भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

६९२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४

परिधिस्तत्र लिङ्गानामेविंशाधिकं शतम् । वाप्यो भद्राणि षट्प्रादिवत्स्र्पार्वेषु योजयेत् ॥११५॥ चतुर्विंशपदं लिङ्गं वाप्यष्टशतपादिका । द्वे भद्रे नव नव पदे ह्यष्ट षट्पदानि षट् ॥११६॥ त्रिंशल्लिङ्गानि वाप्यस्तु सप्तविंशन्मिता मताः । एकस्मिन् पार्श्वके लिङ्गाधिक्ये भद्रे प्रकल्पयेत् ॥११७॥ षष्ट्यष्टपदे शेषाण्यंककोष्ठानि योजयेत् । लिंगं कृष्णं सिता वाप्याः शेषं सर्वं पुरोदितम् ॥११८॥ पदानि शेषभूतानि यत्र यत्रेह तानि च । भद्रश्रृङ्खलयोध्यानि तदर्थे विनियोजयेत् ॥११९॥ कृष्णरक्तशुक्लपीता अन्ते परिधयो मताः । एवं लिंगयुतं रामतोभद्रं परिकीर्तितम् ॥१२०॥ अनेन देवौ सुप्रीतौ रामेशौ सत्रतस्सिव्हदौ । रामस्य पूजनार्थं हि त्विदं प्रोक्तं वरासनम् ॥१२१॥ आचार्यान् ज्ञानसंपन्नम्नत्वा तेषां प्रसादतः । वक्ष्येऽहं रामतोभद्राकृतिं च संभ्रर्मयुताम् ॥१२२॥ प्रकृतिं रामतोभद्रं विकृतिं लिंगसंयुतम् । अन्ये विकृराः संज्ञेया ह्येवं कृतिस्त्रिधोच्यते ॥१२३॥ तिर्यगूर्ध्वमान्यधिकाः शतरेखाः प्रकल्पयेत् । तत्पदेषु परिधयः षट्पडन्ते पडेव तु ॥ १२४॥ पीताः कोणेषु त्रिपदः शुक्लेन्दुः शृङ्खलाऽसिता । पञ्चदशैकादशिका वल्ली भद्रसंकमात् ॥१२५॥ सिन्धुषोडशसूर्येन्दुयुगषोडशकोष्ठकम् । कल्पयेच्चतुष्कोणेषु राममुद्रां हि पूर्ववत् ॥१२६॥ अष्टौ षष्ठ च पञ्चैधिर्धुवद्विश्चन्द्रमिनाः शुभाः तासां सीमापरिधयस्त्वेकान्तु लोहिताः १२७॥ रजनीशनेत्रमिधुपैंक्तिषु मध्यभाश्वपः । मर्यादाख्याः परिधयो भवंति द्विगुणीकृताः ॥१२८॥ अंतिम तु परिव्यन्ते सर्वतोभद्रकं लिखेत् । विशेषस्त्वत्र वापी तु चतुर्विंशपदान्मिका । १२९ । भद्रं नवपदं पद्मं परिष्यंतः सुलोहितम् । पीता नत्कर्णिका कार्या अन्ते परिधयोऽपि च ॥१३०॥

पीली परिधियां रहेंगी । ११३ । यह एक हजार आठ खानेका भद्र है। अथवा चौदह रेखाओको कल्पना करके उनकी वृद्धि करे। उसमे एक सौ इक्कीस कोष्ठोंकी परिधि बनगो वापी-भद्र आदि पहलेकी तरह समझ ॥ ११४ ॥ ११५ । चौबीस कोष्ठोंका लिंग बनेगा और अठारह पादकी वापी बनायी जायगी। दो भद्र नौ-नौ पादके रहेंगे और दस-दस पादोंके छ भद्र बनाये जायेंगे । ११६ ॥ उनमें तीस तथा बीस पादोंके लिंग रहेंगे और सत्त इस पादोंकी वापी बनायी जायगी जो कुछ बाका पाद बच उनमे दस दस पादोंसे दो भद्रोंकी रचना करे ॥ ११७ ॥ बाकी नौ का कोष्ठो यथास्थान रक्खे। इसमें लिंग काला और बापी सफेद रहेगी। बाकी सब पहलेके भद्रोंकी तरह ज्योके त्यों रहगे । ११८ । बाकी जितने पाद हैं, वे सब भद्र और शृङ्खलाके काममे आ जायेंगे ॥ ११९ ॥ काल, लाल, सफेद और पीले रङ्गकी इसकी परिधियां रहेंगी इस प्रकारके लिंगसे रामतोभद्रकी रचना बतलायी गयी ॥ १२० । इस भद्रसे राम तथा शिवजी दोनो प्रसन्न होते हैं। यहाँ रामका पूजन करनेके लिय वरासन बतलाया गया ॥ १२१॥ अब मैं ज्ञानसम्पन्न आचार्योंको प्रणाम करके उनकी कृपासे ह्मभ्रंयुक्त रामतोभद्रकी रचनाका प्रकार बतलाऊँगा ॥ १२२ ॥ इसमें रामतोभद्रको प्रकृति विकृत रहती है और भी कई तरहकी विकृतियाँ इसमें होती हैं ॥ १२३ ॥ खड़ी और बेड़ी कुल एक सो तीन रेखाएँ खींचे। इसमें भी छःछः पादकी परिधियाँ रहेंगी । १२४ ॥ कोनोमें तीन-तीन पाद पीले रङ्गके रहेंगे। चन्द्रमा उज्ज्वल रहेगा और शृङ्खला काले रङ्गकी रहेगा। सोलह पादकी वल्लरी बनायी जायगी । १२५ ॥ चार, सोलह, बारह छ, चार, सोलह पादके क्रमसे कोष्ठोंका पूर्ववत् राममुद्राकी रचना करे । १२६। आठ, छ, पाँच, चार, तीन एक, इस पादक्रमसे इसको परिधियां बनेंगी और एक परिधि लाल रङ्गकी रहेगी । १२७ । एक दो, चार और दस इनकी द्विगुणित क्रमसे मर्यादासंज्ञक परिधियां होतो हैं ॥ १२८ ॥ अन्तिम परिधिके बीचम सर्वतोभद्र बनाना चाहिये । यहाँ यह विशेषता है कि इसमें चौब स चौबीस कोष्ठोकी वापी बनायी जायगी ॥ १२९ ॥ नौ कोष्ठोंका भद्र बनेगा और परिधिके भीतर लाल