श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 612, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें५९६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
स ब्रह्मा स शिवश्चाथ स हरिः स सुरेश्वरः। सोऽक्षरः परमश्चैव स स्वराडिति वेदवाक् ॥१७८॥ यस्यैवै सच्चिदानन्दाः स व्यापी सर्ववस्तुषु, नेदानीं नु प्रियं भाति वस्त्वमात्रं प्रदृश्यते ॥१७९॥ वार्तायां च सर्वत्र रामनामाङ्ककीर्तनम्। अत्रिद्विद्यापमानेषु श्रूयते गुरुपुङ्गवात् ॥१८०॥ अग्रेत्वेक आत्मा वा इदमग्रः पुरा जनैः। आसीत्ततैव लोकानां पालानां सृष्टिरिच्छया ॥१८१॥ पुनश्च सर्वदेवानामनुकल्पार्थमीप्सितम्। इन्द्रायतनं तन्न सृष्टेस्तेभ्यस्ततः परम् ॥१८२॥ विचार्य स्वापदां पश्यन्त्सीमाशं प्रविष्टवान्। तदात्मानं ब्रह्म तत दृष्ट्वांशदेतो किल ॥१८३॥ कश्चैष मनि सप्रश्नं येन पश्यन्ति विन्दति। इत्यादिभिर्विभज्यैवं तदेतद्द्रष्ट्रादिभिः ॥१८४॥ संज्ञोऽन्तःसम्य नामानि चोक्त्वाऽन्यच्चेतसोऽयमा। एष ब्रह्मेत्यादिभिश्चेदंश्चोक्तं चाखिलं जगत् ॥१८५॥ प्रज्ञानेत्रं च प्रज्ञाने प्रतिष्ठितन्नेनेव हि। प्रज्ञानं ब्रह्म श्रुत्यान्ते त्रिकाले विनिश्चितम् ॥१८६॥ तद्राम सच्चिदानन्दघनानन्दं न संशयः। तैत्तिरीयस्यशाखायां ब्रह्मण लक्षणं पुरा ॥१८७॥ सत्यं ज्ञानमनन्तं सङ्कीर्त्य वेत्तुगुहादिकम्। यस्माद्वस्तुते कामानामंग्युपपद्येव हि ॥१८८॥ फलं ज्ञानस्य चोक्त्वाऽथ तस्माद्ब्रह्मात्मकं किल। क्रमोत्पत्तिर्हि शुभानां कोश निकवेदनम् ॥१८९॥ तत्फलं तदनात्मत्वं मदष्ट्यानन्दात्मनः पुच्छं ब्रह्मेति निर्णीय तदसत्समशीनितः ॥१९०॥ असन्नेद्भवति ज्ञेयं सत्तीर्त्य च तत परम्। कामयित नदेवेदं सृष्ट्वाऽभूत् जगदात्मना ॥१९१॥ कृत्वा तस्मिन् प्रविष्टेव मच्चामच्चाभवत्किल। अपानप्राणयोश्चेष्टा यस्या सीन्वे प्रजायते ॥१९२॥ अन्यायस्य त्वेव आनन्दयति चाखिलान्। भयहेतुस्तदेवेह त्रासादीनां प्रदर्शकम्। ॥१९३॥ मानुष्यारभ्य ब्रह्मान्ता आनन्दा ये शतोत्तराः। सिद्धस्तत्र परब्रह्मानन्दज्योतिं विनिश्चितम्। ॥१९४॥
सिद्ध हुआ कि उस सच्चिदानन्द ही नाम और रूपान्तर बहुत हुए भी वास्तवमें सब एक हैं। इसकी वास्तविक् स्थितिमें कोई भी अन्तर नहीं आता ॥१७८॥ १७९॥ वही ब्रह्मा, वे ही शिव, वे ही विष्णु और वे ही देवराज इन्द्र हैं। वे ही अक्षर ब्रह्म और वही सर्वव्यापक तथा विश्वरूप स्वराट् हैं ॥१७८॥ वे ही सब वस्तुमात्र रूप चित् और आनन्द रूपसे आनन्दरूप हैं। जिसके कारण सब चीज अच्छी लगती हैं ॥१७९॥ सब वेदोंमें रामरूपी ब्रह्मका कीर्तन विद्यमान है। गुरुकुल के अनुग्रहसे आदि, मध्य, अन्त सब समयमें रामहीका कीर्तन सुनायी पड़ता है ॥१८०॥ ऐतरेय उपनिषदमें लिखा है कि सर्वप्रथम यह आत्मा अकेला था। उसकी यह इच्छा हुई कि हम लोक और लोकपालोंकी सृष्टि करें ॥१८१॥ ऐसा विचार होनेपर उसने सृष्टिके अनन्तर नाना प्रकारके इन दानादिक और उत्तम प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की ॥१८२॥ तदनन्तर उन्होंने अपने-अपन स्वरूपमितका विचार किया और एक सधाम देवनगरोंके राजा इन्द्र बने ॥१८३॥ जो कि इस संसारका देवता तथा संसारको चलानेवाला कौनसा है वह कौन है? इसका ज्ञान आदि नाम बतलाते हुए "यह आत्मा ही सब कुछ है" आदि वाक्यसे उन्होंने इस प्रश्नको हल कराया ओर बतलाया कि सन्, चित्, आनन्दम् लेकर चुने नयन नाम हो गया है। पूर्व समय तैत्तिरीयक श्रुतिमें ब्रह्मका लक्षण बतलाते हुए रामने सत्य, ज्ञान और अनन्तरूप उपाधि दी है। इस संसारमें जो कुछ दृश्य साधनका भोक्ता और खाने-पीनेका है, वह ब्रह्म ही है। इनमें से, यह ले पाया गया कि समस्त सृष्टि ब्रह्ममयी है। सब प्राणियोंका क्रम-उत्पांत, पंचकोशका ज्ञान और आत्माकी विभिन्नता आदि दिखाकर बतलाया है कि सत् और असत्का प्रतीयमान इन सबका मूल कारण ब्रह्म ही है। १८४-१९०॥ फिर कहकर कहा कि सत् और असत् यह क्या वस्तु है? इस प्रश्नको हल करते हुए कहते हैं कि जो अदृश्य अव्यक्त और जगत्का आत्मा बनकर कामनाओंको धारणा हुआ उसमें लीन हो जाता है वही सत् है। जिसके अस्तित्त्वमें प्राण और अपानकी चेष्टा जायमान होती है, उसे असत् कहते हैं ॥१९१॥ १९२॥ यह आत्मा ही सारे संसारको आनन्दित करता है। वास्तविका एकमात्र ब्रह्म भयहेतु है ॥१९३॥ मनुष्यसे लेकर ब्रह्मपर्यन्त तथा इसके भी आगे जो आनन्दविन्दु है, वह एकमात्र परब्रह्मानन्दका ही आभास है।