भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः ४ ] मनोहरकाण्डम् १९७


म यस्यायं नरोपाश्चादित्येवञ्च वर्तते । स एक इति ज्ञात्वा' पापं पुण्यं कृतञ्चने ॥१९५॥
न संतापयतस्स्वेवं सम्यक् सर्वं प्रकीर्तितम् । यत्प्रब्रह्म हेयापेक्ष्यः सङ्गत्स्येति न संशयः ॥१९६॥
छांदोग्येऽपि स वेदेति मन्त्रोपक्रम्य प्रक्रणः । तेजोऽन्नादिका सृष्टिः यन्मूला मा स्थितिरितिः १७ ।
जीवात्मना प्रवेशश्च व्याकृतिर्नाम रूपयोः अनेकत्वान्नपदस्य मन्यर्दनेकत्वताऽपि च ।
मदर्थभावना-! च मनुष्ये च बहूक्तिता । १९८।
लज्जाने च गुगेतांन ज्ञानन्मोक्षोःपुनर्भवः ।
मध्यब्रह्माभिमंन्ग्रन्येव मन्त्रब्रह्मकीर्तनम् । तद्रामान परं ब्रह्म सृष्टिस्थित्यन्तहेतुकम् ।।१९९।।
अन्यस्यामपि शाखायां प्रश्नप्र-युक्तिः स्फुटम् । मनःप्र, णेन्द्रियाणां यन्मनः प्राणैन्द्रियं हि तत् ॥२००॥
सर्वपामनुभूतेः सन्निष्टितारिद्वितात्परम् विषयो नेन्द्रियाणामित्युक्त्वा तस्य शभापनम्२०१ ।
सर्वदर्शी सर्ववेतृदेवना जयकारणम् । तदत्ताने च देवानां गुरुह्यानुपूर्णात्निता ॥२०२।
धैर्यन्न नान्यन्मानुष्यं प्राप्य जन्म न वेत्त चेत् । विनाष्टिमहती तस्य चेति प्रोक्त ततः परम् ॥२०३।
अध्यात्माधिदैवसिद्धा विद्यापाश्चमत्र च ब्रह्मज्ञालिन राज्ञाना हानिन्मन्प्रमितित्ययम् ॥२०४॥
मम्रजो महिमा श्रुत्या कीर्तितो ह्यामना मण्म् । तद्रामपि गुरोश्चेय नान्यथा ग्रन्थकाटिभिः ॥२०५॥
मुडकेऽपि परा विद्या शिष्या जय ब्रह्मणः । सृष्टिश्चानेकदृष्टांतरुक्ता तस्मिन्न मस्थिता ॥२०६॥
लपन्नासि हि सर्वत्र विश्वं मत्र हि गन्मयम् तारुण धनुषा चैव लक्ष्य आत्मानपर्ण तथा ।।२०७।

एषा लिखा है। जो मनुष्यका उपाधिय भूत विद्यमान है। उस एकमात्र प्रभुका ज्ञान सत्तपद कर्म-अधर्म तथा पाप पुण्य कुछ शेष नहीं रह जाता, १९४ । १९५, तब किसी प्रकारका सन्ताप नहीं करना पड़ता। ये सब गुण जिसमें हैं, वह ब्रह्म ही है। उसको आत्मा देखकर निश्चित होता है कि वह ब्रह्म आराधनकारी ही है। इसमें संशय नहीं है ॥१९६॥ छान्दोग्य उपनिषदमें यह कहा है कि ब्रह्मसे ही अन्नादिका सृष्टि हुई है और उसीके आधारसे इस जगत्का पालन-पोषण होता है । १९७ । जीवात्माके द्वारा ही जगतका प्रवेश होता है, किन्तु देहके अभाववश उसके नाम और रूपमें अन्तर पड़ जाता है। स्वस्वरूपका उसके विचार शिक्षा ही का विषय मात्र था, इसलिये साव एकता ज्ञान ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है। जब तक मनु पदका ज्ञान नहीं होता, तब तक एकता रहता है और सद् ब्रह्म विद्यमान रहनेपर एकताके स्थानपर बहुत्व आ जाता है। उस मन् पदका ज्ञान होनेपर गुरु द्वारा ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान प्राप्त होकर पुनर्जन्मविमुक्त मोक्षपद प्राप्त होता है॥ १९८॥ शाखाके सद्ब्रह्म जिसका कथन उपमानों है, उसका इतना ही यथार्थकीर्तन है कि वह राम ही परब्रह्म हैं। उन्हींके द्वारा इस जगत्की सृष्टि, पालन और प्रलय होता है ।१९९॥ अन्य शाखाओंमें भी प्रश्न और उत्तरके रूपमें अनेक प्रश्न और प्रत्युक्तियां हुई हैं। उनसे भी यही सिद्ध होता है कि मन, प्राण और इन्द्रियोंका जो मन, प्राण और इन्द्रिय है। वह ब्रह्म ही है। वह प्रत्यक्षदृश्य प्रकृत जन और अज्ञान इन दोनोंसे परे है। यह सबका अनुभव है। किन्तु वह इन्द्रियोंके विषयगोचर नहीं होता अर्थात् अनुभवसे ही जाना जाता है। यह कहकर उसका समापन किया गया है ।। २०० ।। २०१ ।। वह प्रत्यक्ष सब कुछ देखता है सब जानता है देवताओंके विजयका कारण है और वह देवताओंके लिए भी अज्ञात रहता है। गुरुका उपासन करनेसे ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है॥ २०२॥ विद्या ही मनुष्यका मनुष्यत्व है। इस संसारमें जन्म पाकर जिसने विद्या नहीं पायी तो यह उसका एक बहुत बड़ा विनाश है। ऐसा कहा गया है ॥ २०३ ॥ अधिदैवका भी अदर्शन करनेवाला बह्मज्ञानका विद्याका साधन होता है, परोक्ष ज्ञान होता है और अन्तमें उसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है ।। २०४ ।। श्रुतिने स्वयं विस्तारपूर्वक ब्रह्मकी महिमाका गान किया है। इसलिए जिज्ञासुको चाहिए कि वह गुरुसे रामका ज्ञान प्राप्त करे। वैसे करोड़ों ग्रन्थ पढ़नेसे भी उनका सच्चा ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता ॥२०५॥ मुण्डक उपनिषदमें कहा गया है कि ब्रह्म और ब्रह्मका विषय जाननेके लिए गुरु प्रधान हैं। उक्त उपनिषदने अनेक दृष्टान्तोंसे सृष्टिका वर्णन किया है ॥ २०६ ॥ वह कहता है कि यह सारी सृष्टि उसी ब्रह्ममें स्थित है और अन्तमें उसीमें