श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 606, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५१० आनन्दरहमायण [ सर्गः ४
इन्द्रियाणि पराण्याहुस्तेभ्यो बुद्धिः परा मता। ततः परः परमात्मा च सर्वव्यापी विनिश्चितः ॥८६॥ द्वौ सुपर्णावेकवृक्षं समाश्रित्य स्थितौ खगौ। एकः स्वादु फलं खादत्यन्यो विचक्षते ॥८७॥ त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोग्यञ्च यद्भवेत् तेभ्यो विलक्षणः साक्षीन्माहं भाथवणी श्रुतिः ॥८८॥ यच्चास्त्रीह यत्स्फुरति यच्चानन्दयति स्वयम् । यस्मिंश्च महति प्रत्यये सर्वे वेदाः समन्विताः ॥८९॥ विषयादि श्रीपर्यन्तं जडं मतिमतामदः, सम्पर्के च प्रियं चैतमप्रमात्मा महाप्रियः । ९०॥ सर्वेषां प्राणिनां ह्यात्मा परप्रेमास्पदो मतः स तु स्वयंक एव नेह दानास्ति गच्छति । ९१॥ चिन्मयं हृद्गतं ज्ञात्वा योऽसौ सोऽहमितिप्रथा। आचारेऽन्यथा सम्यक् परलोकेऽन गतः । ९२॥ आत्मानमकृतार्थ्यात्फलानुमे परमात्मनि। अप्सद्वयं पुनस्तस्य न कार्यं विद्यते भवे ॥९३। सर्वेऽप्युपायाः शास्त्रेषु यज्ज्ञानार्थं प्रयोजिताः। स चेत्सारसंसारेण इत्यादिः किं परं ततः ॥९४॥ दृष्टेऽस्मिन् रचिते भद्रे यस्य प्रविचायते वक्ष विषे परा प्रीतिर्जायते विदुषां सताम् ॥९५॥ नमो रामाय ज्ञानाय लिङ्गरूपधराय च शम्भवे विष्णवे तुभ्यं शङ्कराय शिवात्मने ।९६। अथवाऽऽद्ये स्थले भद्रं कार्यं नवपदात्मकम्। तिर्यग् भद्रं षट्पदञ्च रक्तपातेऽत्र ते स्मृते ।९७। द्विद्विपदात्मके कार्यं शेषं सर्वं हि पूर्ववत्। रामतोभद्रमेतच्च केवलं रामतुष्टिदम् ॥९८॥ स्थले द्वितीयभद्रं हि रक्तं विंशत्पदात्मकम् । तिर्यग् भद्रं नवपदैः पीतं चित्रे तु शुक्लके ।९९। नन्वंशानं राममानन्दकन्दं मायातीतं निर्विकारं निरीहम् । विद्याधीशं षड्गुणाकाश्रयं च वश्यं भद्रं रामनामांकितं तत् ।१००।
को प्राप्त होता है .. ८५ , पहले तो इन्द्रियाँ ही प्रधान हैं, उनमें बुद्धि श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ सर्वसाक्षी परमात्मा है ।। ८६ ।। दो पक्षी एक वृक्षपर बैठे हैं, उनमें एक तो फलोंका फल खा रहा है दूसरा दूरपर देख रहा है ॥ ८७ ।। तीनों धामों में जो भोग्य वस्तु, भोक्ता तथा भोग्य पदार्थ हैं। उन सबसे साक्षी परमात्मा विचक्षण है यह अथर्व वेद कहता है ॥८८॥ इस संसारमें जो कुछ प्रकाश युक्त वस्तुएं हैं और जिससे सबोंको आनन्दकी प्राप्त होती है। उसको विषयमें स्वयं यह एकमत होकर कहता है कि विषयसे लेकर बुद्धिपर्यन्त सब वस्तुएं जड़ और ज्ञानहीन हैं। जिसके सम्पर्कसे वह सब प्रिय मालूम होते हैं, वह परमात्मा राम सर्वप्रिय है ।८९।९०॥ सब सब प्राणियोंका अपना आत्मा स्वयं सबसे बढ़कर प्रिय होता है, यद्यपि वह एक है, फिर भी अनेक प्रकार दिखलाई देता है ।९१। जो प्राणी सबमें इस भावनासे चिन्मय रामको अपने हृदयमें सदा वर्तमान समझकर आचरण द्वारा हुई ईर्ष्यासे रामकी उपासना करता है, वह परमात्माका दूर्वा अथवाके फलीभूत होनेपर अनेकों बार इस संसारमें जन्म लेता है, किन्तु जबतक दृढ़ हो जानेपर फिर संसारमें उसे कुछ करना बाक़ी नहीं रह जाता अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है ।। ९२ ।। ९३ ।। शास्त्रोंमें जितने भी उपाय बतलाये गये हैं, उनका एकमात्र प्रयोजन ज्ञान प्राप्त करना है यदि वह सांसारिक उपायोंसे प्राप्त हो सके तो फिर क्या कहना । ९४ । यदि उक्त प्रकारसे बनाये हुए भद्रका आसन देखकर उसपर विचार किया जाय तो विद्वानांके हृदयम ईश्वरके प्रति महती प्रीतिका उत्पाद होता है ।। ९५॥ शान्ति, लिङ्गरूपधारी, शम्भु, विष्णु, शङ्कर तथा शिवात्मा रामको प्रणाम है ।। ९६ ।। यदि उक्त प्रकारका भद्र आपमकों न रुचे तो नौ पदका भद्र बनावे। इस तिरछे भद्रम छः पाद (कोष्ठक) होंगे और दो भद्र लाल और पीत रहेंगे ।। ९७ ।। फिर दूसरा लाल भद्र बीस पादका होगा। तिरछा भद्र नौ पादका होगा। इसका पीत रङ्ग रहेगा और कई रङ्गाक फलस इसमें दो-दो पादोंकी दा शृङ्खलाएं बनायी जायेंगी ॥ ९८ ॥ बाकी सब पूर्ववन् रहेंगी। इस भद्रका नाम रामतोभद्र है और यह केवल रामचन्द्रको प्रसन्न करनेवाला है ।। ९६ ।। आनन्दकन्द, मायातीत, निर्विकार, निरीह, विद्याके स्वामी और षड्गुणोंके एकमात्र आश्रय जिनका यह भद्र नहीं प्रसन्न कर सकता। इसलिए है