवेन्द्रा म क्षणमात्रतः ॥१२८॥
निरीक्षितुं समायाता नास्यान तान् जनानापि। चकार नवधा रामस्तद हुतमिवाभवत् ॥१२९॥
ततस्तैस्तैर्जनैर्मित्रैर्हूतैर्बन्धुजनैः सह। नवानां भूसुराणां हि ययावग्रे रघूत्तमः ॥१३०॥
ततस्ते भूसुराः सर्वे तदेकसमये प्रभुम्। आत्मनः पुरतो रामं ददृशुस्तं पृथक् पृथक् ॥१३१॥
तुष्टुष्टमनसः सर्वे प्रणेमू रघुनन्दनम्। शिविकाभ्योऽवततारामस्तवुरुढ्वा पृथक् पृथक् ॥१३२॥
नवरूपधराः सर्वांन्विप्रानालिंग्य सादरम्। ऊचुर्मधुरया वाचा प्रसन्नमुखपङ्कजाः ॥१३३॥
दर्शन पा लेंगे। चन्द्रकी इस बातको सुनकर वे सब बोल उठे कि यदि हम सब भाई एक साथ तपस्या करने लग जायें तो रामचन्द्रजी किसको पहिले दर्शन देंगे ॥ ११५-११७॥ और किसको सबसे पीछे? इससे यह बात भी ज्ञात हो जायगी कि हममेंसे किसकी भक्ति दृढ है ॥११८॥ इस तरह परस्पर बातचीत करके वे सब ब्राह्मणबालक उस भीड़से दूर जा बैठे और भोजन त्यागकर केवल जप पंन्त हुए एकाग्र मनसे तपस्या करने लगे। सारे संसारके साक्षी तथा निमित्त जाननेके प्रभु रामचन्द्रसे यह बात छिपी नहीं रही ॥ ११९॥ १२०॥ नवें दिन उन्होंने अपनी सभामें उनको दर्शन देनेके विषयमं मन्त्रणा की ॥ १२१॥ इसके बाद क्षण भर अपने मनमें विचार किया कि यदि उनको एक ही समयमें दर्शन न दूंगा तो वे सन्तुष्ट नहीं होंगे ॥ १२२॥ इस कारण आज मैं नौ रूप धारण करूँगा। ऐसा निश्चय करके उन्होंने लक्ष्मणसे सादरपूर्वक कहा- ॥ १२३॥
हे लक्ष्मण ! पालकी मँगाओ। आज मैं बाहर घूमने जाऊँगा बहुत अच्छा कह तथा दूतों द्वारा लक्ष्मणने पालकी मँगवाकर रामचन्द्रजीको इसकी खबर दी तब सिंहासनसे उतरकर राम पालकी में बैठे और भाईयों, मन्त्रियों, सम्बन्धियों तथा मित्रोंके साथ धीरे धीरे अयोध्यासे बाहर निकले ॥ १२४-१२६ ॥ उस विशाल भीडको पार करके रामचन्द्रने नौ रूप धारण किया ॥ १२७॥ क्षण भरके भीतर रामने पालकी, सम्बन्धों, सब भाई, दूत तथा वाहन समेत सब मित्रोंको नौ रूपमें परिणत कर दिया ॥ १२८॥ केवल अपने तथा अपने साथियों ही की उन्होंने नौ संख्या नहीं बनायी, बल्कि जो लोग वहाँ दर्शन करने आये थे, उनको भी उन्होंने नौ संख्यामें विभक्त कर दिया। यह एक विचित्र बात हुई। १२९ ॥ इसके अनन्तर उन बन्धुओं, मित्रो दूतों, बन्धुजनों तथा ब्राह्मणोंसे आगे-आगे रामचन्द्रजी चलने लगे। १३० । फिर क्या था, उन नवों ब्राह्मणोंने एक ही समयमें प्रभुको अपने-अपने आगे खड़े देखा ॥ १३१ ॥ इससे प्रसन्न होकर उन्होंने रामको प्रणाम किया। इसके बाद वे नवों राम अपनी-अपनी पालकियोंसे उतरे और उन ब्राह्मणोंको गलेसे लगाया। फिर मीठी-मीठी वाणीमें उनसे बोले ॥ १३२ ॥ १३३ ॥ उन्होंने कहा-हे ब्राह्मणों ! आप लोगोंने बड़ा कष्ट किया है।