श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें६८८ आनन्दरामायणे [सर्गः ४
तद्युङ्मुद्रान्वितं रामलिङ्गाख्यं भद्रमुच्यते महा शिष्याधुना तन्मे शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥५३॥ तिर्यगूर्ध्वमेकपञ्चाशद्रेखास्तत्पदगेषु च । सप्त सप्तपदा ने द्वौ परिधी पीतवर्णके ॥५४॥ कार्यो तत्र कोणदेशेबिन्दुश्चित्पदशुक्लतः । शृङ्खलैकपदा कृष्णा त्रयोदशपदा लता ॥५५॥ हरिनेत्रो वसुपदः कृष्णवर्णा प्रकल्पयेत् । विपरं कोणिनं कार्यं भद्रं वल्ल्यग्निकल्पितम् ॥५६॥ षष्टिपादात्मिका मुद्रा सर्वतोऽष्टदिकेष्वथ । त्यक्त्वा पक्तिकोणकोष्ठं मिथुनेऽग्नितस्तथा ॥५७॥ मिथुनं'क्तां च सप्तायाः पक्तेः षट् स्वयः । मतिगा पूरयेत्त्र मति रामेति सप्तकम् ॥५८॥ तत्रादावग्निमुद्रा स्यात्समीवापस्थित्यनन्तरम् । कलिङ्गद्वयं मद तथा लिङ्गोपरि स्थितम् ॥५९॥ पदद्वयं पीतवर्णं वीथीवल्ल्या नियोजयेत् द्वितीये त्वेकमुद्रा द्वे परिधी द्वौ शिवौ मतं । ६०॥ भद्रं नवपदं लिङ्गस्कन्धेऽप्यर्थे रमाष्टकम् । भद्रं शान लिङ्गोपरि रक्तं नृपपदन्तकम् ॥६१॥ लिङ्गस्कन्धपदं द्वे द्वे द्वारते वीथिकाऽपि च । भद्राणि तीणिक्षेत्राणि पाद द्वे लोहितेऽत्र हि । ६२. मनोऽन्तः गर्वतोभद्रं कार्यं तत्र तु वापिका । चतुविंशत्पदं भद्रमकंकं तु लते मिते । ६३। त्रिषदोऽब्जः पञ्चपदा शृंखला परिधिस्ततः । मध्ये पद्मं रक्तवर्णं रचयेद्वा विचित्रितम् ॥६४ पीतशुक्लरक्तकृष्णाश्चतस्रो परिधयो मताः । एतत्पोटमुद्राभि र्ममलिङ्गख्यभद्रकम् ६५ सदानन्दमयं रामं चिज्ज्योतिषमनामयम् । सर्वावभासकं नित्यं स्वान्तस्थं समुपास्महे ॥६६। चन्द्रकलं रामलिङ्गतोभद्रं यद्विरुचेऽस्तु । निर्विकारं नास्ति यस्मिन्विवेकः सावधिष्यते ॥६७ कल्पितः स नरो राजा रामलिङ्गायुतः स्मृतः । रामगात्रम् इत्युक्तो योगिगम्यं परं महः ॥६८। लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन चित्रं परं व्योमेत्युक्तं ब्रह्मविदुत्तमैः ॥६९
"राम" ये दो अक्षर सप्तर रखना लगे । इन चारों नमोका चारा अंग १६ ५२ । ५२ हे शिष्य अब सपुङ्काकित रामलिङ्गातोभद्र बतलाता हूँ सान सावधान होकर सुनो ५३ । खड़ी और पड़ा ५१ रेखा खींचा। उनके सात सात कनाम दल तथा दो परिधियाँ बनाये । ५४ ॥ बाणभयभ तीन काकोनि स्पद रक्त दो इन्दु बनावे । छः कलावा एक शृंखला और तेरह क कोष्टोंकी लता बनावे ५५ ॥ आठ पादका हर रंगका शिव बनावे। लायरङ्गकी षट्कोण वास हो तीन पादका भद्र बनावे ॥ ५६ ॥ साठ पादकी मुद्रा और चन्द्रमाबाकी गणना रखना ६० क कान और १२ पादका भद्र छोड़कर क्षार बतलायी गयी मुद्रा गणना चाहिये। इसके अनन्तर सबने वामपद तथारे बाणकाणा क? स्याहीस भर दे हो 'राम' ऐसा स्पष्ट दिखायी देने लगेगा । ५७ ॥ ५८ एक अष्ट दिक अग्निमुद्रा और इसको बाकी परिधियां सात रङ्गस रंगा। इन कोणोंके भद्र तथा लिङ्गके ऊपर शिव दोनों याद पञ्चवर्णम विनियहिये । इसम बाई वल्ला तथा वीथियां बनाने चाहिये । दूसरे म एक मुद्रा, दो परिधि दो शिव नौ पादका भद्र, लिंग और पंकिक मध्यम छः भद्र बनावे लिङ्ग इश्र्वारा षट् पाल रङ्गका हो और चार काष्ठशको लाल रङ्गस रग्ना चाहिये ॥ ५९-६१ ॥ लिकक स्कन्धपर्यन्त नाना हर एकएक भद्र रक्खे ओर वापर्दा दूरं ह? बह्रर्क. रक्खे । यहाँपर तीन भद्र रङ्ग, एक दीक्षा ओर दो दाण । ऊपर मध्यभागमें सर्वतोभद्र बनगा। जिसमे चौबीस स्थान रहेंगे, नौ कोष्टकोकी लता बनोगी और शिव भी बनेगे । ६२ । तीन पादक अब्ज (कमल) ओर पाँच पा की शृङ्खला और परिधि रहेगा । मध्यम रङ्गवल या कई रङ्गक कमल बनावे ॥ ६३ । ६४ ॥ इसके अन्तमे पील, सफेद, लाल और काले रङ्गकी परिधि रहेगी। इन पोषश मुद्राओंस रामलिङ्गतोभद्र बनता है। ६५ ॥ सदा आनन्दमय, चिन् ज्योतिष्य, व्याधिरहित और सबके अवभासक, ऐसे अपना बा रूपमा रामकी मै उपासना करता हूँ । ६६ । सोलह कलाओका यह रामलिङ्गातोभद्र जों मैने बतलाया है वह विचारविहीन नहीं है उसमे जा विचार है, अब उसकी विवेचना करते है । ६७। राजाराम इस चिह्नका निर्माण करने- वाला मनुष्य धन्य है। सब लीपोकी अनन्द दास कारण रामका "राम" यह नाम पड़ा है। योगीजनोको ही विति अवगत है उसका सर्वोत्कृष्ट रूप है । ६८ ॥ उन्हीमे संसारके सब प्राणी लोन होते है और फिर