भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

सर्गः ४ ] मत्स्येष्टकाण्डम् ५९१


प्रागुदग्वा द्विसप्तत्येकनवाधिका २९० च रेखाः समाः सुपरिकल्प्य पदेषु तासाम् ।
कोणांगणत्र उपगीदृशकुंकमस्यः २१ रीताश्च ते परिधयः परिकल्पनायाः ॥१०१
कोणाब्जशृङ्खललताः सितकृष्णपीत वर्णानि चित्ररचनान्यरुणानि तानि ।
मुद्राश्च नवतिप्रथमा सिताश्च रक्ताः सपरिघाश्च जलंयंत्रि [निं] मूर्तीनाम् ॥१०२।
मुद्रा तु षष्टिपदसहिता च तत्र पक्षौ विहाय यमवायवदिकनभस्थे ।
प्रत्येककोणकपदानि चतुष्टयादि पंक्तिद्वयं स्मृतगुणंक्रमजंनभश्च ॥१०३॥
कृत्वा पदैकमशनव्यय मप्रमात्स्वेनातिसुन्दरतरं परिभाति भाण्डम् ।
रामेति द्व्यक्षरमुमेशजपं निधानं प्राणप्रयाणसमये जपतां महोदयम् ॥१०४॥
रचयेदादितः सव्यम्पादैद्विशत्यन्तावधि पर्यन्तं राममुद्रासु मध्येषु परिधिद्वयम् ॥१०५॥
आदौ तन्त्वमिता मुद्राश्चे विशन्त्येतानस्ततः द्वाविंशतिर्विंशतिषट्पञ्चद्वयमाप्ताः ॥१०६॥
घट्चतुर्दशत्रयोदशद्वादशद्रकः नवसप्तषट्पञ्च त्रयैकश्चाप्यनुक्रमं तु ॥१०७॥
भद्रं षोडशपदं च त्रिंशन्त्रिंशत्षडधिकम् ।
चन्द्रकं तत्समितं त्रिशत्त्रिमिश्रुविंशकम् ॥१०८।
नन्वषडग्निनेत्रांषुनिशिविंशत्र्यंशाधिकम् ।
षट्त्रिंशत्पाण्डुरपदं तच्चदे त्रिशद्धिमिश्रुयुतम् ॥१००॥
विंशत्कोष्ठं कमादेवं भवेन्पार्श्वेऽनुपूर्पये एकविंशत्पदे अष्टमेकोष्ठे च वापिका ॥११०॥
चतुर्विंशत्पदा कार्या परिध्यन्तेऽरुणावृधम् । अदीवाणि यत्र यत्र पदान्युर्वरितानि च ॥१११॥
तिर्यक् भद्रशृङ्खलार्थं यथेच्छं पूरयेद्धिया मध्ये शृङ्खलाः पश्चपदैरेकादशी लता ॥११२।
त्रिपदश्च शशी ज्ञेयः परिधयो षड्ि क्रमान् । कृष्णरक्तशुकलपीताश्चतुर्दिक्षु समन्ततः ॥११३॥
एतदष्टास्रदशशतं १००८ ज्ञेयं रामस्य भद्रकम् ।
अथवा मनु १४ रेखानां वृद्धिं कृत्वा प्रकल्प्य च ॥११४॥


एक दूसरा भद्र बतला रहा हूं ॥ १००॥ बहल ... की ओर से २९० रेखा खींचें। उसमें २१ कोष्ठवाले पीले रंगका परिधियां बनाये ॥ १०१ ॥ काणमे कमल बनाकर रूप-२, काले और पीले रंगकी शृङ्खला और लताएं बनावे। उनमें सब गा रू भिन्न भिन्न प्रकारक ... करके रहें। उसमें बनी सफेद और काल रंगकी मुद्राय मूर्तियोंके मध्यम थी अमुग उत्पन्न किये बिना वही रहती ॥ १०२ ॥ इसमें साठ कोष्ठोंकी मुद्रा बनली जात, हे किन्तु दक्षिणमुख तथा दक्षिण काणके पंक्तिही सारी छोड़ दी जाती है। प्रत्येक कोणक चार पाद, दो पक्ति तथा छटी और चौथी पंक्ति काम रङ्गकी रहेंगी ॥ १०३। इसके अतिरिक्त सातवीं पंक्तिके नीच एक पाद काम रङ्गका बनायेगा। वह भद्रके भारका तरह बहुत ही सुन्दर लगेगा। राम यह दो अक्षर शिवजीके जपपुञ्जका एक बड़ा खजाना है। यदि प्राण निकलने समय इसका जप किया जाय तो बड़ा कल्याण हो ॥ १०४ ॥ आदिस लेकर बाईसवे कोष्ठक पर्यन्त भद्रकी रचना करता आय। हर एक राम-मुद्राके बीचमे दो परिधियाँ रहेंगी। १०५ ॥ फिर पश्चात् मुद्रा रहेंगी। इसके बाद बाईस, इक्कीस, बीस, अठारह, सत्रह, सोळह, चौदह, तेरह, बारह ग्यारह, नौ, आठ सात, छ, चार तीन, दो, एक ये मुद्रायें रहेंगी, ॥१०६॥१०७॥ इस भद्रमें बीस, तीस, छत्तीस, बान्ह, पच्चीस, बीस, बयालीस, बास, पच्चीस, छत्तीस, बयालीस ॥ १०८। १०९॥ इस प्रकार बीस बीस कोष्ठ च गे आए रहेंगे। इक्कीस कोष्ठका भद्र रहेगा और भी कोष्ठकोंकी बापी बनेगी ॥ ११० ॥ चौबीस कोष्ठोंमें परिधिके पास कमल बनेगा। जो पाद बाकी बचे हों, उन्हें अपनी बुद्धिस भरें। इसमें पांच पादोंकी शृङ्खला रहेगी और ग्यारह पादोंकी लताएं बनाया जायेंगी ॥ १११ ॥ ११२ ॥ तीन पादोंका चन्द्रमा बनेगा और उदक आस-पास चारों ओर काली, लाल, सफेद तथा

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