भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 605

सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५८९

लिङ्ग्यते चिन्त्यते येन भावेन भगवान् शिवः । लिङ्गरूपं स रामेति लिंगं चेति द्विनामकृत् ॥७०॥ बहूनि सन्ति नामानि रामेशस्य महात्मनः । रजांसि गणयेत्कोऽपि मूर्तेर्नावाखिलेशितुः ॥७१॥ तस्मिन्सर्वतोभद्रं हृदयं तन्प्रकीर्तितम् । तत्र पद्ममष्टदलं सकेसरमकणिकम् ॥७२॥ तन्मूर्त्यानं रामलिङ्गस्य ध्यानार्थं परिकल्पितम् । अन्यथा सर्वगण्यास्य कथं देशादिभेदता ॥७३॥ दिव्यैर्पातः परमात्मार्थं स्वमाययावशंगतः । धर्मार्थकाममोक्षार्थं सृष्ट्युपाधिं प्रविष्टवान् ॥७४॥ तस्य चैतन्यचन्द्रस्य षोडशैताः कलाः पराः । चित्प्रकाशा द्वयाभूता घटं दीपेन्द्रियादिवत् । ७५॥ प्रकाशयन्ति गृह्णन्ति सृजन्ति चम्प्रसारत' बुद्धिमन्मात्रमेतस्मिन् संभिकृष्टा श्चित्रम्मनः ॥७६॥ अतो ज्ञानप्रधाना मा नज्ज्ञानं चतुरो दरा प्रमत्तं मत्तप्रच्छादान् ज्ञानान् सुन्दरोदराः ॥७७॥ चतुर्दा वृत्तिभेदेन प्रोक्ता तत्त्वार्थदर्शिभि प्रयोजनं न तेनात्र प्रकृतं नाद्रविष्यते ॥७८॥ क्रियाप्रधानः प्राणश्च पञ्चधाऽसौ व्यवस्थितः । प्राणापानौ तथा व्यानः समानोदानकस्त्विति ॥७९॥ वागादिकर्मेन्द्रियेषु क्रिया प्राणाश्रया मता श्रोत्रं नयनं घ्राणं स्पर्शनेन्द्रियं तथा ॥८०॥ पञ्चैतानि चेन्द्रियाणि ज्ञानद्वाराणि वै विदुः । वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि च ॥८१॥ एव षोडशसङ्ख्यानं कलानामुच्यते बुधैः । तासु सर्वासु चैतन्यं रामनाथेति विश्रुतम् ॥८२॥ प्रविष्टं टीप्पने प्रज्ञाचेन विश्वं विचेष्टते । अनादिगगनावृत्तः कर्मनूरुफलात्मकः ॥८३॥ देहाभिमानिनो जीवाः फलभागाव पक्षिणः । यथारूपं सुखं दुःखं खादन्ति स्वस्वार्गपतम् ॥८४॥ कश्चिज्जन्मसहस्रेषु ज्ञानवान् जयते यदा । तदान्तस्थं रामरूपं ज्ञात्वा मोक्षी भवत्यलम् ॥८५॥

उन्मूलनमा प्रविर्भूत होते हैं। इसी कारण ऋचाओं ने आकाश के आगान इस परम व्योम कहा है ॥ ६९ ॥ जिस भावसे भगवान् शिवकी पूजा की जाती है, वे ही रूप शिव और राम इन दो नामोसे पुकार जात हैं ॥ ७० ॥ उन महात्मा रामके बहुतसे नाम हैं। सत्र रचना के सं प्राणी पृथ्वीके रजकणोंको भले ही गिन ले । किन्तु भगवान्के नामोंकी गणना कोई भी नहीं कर सकता ॥ ७१ ॥ उसमें जो सर्वतोभद्र है, वही हृदय जानना चाहिए । उसमें आठ पत्तोंका केशर और पखुड़ियों युक्त जो कमल है, वह रामके लिङ्गका ध्यान करनेके लिए ही बनाया जाता है। नहीं तो सर्वव्यापी अभेद इस देशदिनदता किस प्रकार मानी जाती ॥ ७२ ॥ ७३ । चिज्ज्योतिमंय वे परमात्मा अपनी मायाके वशीभूत होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस चतुर्वर्गको साधन करनेके लिए ही समागम आये थे ॥ ७४ ॥ उस चैतन्य चन्द्रमा षोडश कलाएं सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं वे संसारको स्व वन्धुआप चित्प्रकाश करते हैं ॥ ७५ ॥ । वे स्वभावसे ही सबका प्रकाशित करते, समय पड़नेपर फिर आह दबा ओर कमा कता सिर अण्डम नष्ट लिया करता है। पचित आत्मावालाक लिए बुद्धिमात्र कला हैं ओर वह तबक पास रहती है ॥ ७६ ॥ इससे यह वस्तु बुद्धि रहित रही ज्ञानप्रधान मानी जाती है। वह शब्दस्पर्शाय संसारके चेह हुए उपाय का अच्छी तरह जानता है ॥ ७७ ॥ यह वृत्तिभेदसे चार प्रकारका मानी गयी है। यहाँ उसके विषयमे विशेष विवेचनकी काई आवश्यकता नहीं बान पड़ती । अतएव इस विषयमे वास्तविक विवेचना करत हैं ॥ ७८ । अपनी वृत्तिके अनुसार प्राणक्रिया प्रधान मानी जाती है ओर इसके पाँच भेद है-प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान ॥ ७९ ॥ वाक् आदि कर्मेन्द्रियों की सारी क्रियाएँ प्राणाश्रयी हुआ करती हैं। श्रवण, नयन, घ्राण (नाक), त्वचा और जीभ ॥ ८० ॥ ये ही पाँच ज्ञानेन्द्री मानी गयी है। वाक्, पाणि (हाथ) पाद पायु (गुदा), उपस्थ (लिङ्ग), ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ है ॥ ८१ ॥ इसलिए कलाओकी सोलह सङ्ख्या कही गयी है। उन सबोंमें उन रमानाथकी चेतन्य शक्ति, विद्यमान रहती है ॥ ८२ ॥ इन्हींके प्रवेशस यह संसार स्वायमान होता है और उन्हींकी चेष्टासे सचेष्ट रहा करता है। वे अनादि संसाररूपी वृक्ष हैं और सबको कर्मानुसार फल देते हैं ॥ ८३ ॥ देहका अभिमान करनेवाले जीव पक्षियोंकी तरह अपने प्रभुके दिये हुए सुख-दुःखरूपी कर्मोंको भोगते हैं ॥ ८४ ॥ हजारों वार जन्म लेनेके बाद कही कोई ज्ञानवान् होता है और अपनी आत्माम स्थित रामका रूप जानकर मोक्षपद-