श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 600, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५८४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
भो विप्राः श्रमित्वा यूयं युष्माकं कृतनिश्चयम्। बुद्ध्वा वयं पृथक् रूपैर्जाताः स्मो नवधाऽद्य हि ॥२३४॥ एकाकालेऽत्र तपसां सर्वेषां दर्शनं निजम्। कस्य देयं तु पूर्वं हि पश्चात्कस्य प्रदीयताम् ॥२३५॥ इति सम्मन्त्र्य हृदयेन स्वयंकसमयेन हि। युष्माकं दर्शनं दत्तं वरप्यर्थं वरानितः ॥२३६॥ रामाणां वचनं श्रुत्वा ते प्रोचुर्भूसुरोत्तमाः। येनास्माकं भवेत्कीर्तिः स वरो दीयतां तु नः ॥२३७। तेषां वचनं श्रुत्वा रामाः प्रोचुर्द्विजान्पुनः। युष्माकं दर्शनार्थं हि नवरूपधरा वयम् ॥२३८॥ अद्य जाता यतस्तस्माद्युष्माकं नामभिः सदा। नव रामाः परा ख्यातिं गमिष्यन्त्यवनीतले ॥२३९॥ अस्माकं नव यत्किञ्चित्प्रियं हि भविष्यति। ते तेषां तु रामाणां वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तमाः ॥२४०॥ सन्तुष्टस्ते नता नेमुः स्वं स्वं रामं मुहुर्मुहुः। तदा सर्वे जना रामान् लक्ष्मणान् भरतादिकान्॥२४१। आत्मानं नवधा जातान्दृष्ट्वा विस्मयमागताः। ततो रामाः शिविकासु स्थित्वा पृष्ट्वा द्विजोत्तमान्॥२४२॥ पश्यान्त्य ययुः सर्वे मार्गे त्वेकोऽभवन्पुनः। सर्वे जातास्त्वेकदापस्तथा ते विस्मयं ययुः । २४३ । ततो रामो बन्धुभिश्च पूर्ववन्नगरीं ययौ। गत्वा गेहे तु सीतायै सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥२४४। अतस्ते नव विप्राणां नामभिर्जगतीतले । ख्यातिं रामा यपुस्तत्र नव यच्च तप्रियम्।२४५॥ यथार्का द्वादश प्रोक्ता एकविंशद्गणाधिपः। रुद्रा एकादश प्रोक्ता यथाष्ट भैरवाः स्मृताः ॥२४६। नव दुर्गा यथा त्वत्र तथा रामा नव स्मृताः। प्रियं द्वादश सूर्याय एकादश शिवप्रियम् ॥२४७॥ एकविंशत्प्रियं यद्गगणेशाय महात्मने। प्रियमष्ट भैरवाय दुर्गायै तु नव प्रियम् ॥२४८॥ यथा यथाऽत्र रामाय नव शिष्य प्रियं सदा। तस्मान्नवविधेः पुष्पैर्गङ्गलिस्तत्प्रियो मतः ॥२४९॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे मनोहरकांडे रामपूजावृत्तविस्तारो नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
आपके कष्टको देखकर ही मैं अलग-अलग रूप धारण करके एक ही समयमें सबके समक्ष आया हूँ ॥ २३४ ॥ मैंने अपने मनमें सोचा कि ये सब भाई एक साथ एक ही समयमें तपस्या करने वाले हैं, ऐसी अवस्थामें मैं किसे पहले दर्शन दूँ और किसे पीछे ॥ २३५ ॥ यह विचारकर मैंने आज एक ही समय तुम लोगोंको दर्शन दिया है। अब अपने इच्छानुसार वर भी मांग लो । २३६। उनकी वाणी सुनकर ब्राह्मणोंने कहा—हे प्रभो ! जिससे संसारमें हमारी कीर्ति हो, हमें आप वही वरदान दीजिये ॥ २३७। इस तरह उनकी बात सुनकर रामने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आप लोगोंको दर्शन देनेके लिये मैंने नौ रूप धारण किया है। अतएव आप लोगोंके नामसे ही मैं नौ रामके नामसे विख्यात होऊँगा । २३८ ॥ २३९ ॥ जो कोई भी नौ चीजें मुझे देगा, वे हमें अतिशय प्रिय होंगी। इस तरह उनका बात सुनकर प्रसन्न मनसे उन ब्राह्मणोंने बार-बार रामको प्रणाम किया । उधर रामके साथवाले लक्ष्मण भरत आदि लोग अपनेको नौ रूपवाले देखकर बड़े चकराये । तदनन्तर वे सब राम पालकियोंमें बैठे और उन ब्राह्मणोंसे पूछकर अयोध्याके लिये लौट पड़े । २४०-२४२ । रास्तेमें रामने उन नवों रामोंका रूप समट लिया और फिर ज्योंके त्यों एक राम हो गये। यह घटना देखकर भी लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४३ ॥ इस तरह राम अपने बान्धवोंके साथ नगरीको गये। घर पहुंचकर उन्होंने सीताको उस दिनका सारा समाचार कह सुनाया ॥२४४॥ हे शिष्या ! इसी कारण राम उन नौ नामोंसे विख्यात हुए और जो-जो चीजें नौ संख्याकी दी जाती हैं, वे उन्हें विशेष प्रिय हुआ करती हैं। २४५ ॥ जैसे बारह आदित्य माने गये हैं इक्कीस गणेशजी, ग्यारह रुद्र, आठ भैरव तथा नौ दुर्गायें मानी गयी हैं, उसी तरह राम भी नौ माने जाते हैं ॥ २४६ ॥ बारह सङ्ख्याकी चीजें सूर्यको, एक इससङ्ख्यक रुद्रको, इक्कीस गणेशजीको, आठ भैरवको और नौ वस्तुयें दुर्गाको प्रिय होती हैं ॥ २४७ ॥ २४८॥, इसी तरह जो चीजें नौ होंगी, रामको अत्यंत प्रिय हुआ करेंगी। इसलिये नौ प्रकारके फूलोंसे अञ्जलीदानका विधान मैंने बतलाया है ॥ २४९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे ज्योत्स्ना भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥