भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ४ ] मनोहराकाण्डम् ५१५


अष्टत्रिंशत्पदानि ह विद्यन्ते सूक्ष्मदेहके । दशेंद्रियाणि पञ्चैव प्राणा बुद्धिम॑हंकृतिः ॥ १६१॥ सप्तदशात्मकं लिंगं प्रसिद्धं शास्त्रसम्मतम् । पञ्चविंशत्यनेण पञ्च कर्मक्रियात्मनः ॥ १६२॥ एष प्राणांख्यव्यापारः सकलश्च निश्वयान्मतिः । ममांश चैव धर्माः प्रसिद्धाः शास्त्रसम्मतः । १६३॥ स्वप्नाभिमानी भोर्गी रजश्चेति चतुष्टयम् । देवानामिंद्रियाणां च व्यापारश्चर्तुरुत्तर पदो १६४। स्थूलदेहे षोडशैव पदानि सम्मतानि हि । गुणाः सप्तदश तेषामपानव्यानयोः पदे ॥ १६५॥ पायूपस्थस्थानयोर्द्वये वाचोऽपि निकेतने । प्राणस्य मनसश्चापि बुद्धिस्थाने पदं विदुः ॥ १६६॥ पदानि द्वादशे मानि धीमद्भिर्येन तथा गुणः अवस्था जागृतिश्चैताः कथितानि मनीषिभिः ॥ १६७॥ मुद्रामेतादृशीं प्राप्य वेद वेदान्तार्थाम्पदम् । तस्य जन्म कृतार्थ स्यान्महतो नहिन्यथा । १६८॥ मुद्रारूपं विविच्यैव यन्नाम्नां भांकिनोनि च । उक्तं तदधुना किंचित्संक्षेपेण निरूच्यते ॥ १६९॥ रामेति लोकरमणाद्रमन्ते योगिनोऽमले । परमानन्दरदं नित्यं तेन राम इतीर्यते । १७०॥ रसेनेवामुना सर्वे जीवा जीवन्ति नान्यथा । इमं रमणथ लब्ध्वा भवन्त्य नन्दिनोऽखिलाः ॥ १७१॥ विशता येन विश्वेषु सर्वं चेतयते जगत् । न तं चेतयते कश्चिन्न राम इति कीर्त्यते । १७२॥ सत्ता येनाखिले विश्वे म देवोऽत प्रकीर्त्यते । अमन्मनाप्रदः साक्षाद्राम इत्यभिधीयते । १७३॥ यथा प्रसिद्धं रामेति ब्रह्मणो नामनायकम् तथा लिंग पदं व्योम निष्कलः परमात्मातः ॥ १७४॥ लीयन्ते यत्र भूतानि निर्गच्छन्ति यतः पुनः । तेन लिंग पद व्योम निष्कलः परमः शिवः ॥ १७५॥ इति शास्त्रविदां वाणी श्रूयते तत्त्वदर्शनाम् । अतः सर्वाणि नामानि स्थाण्वन्तान्तरात्मनः ॥ १७६॥ सति तेन शब्दभेदं रूपभेदेऽपि सर्वथा । तत्त्वतो नैव भेदोऽस्ति व्यर्थैकस्य वस्तुनः ॥ १७७॥


उस शरीरमे काय और कर्म ये दोन तु मलगम रहते है । १५९॥ इस कारणात्मामे अविद्याकी प्रधानता है । आत्मसवे मे इसमे काम रहता है भोक्तृत्व भावका हा रहता है । यह ज्ञानका सिद्धान्त है १६० । इस सूक्ष्म देहमें कुल साठ पद हैं। दस इन्द्रियका पाँच ५ प्राणका, बुद्धि, मन और १ अहङ्कारका सत्रह पद शास्त्रों-में कहा गया है। पाँच ५ विषय ग्रहण करनेवाली इन्द्रियांका, पांच कर्मकारियोंका और पाँच प्राणोंके व्यापाराका कुल सत्रह होकर अड़तालीस पद होते हैं। १६१ - १६३। स्वप्न, अभिमानी, भोग और रज ये चार देवताओं और इन्द्रियोंमें प्रवृत्ति न करने वाले इमलिय स्वप्न अवस्था सम्बन्धी साठ ही पद माने गये हैं। किन्तु गुण सत्रहका ही रहेगा। उनमेंसे दो पद अपान और व्यान वायुका है ॥ १६४। १६५। पायु और उपस्थस्थानका दो पद, वाणी और रसनाका दो पद, प्राण, मन तथा बुद्धिका एक-एक पद ॥ १६६॥ ये बारह पद मान्त्रा और अंतम पांच ५ इन्द्रियोंके गुण, अवस्था तथा जागृति कहा है। १६७। इस प्रकारकी मुद्रा प्राप्त करके प्राणी वेदान्त अर्थवाली पद पाता है। इसको पाकर जन्म कृतार्थ हो जाता है। अन्यथा नष्ट ही हो जाता है॥ १६८। मुद्राके रूपका विवेचन करके उसके नामोंसे संकेतित मुद्राओंकी बात संक्षेप रूपसे बतलाते हैं॥ १६९ । संसारके प्राणियोंको आनन्द देनेके कारण भगवानका 'राम' नाम पड़ा है। योगीलोग इसी अमल परमानन्द पदमें आनन्द लेते हैं। इस लिए भी राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७०। इसी प्रकार संसारके सब जीव जीते हैं, इस सरस पदको पाकर लोग आनन्दमय हो जाते हैं ॥ १७१। जो भगवन् प्रविष्ट होकर सारे जगत्‌को चैतन्य कर देता है। जिन रामको चैतन्य करनेवाला कोई भी नहीं है, व ही राम 'राम' कहे जाते हैं ॥ १७२। जिन भगवान्‌की सत्ता समस्त विश्वमें है। वे इसी कारण सर्वेश कहलाते हैं। वे भगवन् जगत्में भी अपनी सत्ता बनाये रखते हैं। अतएव लोग उन्हें राम कहते हैं ॥ १७३॥ जिस तरह उनका राम यह नाम प्रसिद्ध हुआ। उसी तरह परमात्माके लिङ्ग और रूप भी हैं।॥ १७४॥ लिंग लिंगका अर्थ इस प्रकार करते हैं-जिसम जगत्के सब प्राणी अन्तमे लीन होते और सृष्टिके आदिमे जिससे प्रादुर्भूत होते हैं उसकी लिंग संज्ञा है। वह लिंग, शून्य निष्कल और परम कल्याणकारी है ॥ १७५॥ इस प्रकार तत्त्वदर्शी शास्त्रोंकी बातें सुनायी पड़ती हैं। इससे यह