भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 609
सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् ५९३

पीतशुक्लरक्तकृष्णवर्णानि यत्र पदानि च । भद्रोर्ध्वं शेषभूतानि तानि युक्त्या प्रपूरयेत् ॥१३१॥
तिर्यग्भद्रमुमुख्याद्यैः पीतचित्रे च ते स्मृते । एतदष्टोत्तरशतं रामतोभद्रमीशितुम् ॥१३२॥
एकं मन्त्राशून्यं मरुत्समुदनिधिं सच्चिदानन्दरूपं
मायायोगेन विश्वात्मकमिदममलं ब्रह्मविष्ण्वीशसंज्ञम् ।
सृष्टिस्थित्यन्तरहेतुं निगमकुविदृतं मन्त्रभूतात्मभूतं
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं गुणगणममलं तन्महो भावयेऽहम् ॥१३३॥
नत्वा श्रीदेशिकेन्द्रस्य पादाब्जमप्रदम् । वक्ष्ये चाध्यात्मिकीं मुक्तिं सतां चित्तचमत्कृतिम् ॥१३४॥
पशूनां मत्सगोमादि सर्वमर्थाय कल्पते । मृगस्य नरदेहस्य सृष्टिदोषोयदोदितः ॥१३५॥
एकमेवामुना साध्यं ज्ञानं यन्मध्यरूपदम् । तद्विना तु पशुभ्यश्च नरो हीनतरो मतः ॥१३६॥
प्रतिभागान्पुण्यतमः श्रद्धावान् गुरूबोधते । कोटिष्वेकः स्वयं साक्षादङ्गे नारायणो भवेत् ॥१३७॥
केचिद्रामतोभद्रं मुद्रा मद्रिवदन्त्यिदम् । गयाकिना च मंवद्गं विविच्यन्ते च ते उभे । १.८।
लोकाः सप्त यथाऽङ्गेऽस्मिंस्तथा सप्त प्रकीर्तिताः । तेनैव रचना तुल्या ज्ञेया हस्तसमुद्भवैः । १३९॥
ब्रह्मांडं रामतोभद्रं मुद्रामूतानि मन्महे । रामशेषेणयुक्तानि सम्मतानि तु सूरिभिः ॥ १४०॥
यस्यां स्यान्मुद्रित वस्तु या मुद्रेति निगद्यते मुद्रेव पिहितं चाथ विहितं यदधो भवेत् ॥१४१॥
तद्वन्मवासु चैतासु ब्रह्ममुद्रितमुच्यते । तथाप्यासां मवाद्भातिचैतन्यः संप्रकाशनं ॥१४२।
आच्छादितोऽपिकनकश्चेत् स्फटिकैऽन्तर्बहिः किल । दीपः प्रकाशते क्कन्न लोपयेच्च नतथ्वते । १४३॥
मृण्मयिखनं ताम्रग्मं तदाकारं प्रपद्यते तथा ब्रह्म निगकारं मुद्राकारं विभायते ॥१४४॥

रङ्गका कमल रहेगा। उस कमलके रङ्ग बताये जायेंगे ॥ १३० । पीले, सफेद, लाल और काले
रङ्गको परिमित रहेंगे। भद्रमें बाकी बचे जिनन काष्ट हों, उन्हें युक्ति के साथ रङ्गोंसे पूर्ण कर दें ॥१३१॥ इसकी
शृङ्खला तथा भद्र पीले और विविध रङ्गके होंगे ॥ १३२ ॥ मैं आत्माके उस रूपका ध्यान करता हूँ जो
सदात्म अकेला है, समस्त सुखका विधान है, सच्चिदानन्दरूप आनन्दकन्द है। जिसने अपनी मायाके योगसे इस
निर्मल विश्वके प्रपञ्चोंको ब्रह्मा, विष्णु और शिवके नामसे अंगीकार कर रक्खा है। जो सृष्टि, पालन और
विनाशका हेतु है। जिसके ऋषिलाग बार-बार शास्त्रोंके अनुसार पाणिपात्रका प्राप्त हैं, जो सब कुछ
जानता है, जिसके पास सब प्रकारकी शक्तियां हैं, जो परमात्मा अनन्त और अमृतरूप है ॥ १३३ ॥ अब
मैं श्रीदेशिकेन्द्रके भ्रमरपद प्राप्त करानेवाले चरणकमलोंको प्रणाम करके सज्जनोंके चित्तमें चमत्कार उत्पन्न
करनेवाली आध्यात्मिक मुक्तिका वर्णन करूँगा ॥१३४॥ मृत पशुओके नललोम आदि सब पदार्थ
काम आ जाते हैं, किन्तु मनुष्यके मर जानेपर यह किसी काम नहीं आता है कि विधाताने इसकी
सृष्टि करके बड़ा भारी अपराध किया है ॥१३५ । इस शरीरसे आत्माका स्वरूप पहचान्नेकी साधना
की जा सकती है। यदि यह काम नहीं किया तो यह मनुष्य पशुसे भी हीन माना जायगा ॥ १३६ । करोड़ों
मनुष्योंमें कहीं कोई एक मनुष्य पवित्र गुरु तथा भगवद्भक्त रत्न रूप होता है। जो ऐसा होता है, वह
साक्षात् नारायण ही है ॥ १३७॥ कुछ लोग ऊपर वरणन किये हुए रामतोभद्रकी रचना करके उसमें साठ कोठकीकी
मुद्रा बनाकर इस प्रकार विवेचना करते हैं— ॥ १३८ । जिस प्रकार ऊपर कहे हुए सातों लोक हैं, ठीक उसी तरह यह
रामतोभद्र भी है ॥ १३९ । रामतोभद्र ब्रह्माण्ड है। इसका मुद्रा में ही प्रतिरूपमद् बनता है। उसमें रामरूप
चैतन्य (जीव) है। ऐसा कितने ही तत्त्वदर्शियोंने कहा है ॥ १४० ॥ जिसमें कोई वस्तु मुद्रित हो (अर्थात्
लपेटकर रक्खी हो) उसे लोग मुद्रा कहते हैं। मुद्रितका अर्थ है—पिहित या विहित (घिराया हुआ)।
यह शरीरादिमें ब्रह्मसे मुद्रित है। फिर भी इसके बाहर चैतन्यका प्रकाशन हो रही है ॥ १४१ ॥ १४२॥
स्फटिक मणिका कलश बना और उसके भीतर दीपक रखकर चाहे वह चारों ओरसे ढॉक दिया जाय, फिर
भी दीपकका प्रकाश कोई लुप्त नहीं कर सकता। ठीक यही दशा इस ब्रह्माण्डकी भी है ॥ १४३ ॥ जिस तरह कि